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महाराष्ट्र: सरकार भले ही बन गई, पर राज्यपाल की 'अग्निपरीक्षा' अभी बाक़ी

महाराष्ट्र में भले ही शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है, लेकिन बीजेपी को सरकार बनाने का न्यौता देने के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के फ़ैसले की पड़ताल सुप्रीम कोर्ट में अभी भी जारी रहेगी। तो क्या राज्यपाल की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट का फिर ऐसा फ़ैसला आएगा जो एक नज़ीर बनेगा? 

यह सवाल इसलिए कि कोश्यारी ने 22 नवंबर की रात में ही राज्य में राष्ट्रपति शासन को हटा दिया था, सरकार बनाने का न्यौता दे दिया था और 23 नवंबर की सुबह एकाएका देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और अजीत पवार को उप मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दी थी। यह तब हुआ जब उसी दिन शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस सरकार बनाने की घोषणा करने वाली थीं। इसके बाद तीनों दलों ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ही तुरंत फ़्लोर टेस्ट किया गया और देवेंद्र फडणवीस सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ा। लेकिन राज्यपाल के निर्णय की क़ानूनी वैधता पर फ़ैसला आना अभी बाक़ी है।

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दरअसल, शिवसेना के नेतृत्व में दायर की गई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने राज्यपाल और फडणवीस से चार हफ़्ते में जवाब माँगा है। कोर्ट 12 हफ़्ते बाद इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगा। ऐसे में सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट गवर्नर के ख़िलाफ़ कोई वैसा ही फ़ैसला सुनाएगा जैसा कोर्ट ने फ़्लोर टेस्ट कराने के मामले में दिया। तब कोर्ट ने कहा था, 'यदि फ़्लोर टेस्ट में देरी होगी तो ख़रीद-फ़रोख्त की संभावना रहेगी। इस तरह यह कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कार्यवाही करे। ऐसी स्थिति में तुरंत फ़्लोर टेस्ट ही सबसे उपयुक्त उपाय होगा।'

इस मामले में 22 नवंबर की रात 7 बजे से अगले दिन यानी 23 नवंबर की सुबह 8 बजे के बीच महाराष्ट्र के राज्यपाल की कार्यवाही पर सवाल उठाए गए हैं। अब कोर्ट पर नज़रें टिकी हैं कि कहीं वह राज्यपाल की भूमिका को लेकर कोई नज़ीर पेश करने वाला फ़ैसला तो नहीं देगा।

राज्यों में सरकार गठन, बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने में राज्यपालों की भूमिका पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं और कोर्ट के फ़ैसले भी आते रहे हैं। इस मामले में बोम्मई केस अक़्सर नज़ीर के तौर पेश किया जाता है। 1989 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकट सुबैया ने मनमाने तरीक़े से यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया था कि सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है।

बोम्मई मामला

बोम्मई ने अपनी बर्खास्तगी को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहरा दिया। बोम्मई ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। एसआर बोम्मई बनाम भारत सरकार के नाम से मशहूर हुए इस मामले में 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया वह अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल यानी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के संदर्भ में मील का पत्थर बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बोम्मई सरकार की बर्खास्तगी असंवैधानिक थी और उन्हें बहुमत साबित करने का मौक़ा मिलना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकार के बहुमत या अल्पमत में होने का फ़ैसला संबंधित सदन यानी लोकसभा या विधानसभा ही हो सकता है।
इसी फ़ैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की पुष्टि संसद के दोनों सदनों से भी होना ज़रूरी है और दोनों सदनों से पुष्टि हो जाने के बाद भी उस फ़ैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

राज्यपाल की ज़िम्मेदारी

रामेश्वर प्रसाद बनाम केंद्र सरकार मामला भी बड़ा उदाहरण है। दरअसल, बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने 2005 में चुनाव-पूर्व सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए नहीं कहा था और इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश की थी कि किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण सरकार गठन के लिए विधायकों की ख़रीद-फ़रोख्त होने की संभावना है। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को असंवैधानिक ठहराया था।

