NLSIU में एबीवीपी के विरोध के बीच उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग स्थगित किए जाने के बाद अब सेंसर बोर्ड यानी CBFC की आपत्ति के बीच IIIT हैदराबाद ने उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की कैंपस में होने वाली स्क्रीनिंग को रद्द कर दिया है।
जेएनयू के पूर्व छात्र और एक्टिविस्ट उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रिजनर नंबर 626710 इज प्रेजेंट’ की स्क्रीनिंग अब हैदराबाद के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी यानी IIIT में भी नहीं हो सकेगी। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी यानी सीबीएफ़सी की आपत्ति के बाद संस्थान ने प्रस्तावित स्क्रीनिंग और केआरबी ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द कर दी है। सीबीएफ़सी ने कहा कि बिना प्रमाणन फ़िल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट का उल्लंघन है। इससे पहले एनएलएसआईयू में भी एबीवीपी के विरोध के बाद कार्यक्रम टला था।
डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग 18 सितंबर की शाम 8 बजे होने वाली थी। इसे एक स्वतंत्र छात्र समूह ‘नो टाइरेंट्स, नो सायलेंस’ की ओर से आयोजित किया जाना था। कार्यक्रम का आयोजन ‘राजनीतिक कैदी दिवस’ के संदर्भ में किया जा रहा था।
सीबीएफ़सी ने कहा कि जिस फ़िल्म को बोर्ड से प्रमाणपत्र नहीं मिला है, उसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट 1952 के तहत उल्लंघन हो सकती है, जब तक कि कानून के तहत इसके लिए कोई विशेष छूट न ली गई हो। बोर्ड ने IIIT हैदराबाद प्रशासन से मामले पर ध्यान देने और 'आवश्यक कार्रवाई' करने को कहा था।
CBFC ने क्या आपत्ति जताई?
सेंसर बोर्ड यानी सीबीएफ़सी ने 17 सितंबर को सोशल मीडिया पर प्रस्तावित स्क्रीनिंग की जानकारी साझा करते हुए कहा कि बिना प्रमाणित डॉक्यूमेंट्री का सार्वजनिक प्रदर्शन क़ानून का उल्लंघन है, जब तक कि उसके लिए संबंधित क़ानून के तहत विशेष छूट नहीं ली गई हो।
बोर्ड ने IIIT हैदराबाद को टैग करते हुए प्रशासन से इस मामले में ज़रूरी कार्रवाई करने को कहा। सीबीएफ़सी केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाला वैधानिक निकाय है और फ़िल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणन प्रक्रिया से जुड़ा है।सीबीएफ़सी की आपत्ति के बाद IIIT हैदराबाद के निदेशक संदीप कुमार शुक्ला ने छात्रों को ईमेल भेजकर बताया कि स्क्रीनिंग रद्द कर दी गई है और केआरबी ऑडिटोरियम की बुकिंग भी रद्द कर दी गई है।
कैंपस में फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं होगी: IIIT हैदराबाद
निदेशक के ईमेल के मुताबिक़ संस्थान की किसी भी जगह पर इस तरह की फिल्म की स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं होगी। इसमें लैब, क्लासरूम और कार्यालय भी शामिल हैं।
संस्थान ने यह भी कहा कि प्रस्तावित स्क्रीनिंग के लिए सक्षम अधिकारियों से अनुमति नहीं ली गई थी। ईमेल में कहा गया कि छात्रों ने सोशल मीडिया के ज़रिए कैंपस और बाहर कार्यक्रम की घोषणा की थी, लेकिन चूँकि ज़रूरी अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए यह घोषणा संस्थान की ओर से अधिकृत नहीं थी।संस्थान ने भविष्य में ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने या सोशल मीडिया पर उनकी घोषणा करने से पहले लिखित अनुमति लेने की बात भी कही है। हालाँकि, IIIT हैदराबाद ने बाद में इस प्रस्तावित कार्यक्रम से खुद को अलग करते हुए कहा कि न तो संस्थान और न ही उसके मान्यता प्राप्त छात्र संगठनों ने इस स्क्रीनिंग का आयोजन या मेजबानी की थी।
संस्थान के मुताबिक़ उसके छात्र और शिक्षक व्यक्तिगत हैसियत में अलग-अलग लोगों से मिल सकते हैं, लेकिन ऐसे व्यक्तिगत संपर्कों को संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम या संस्थान के आधिकारिक विचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
डॉक्यूमेंट्री किसके बारे में है?
