भारत में इस साल चावल का उत्पादन करीब 1 करोड़ टन घटने का अनुमान है। कम बारिश और फसल पकने के महत्वपूर्ण दौर में नमी की कमी से पैदावार पर असर पड़ रहा है। उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक उत्पादन में यह गिरावट करीब 20 वर्षों में सबसे बड़ी हो सकती है। हालांकि पिछले वर्षों की रिकॉर्ड फसल के कारण सरकारी और राज्य भंडार में चावल का बड़ा स्टॉक मौजूद है, जिससे घरेलू आपूर्ति और निर्यात दोनों को तत्काल संकट से बचाने में मदद मिल सकती है।

154 मिलियन टन के रिकॉर्ड से करीब 10 मिलियन टन की कमी

राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्ण राव के मुताबिक, कम बारिश के कारण इस साल चावल का उत्पादन लगभग 10 मिलियन मीट्रिक टन कम हो सकता है। पिछले साल भारत में चावल का उत्पादन करीब 154 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर था। यदि इस साल 10 मिलियन टन की कमी आती है तो उत्पादन लगभग 144 मिलियन टन रह सकता है। यानी पिछले साल के मुकाबले करीब 6.5 फीसदी की गिरावट।

चावल उत्पादन में भारी गिरावट

मानसून की कमजोर बारिश बनी बड़ी वजह

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जून से शुरू हुए चार महीने के मानसून सीजन के दौरान भारत में सामान्य से करीब 15 फीसदी कम बारिश हुई है। कुछ प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी 42 फीसदी तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों के अनुसार हाल के सप्ताहों में लंबे समय तक चली शुष्क अवधि ने खासकर दक्षिण और पूर्वी भारत में चावल की फसल की संभावित पैदावार को प्रभावित किया है। चावल की फसल के पकने के समय पर्याप्त बारिश नहीं होने से प्रति हेक्टेयर उत्पादन घटने की आशंका है। यानी समस्या केवल बोए गए क्षेत्र की नहीं है, बल्कि जिस खेत में फसल खड़ी है वहां भी पैदावार कम होने का खतरा है।
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धान का रकबा भी करीब 4 फीसदी घटा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 11 सितंबर तक गर्मी में बोए गए चावल का क्षेत्रफल 4.268 करोड़ हेक्टेयर था। यह पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में करीब 4 फीसदी कम है। भारत के कुल चावल उत्पादन में गर्मी में बोई जाने वाली फसल की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है। बाकी उत्पादन सर्दियों में बोई जाने वाली फसल से आता है। इसलिए गर्मी की फसल के उत्पादन में कमी का कुल सालाना उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है।

सर्दियों की फसल पर भी पानी की चिंता

आने वाली सर्दियों की फसल को लेकर भी चिंता है। ओलम एग्री इंडिया के डिप्टी कंट्री हेड नितिन गुप्ता के मुताबिक, जलाशयों में सामान्य से कम पानी होने के कारण सर्दियों में बोए जाने वाले चावल का क्षेत्रफल भी प्रभावित हो सकता है। इसका मतलब यह है कि यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं आया तो उत्पादन पर दबाव केवल मौजूदा खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अगली फसल तक भी इसका असर दिखाई दे सकता है।

घरेलू बाजार में चावल महंगा होने लगा

उत्पादन घटने की आशंका का असर बाजार पर दिखाई देना शुरू हो गया है। घरेलू चावल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और निर्यात कीमतें एक साल से ज्यादा समय के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। भारत की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। भारत से उत्पादन कम होने पर वैश्विक बाजार में उपलब्ध चावल की मात्रा और कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। आमतौर पर थाईलैंड और वियतनाम जैसे अन्य प्रमुख निर्यातक देशों में भी चावल की कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे में भारत से आने वाले चावल की कीमत बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