इस मामले में स्पष्ट कहा गया था कि राज्यपाल पर उस पार्टी को आमंत्रित करने की ज़िम्मेदारी है जो स्थिर और टिकाऊ सरकार प्रदान कर सकती है। इसमें चुनाव-पूर्व हुए गठबंधन के अलावा चुनाव बाद हुए गठबंधन पर भी विचार किया जा सकता है। इसमें यह भी साफ़ किया गया था कि राज्यपाल को यह सुनिश्चित करते हुए कि बहुमत के साथ कोई चुनाव-पूर्व गठबंधन नहीं है, एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी को आमंत्रित करना चाहिए। राज्यपाल का काम यह सुनिश्चित करना है कि जितनी जल्दी हो सके एक स्थिर और व्यवहारिक सरकार हो।

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'राजनीतिक दलों से दूर रहें राज्यपाल'

ऐसा ही मामला अरुणाचल प्रदेश में भी हुआ था। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में राज्यपाल जेपी राजखोआ ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को असंवैधानिक क़रार दिया और राज्य में 15 दिसंबर 2015 वाली स्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्वनर को विधानसभा बुलाने का अधिकार नहीं था। यह ग़ैर-क़ानूनी था। उस दिन के बाद की सारी कार्रवाइयाँ रद्द कर दी गईं थी। बता दें कि राज्यपाल ने पहले विधानसभा का सत्र बुला दिया था और फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। इसके बाद 21 विधायक बाग़ी हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ही बाग़ी हुए कालीखो ने 20 बाग़ी विधायकों और 11 बीजेपी विधायकों के साथ मुख्यमंत्री की शपथ ले ली और सरकार बना ली थी। लेकिन कोर्ट ने बाद के इन घटनाक्रमों को रद्द कर दिया था।

बहुमत का फ़ैसला देने वाली बेंच में शामिल जस्टिस जे.एस. खेहर, पी.सी. घोष और एन.वी. रमाना ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। 

अदालत ने साफ़ कहा था, ‘एक राजनीतिक पार्टी की चहारदीवारी के भीतर क्या होता है, इससे राज्यपाल का कोई लेनादेना नहीं है। राज्यपाल को राजनीतिक दलों के भीतर किसी भी असहमति, असंतोष या विरोध से दूर रहना चाहिए। एक राजनीतिक दल के भीतर गतिविधियाँ, अशांति, हंगामा, राज्यपाल की चिंता से परे हैं। राज्यपाल को किसी भी राजनीतिक हॉर्स ट्रेडिंग और यहाँ तक ​​कि अस्वाभाविक राजनीतिक जोड़तोड़ से भी अलग रहना चाहिए।’ 

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बहरहाल, महाराष्ट्र के मामले में जो राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं और यह भी मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो इस पर भी एक बड़ा फ़ैसला आ सकता है। हालाँकि, इस फ़ैसले में भी राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास सफ़ाई देने का मौक़ा रहेगा। कोश्यारी यह जवाब दे सकते हैं कि उनके पास सरकार बनाने के लिए ज़रूरी विधायकों की संख्या दे दी गई थी इसलिए राष्ट्रपति शासन को हटाने की सिफ़ारिश की, सरकार बनाने का न्यौता दिया और मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री को शपथ दिला दी। भले ही क़ानूनी दाँव-पेच में वह एनसीपी के विधायक दल के नेता के तौर पर अजीत पवार द्वारा दिए समर्थन पत्र को पेश कर बच निकलें, लेकिन क्या नैतिकता के तकाजे पर वह खरे उतरते हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट इन बातों को भी ध्यान में नहीं रखेगा? यदि सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल के फ़ैसले को असंवैधानिक क़रार देगा तो क्या आगे दूसरे राज्यपाल सबक़ लेंगे?
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