‘प्रिजनर नंबर 626710 इज प्रेजेंट’ फिल्मकार ललित वचानी द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री है। फ़िल्म का केंद्र उमर खालिद और उनकी गिरफ्तारी तथा लंबे समय से जारी न्यायिक हिरासत है।फ़िल्म के नाम में इस्तेमाल 626710 उमर खालिद का जेल नंबर है। IIIT हैदराबाद में प्रस्तावित कार्यक्रम को ‘राजनीतिक कैदी दिवस’ के संदर्भ में आयोजित करने की योजना थी। यह फिल्म तब कैंपसों में दिखाई जा रही थी, जब उमर खालिद की गिरफ्तारी को छह साल पूरे हो चुके हैं।
उमर खालिद छह साल से जेल में
उमर खालिद को सितंबर 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फ़रवरी 2020 में हुए दंगों से जुड़े कथित बड़ी साज़िश के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उनके ख़िलाफ़ यूएपीए समेत कई क़ानूनों के तहत आरोप लगाए गए हैं। वह गिरफ्तारी के बाद से न्यायिक हिरासत में हैं और इस मामले में अभी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। यानी अदालत ने इस मामले में उनके ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों पर अभी अंतिम फ़ैसला नहीं दिया है।
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि फ़रवरी 2020 की हिंसा किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा थी और नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों को आयोजित करने वाले लोगों ने कथित तौर पर इसकी योजना बनाई थी। इन आरोपों का अंतिम न्यायिक परीक्षण अभी बाक़ी है।
2020 दिल्ली दंगों में क्या हुआ था?
फ़रवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सीएए के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा भड़क गई थी। कई दिनों तक चली हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। मृतकों में बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय के लोगों की थी।इस मामले में उमर खालिद के अलावा शरजील इमाम और कई अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया। आरोपियों के खिलाफ यूएपीए, आईपीसी की धाराओं, आर्म्स एक्ट समेत अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के तहत मामले दर्ज किए गए हैं। पुलिस ने आरोप लगाया है कि हिंसा के पीछे एक बड़ी साज़िश थी। आरोपी पक्ष इन आरोपों का विरोध करता रहा है और मामला अभी अदालत में विचाराधीन है।
NLSIU में भी टली थी इसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग
IIIT हैदराबाद से पहले इसी डॉक्यूमेंट्री को लेकर बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी यानी एनएलएसआईयू में भी विवाद हुआ था। एनएलएसयूआई में छात्र संगठन लॉ एंड सोसायटी कमिटी ने 14 सितंबर को डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का कार्यक्रम बनाया था। लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबवीपी ने इसका विरोध किया और स्क्रीनिंग रद्द करने की मांग की।
इसके बाद एनएलएसआईयू के छात्र संगठन ने कार्यक्रम को स्थगित कर दिया। आयोजकों ने इसके लिए 'लॉजिस्टिकल एंड सिक्योरिटी' यानी व्यवस्थागत और सुरक्षा संबंधी कारण बताए थे। आयोजकों ने यह भी कहा था कि कार्यक्रम को किसी बाहरी दबाव के कारण रद्द नहीं किया गया है और इसे बाद में आयोजित करने की योजना है। एबीवीपी ने इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कार्यक्रम को स्थायी रूप से रद्द करने की मांग की थी और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ जांच की मांग भी की थी।