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रफ़ाल सौदे की निगरानी की थी पीएमओ ने, केंद्र सरकार ने माना

केंद्र सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर यह मान लिया है कि रफ़ाल सौदे की निगरानी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट को दिए एक हलफ़नामे में प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि नरेंद्र मोदी स्वयं रफ़ाल सौदे की ‘मॉनीटरिंग’ कर रहे थे, पर यह ‘समानान्तर बातचीत’ या ‘हस्तक्षेप’ नहीं था।

इसके पहले मंगलवार को अदालत ने सरकार से कहा था कि वह रफ़ाल पुनर्विचार याचिका पर अपना पक्ष रखे।

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सरकार ने जवाब देते हुए सर्वोच्च अदालत से कहा, ‘सरकार से सरकार के बीच होने वाली प्रक्रिया की निगरानी करने को समानान्तर सौदेबाजी या हस्तक्षेप नहीं माना जाना चाहिए।’

समानान्तर बातचीत

इसके पहले अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू में छपी एक ख़बर में कहा गया था कि प्रधानमंत्री ने हवाई जहाज़ बनाने वाली कंपनी के साथ समानान्तर बातचीत की थी। यह ख़बर रक्षा मंत्रालय की एक फ़ाइल पर लिखे गए नोट्स के आधार पर की गई थी। इस नोट में कहा गया था, ‘समानान्तर बातचीत की वजह से रक्षा मंत्रालय और बातचीत के लिए बनाई गई भारतीय टीम की स्थिति कमज़ोर हो गई थी।’
सरकार ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर का हवाला भी दिया। पर्रीकर ने टिप्पणी की थी, ‘ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय और फ्रांसीसी राष्ट्रपति विमान सौदे की बातचीत की सीधी निगरानी कर रहे थे। यह दोनों देशों के शीर्ष के नेताओं की बैठक का नतीजा था।’

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने जवाब में यह भी कहा कि फ़ाइलों पर की गई कुछ आधी-अधूरी टिप्पणियों की चुनिंदा रिपोर्ट सरकार के अंतिम फ़ैसले को नहीं दर्शाती हैं। ये टिप्पणियाँ पुनर्विचार याचिका का आधार नहीं बन सकतीं।

इसके पहले सुप्रीम कोर्ट में दो पुनिर्विचार याचिकाएँ दायर की गई थीं। एक याचिका पूर्व बीजेपी नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा, मशहूर वकील प्रशांत भूषण और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी ने दायर की है। दूसरी याचिका आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने दायर की है।

अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि रफ़ाल सौदे पर अदालत के फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिकाएँ चुराए गए गोपनीय दस्तावेज़ पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि ये दस्तावेज़ गोपनीय हैं और रक्षा मंत्राालय से चुराए गए हैं। इस मामले की जाँच चल रही है। इसके साथ ही यह ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन है।
वायु सेना के लिए रफ़ाल विमान ख़रीद के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार साफ़ तौर पर फँसती नज़र आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में साफ़ कर दिया है कि सरकार को इस बात पर राहत नहीं दी जा सकती है कि अख़बारों में छपी रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय से चुराए गये दस्तावेज़ों पर आधारित थे।
कोर्ट अब इन दस्तावेजों की जाँच-पड़ताल करके आगे की कार्रवाई तय करेगा। रफ़ाल विमान सौदों पर अंग्रेज़ी के दो बड़े अख़बारों 'द हिंदू' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं। इनमें कई गंभीर आरोप लगाये गये। इन रिपोर्टों में सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय पर सबसे गंभीर आरोप यह है कि रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञों की कमेटी को नज़रअंदाज़ करके सीधे रफ़ाल विमानों का सौदा किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के कारण रफ़ाल विमानों की क़ीमत बढ़ गयी और भारत में इन विमानों को बनाने का ठेका यानी ऑफ़सेट कॉन्ट्रैक्ट उद्योगपति अनिल अंबानी को मिल गया।

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