मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों चुनाव आयोग के भीतर लिए गए फैसलों और उनके पारिवारिक संबंधों से जुड़े कई सवालों के केंद्र में हैं। The Indian Express ने चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई, जिन्हें उन्होंने अपनी जानकारी या सहमति के बिना लिया गया बताया। ये आपत्तियां मुख्य रूप से मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों को लेकर थीं। 
CEC ज्ञानेश कुमार की बेटी और नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़े एक मामले ने भी न्यायिक प्रक्रिया और संभावित हितों के टकराव को लेकर सवाल खड़े किए हैं। LiveLaw के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मेधा रूपम को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ अंतरिम राहत दी थी। इसी दौरान यह जानकारी सामने आई कि न्यायमूर्ति शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसिल हैं। 

इसी तरह संभल लोकसभा चुनाव 2024 का मामला भी है। संभल में मुस्लिम मतदाताओं को वोट डालने से रोका गया। वहां रिटर्निंग अफसर मनीष बंसल थे। केंद्रीय चुनाव आयोग में ससुर ज्ञानेश कुमार गुप्ता चुनाव आयुक्त थे। स्क्रॉल की रिपोर्ट में कहा गया कि सारी शिकायतें दब गईं। 
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7 मई 2024 को लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण के दौरान उत्तर प्रदेश के संभल में मतदान केंद्रों पर पुलिस कार्रवाई और मतदाताओं को कथित रूप से मतदान से रोकने के गंभीर आरोप सामने आए थे। उस समय ज्ञानेश कुमार चुनाव आयुक्त थे। संभल के जिला निर्वाचन अधिकारी और जिलाधिकारी मनीष बंसल थे। बंसल, ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम के पति हैं। यानी संभल में चुनावी प्रक्रिया की जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारी ज्ञानेश कुमार के दामाद थे।
स्क्रॉल ने सारे मामले की पड़ताल की।

संभल में क्या हुआ था?

संभल लोकसभा सीट पर उस समय समाजवादी पार्टी के जिया उर रहमान बर्क और भाजपा के परमेश्वर लाल सैनी के बीच मुकाबला था। ओवारी गांव की 70 वर्षीय मतदाता बानो ने Scroll को बताया था कि सुबह करीब 10 बजे पुलिसकर्मी मतदान केंद्र पर पहुंचे और मतदाताओं पर लाठीचार्ज किया। उन्होंने अपने चेहरे पर चोट और घुटने पर चोट के निशान दिखाते हुए कहा कि उन्होंने जीवनभर मतदान किया है लेकिन ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं देखी।
शाहबाजपुर गांव की 38 वर्षीय सकीना ने भी इसी तरह की कार्रवाई का आरोप लगाया था। उनके मुताबिक, पहले पुरुषों को पीटा गया और बाद में महिलाओं को भी वहां से हटाया गया। इन आरोपों के समर्थन में कई वीडियो सामने आए थे। The Quint, Newslaundry और Caravan सहित कई मीडिया संस्थानों ने भी उस दिन की घटनाओं पर रिपोर्ट प्रकाशित की थीं।

ओवारी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था जिसमें पुलिसकर्मियों को मतदान केंद्र के बाहर भागते मतदाताओं का पीछा करते और लाठियां चलाते हुए देखा गया। एक अन्य वीडियो, जिसे समाजवादी पार्टी की विधायक पिंकी सिंह यादव ने साझा किया था, में पुलिसकर्मियों द्वारा मतदान केंद्र के भीतर लाठीचार्ज किए जाने का दावा किया गया। शाहबाजपुर से सामने आए एक वीडियो में महिलाओं को मतदान केंद्र से बाहर जाते हुए दिखाया गया था और वीडियो रिकॉर्ड करने वाला व्यक्ति कह रहा था कि उन्हें मतदान नहीं करने दिया जा रहा है।

चुनाव आयोग ने आरोपों को बताया था “झूठा और भ्रामक”

रिपोर्ट के अनुसार, संभल के तत्कालीन रिटर्निंग ऑफिसर मनीष बंसल ने ओवारी के वीडियो की जांच के बाद कहा था कि मतदान केंद्र के भीतर जरूरत से ज्यादा लोग मौजूद थे और पुलिस ने उन्हें बाहर निकालकर कतार लगवाई थी। इसके अगले दिन चुनाव आयोग ने बंसल के बयान के आधार पर ओवारी में मतदाताओं को मतदान से रोकने के दावों को “झूठा और भ्रामक” बताया था। आयोग ने कहा था कि किसी मतदाता को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया गया। यहीं से हितों के टकराव का सवाल उठता है। बंसल ज्ञानेश कुमार के दामाद थे और उस समय कुमार स्वयं चुनाव आयोग के सदस्य थे।

क्या ज्ञानेश कुमार ने खुद को इस मामले से अलग किया था?