किसानों को प्रीमियम चावल का बेहतर दाम मिल सकता है

कम उत्पादन और बाजार में बढ़ती कीमतों का एक दूसरा असर किसानों पर पड़ सकता है। राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी.वी. कृष्ण राव के मुताबिक, प्रीमियम किस्मों के चावल उगाने वाले किसानों को खुले बाजार में बेहतर कीमत मिल सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि किसान सरकारी खरीद व्यवस्था के बजाय खुले बाजार में अधिक चावल बेच सकते हैं। इससे सरकार द्वारा की जाने वाली खरीद प्रभावित होने की संभावना है।

फिर भी निर्यात पर तत्काल संकट क्यों नहीं?

उत्पादन में संभावित बड़ी गिरावट के बावजूद भारत के पास इतना बड़ा चावल भंडार है कि फिलहाल निर्यात पर तत्काल रोक लगाने की जरूरत दिखाई नहीं देती। 1 सितंबर 2026 तक भारत के राज्य भंडार में चावल और बिना मिलाए धान सहित कुल स्टॉक करीब 59.6 मिलियन टन था। यह मात्रा सरकार के 1 अक्टूबर के लिए निर्धारित 10.3 मिलियन टन के लक्ष्य से कई गुना ज्यादा है। यही विशाल स्टॉक इस समय भारत के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। पिछले कुछ वर्षों की रिकॉर्ड फसलों से जमा हुए भंडार के कारण इस साल उत्पादन घटने के बावजूद सरकार के पास घरेलू बाजार और निर्यात दोनों को संभालने की गुंजाइश है।

रिकॉर्ड निर्यात जारी रहने की संभावना

नई दिल्ली स्थित एक वैश्विक ट्रेडिंग कंपनी के डीलर के अनुसार, बड़े चावल भंडार की वजह से भारत उत्पादन घटने के बावजूद बिना किसी नए निर्यात प्रतिबंध के चावल का निर्यात जारी रख सकता है। इसका अर्थ यह है कि उत्पादन में करीब 6.5 फीसदी की संभावित गिरावट सीधे तौर पर भारतीय चावल निर्यात में उसी अनुपात की गिरावट में बदलना जरूरी नहीं है। पुराने स्टॉक से इस कमी की भरपाई की जा सकती है। हालांकि यदि उत्पादन में गिरावट अनुमान से ज्यादा होती है या घरेलू कीमतों में तेज वृद्धि जारी रहती है, तो सरकार के सामने घरेलू उपलब्धता और निर्यात के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।

भारत के लिए दोहरी चुनौती

मौजूदा स्थिति में भारत के सामने दो समानांतर चुनौतियां हैं।
  • पहली, कम बारिश और कम पैदावार से घरेलू बाजार में चावल महंगा हो सकता है।
  • दूसरी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत का चावल महंगा होने से उसकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब थाईलैंड और वियतनाम जैसे अन्य प्रमुख निर्यातक भी ऊंची कीमतों का सामना कर रहे हैं।

फिलहाल रिकॉर्ड सरकारी स्टॉक इस दबाव को संभालने में मदद कर रहा है। लेकिन यदि कमजोर बारिश का असर सर्दियों की फसल तक पहुंचता है, तो आने वाले महीनों में उत्पादन, कीमत और निर्यात की तस्वीर और महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारत में चावल उत्पादन में करीब दो दशकों की सबसे बड़ी गिरावट का अनुमान सामने आया है। कमजोर मानसून, फसल पकने के दौरान बारिश की कमी और घटे रकबे ने उत्पादन पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि 59.6 मिलियन टन का रिकॉर्ड स्टॉक तत्काल खाद्य आपूर्ति और निर्यात के लिए बड़ा बफर है। आने वाले महीनों में असली चुनौती यह होगी कि कम नई फसल के बीच इस बड़े स्टॉक का इस्तेमाल घरेलू कीमतों और निर्यात दोनों को किस तरह संतुलित करता है।