  • यही इस पूरे मामले का एक अहम अनुत्तरित प्रश्न है।
चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संस्था है- मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्त। फैसले आम तौर पर सामूहिक रूप से लिए जाते हैं और मतभेद होने पर बहुमत का फैसला लागू होता है।
  • ऐसे में सवाल है कि क्या संभल से संबंधित शिकायतों और बंसल की रिपोर्ट पर विचार करते समय ज्ञानेश कुमार ने खुद को कार्यवाही से अलग किया था? 
  • क्या उन्होंने आयोग के अन्य सदस्यों को अपने पारिवारिक संबंध के बारे में बताया था? और यदि इस मुद्दे पर मतदान हुआ था, तो उनका रुख क्या था?
  • इन सवालों का सार्वजनिक रूप से स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है।

कानून क्या कहता है?

रिपोर्ट में जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 57 का उल्लेख किया गया है। इस प्रावधान के तहत यदि हिंसा या किसी अन्य कारण से चुनाव प्रक्रिया बाधित होती है, तो निर्धारित परिस्थितियों में रिटर्निंग ऑफिसर मतदान स्थगित कर उसे बाद की तारीख में कराने की प्रक्रिया अपना सकता है। संभल में ऐसा नहीं किया गया। इसके बजाय रिटर्निंग ऑफिसर ने पुलिस कार्रवाई को भीड़ को व्यवस्थित करने की कार्रवाई बताया और चुनाव आयोग ने इसी स्पष्टीकरण के आधार पर मतदाता दमन के आरोपों को खारिज किया था।

मेधा रूपम के मामले से जुड़े सवाल

मेधा रूपम, ज्ञानेश कुमार की बेटी और गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी हैं। मामला नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े एक छात्रा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई कार्रवाई से संबंधित है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2026 में उस हिरासत को रद्द करते हुए इसे अवैध बताया था। अदालत ने नोएडा प्रशासन की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणियां कीं और अधिकारियों के वेतन से कुल ₹5 लाख की क्षतिपूर्ति वसूलने का निर्देश दिया था, जिसमें मेधा रूपम भी शामिल थीं। इसके खिलाफ रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों और क्षतिपूर्ति संबंधी निर्देश पर अंतरिम रोक लगाई। बाद में यह स्पष्ट किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने छात्रा की हिरासत को अवैध ठहराने वाले हाईकोर्ट के मूल फैसले पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई थी; राहत मुख्य रूप से हाईकोर्ट की टिप्पणियों और क्षतिपूर्ति के निर्देश से संबंधित थी।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा को लेकर क्या सवाल उठे?

LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसिल हैं। इसी वजह से मेधा रूपम के मामले में न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ द्वारा दी गई राहत को लेकर न्यायिक औचित्य और संभावित हितों के टकराव से संबंधित सवाल उठाए गए हैं। लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर यह सवाल भी उठाया कि मेधा रूपम की याचिका न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ के सामने कैसे सूचीबद्ध हुई। संगठन ने यह दावा किया कि उस समय लागू रोस्टर के तहत इस तरह के मामलों की सुनवाई सामान्यतः दूसरी पीठ के समक्ष होती थी। सुनवाई के दौरान ऑडियो म्यूट किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए। 
यह महत्वपूर्ण है कि ये सवाल न्यायमूर्ति शर्मा के खिलाफ किसी न्यायिक निष्कर्ष के समान नहीं हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर अभी तक किसी अदालत या जांच संस्था ने यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि मामले की सूचीबद्धता या अंतरिम राहत किसी पारिवारिक या पेशेवर संबंध के कारण प्रभावित हुई।

ज्ञानेश कुमारः एकसाथ उभरते तीन मामले

ज्ञानेश कुमार से जुड़े मौजूदा विवाद को तीन अलग-अलग स्तरों पर देखा जा रहा है-
  • चुनाव आयोग के भीतर असहमति: दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने का Indian Express का दावा।
  • परिवार से जुड़े प्रशासनिक मामले: उनकी बेटी मेधा रूपम से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम राहत और उस मामले की सूचीबद्धता पर उठे सवाल।
  • 2024 का संभल मामला: जब चुनावी प्रक्रिया से जुड़े फैसलों के संदर्भ में तत्कालीन चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के दामाद मनीष बंसल की भूमिका सामने आई थी।
इन घटनाओं से यह सवाल जरूर उठता है कि संवैधानिक संस्थाओं में पारदर्शिता, हितों के संभावित टकराव और निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर स्पष्ट प्रक्रियाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं। बहरहाल, ज्ञानेश कुमार गंभीर आरोपों में फंस गये हैं, उनके पास किसी भी आरोप का वाजिब जवाब नहीं है।