सरकार ने 3.25 लाख करोड़ रुपये की डील को मंजूरी दी है, जिसके तहत भारत को 114 राफेल लड़ाकू विमान मिलेंगे। जानिए रक्षा सौदे के रणनीतिक और आर्थिक मायने।
भारतीय वायुसेना को अब 114 राफेल लड़ाकू विमान और मिलेंगे। रिपोर्टों के अनुसार रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डीएसी ने गुरुवार को 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी है। यह डील क़रीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की है। यह भारत की सबसे बड़ी लड़ाकू विमान खरीद में से एक होगी। मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से रिपोर्टों में यह जानकारी दी गई है। यह फ़ैसला फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की इस महीने भारत यात्रा से ठीक पहले आया है।
डिफेंस प्रोक्योरमेंट बोर्ड ने पिछले महीने ही प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। अब डीएसी ने 'एक्सेप्टेंस ऑफ़ नेसेसिटी' दे दी है। अगला क़दम कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी यानी सीसीएस से अंतिम मंजूरी लेना होगा। इसके बाद दसॉ एविएशन के साथ औपचारिक बातचीत शुरू होगी। यह गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट डील हो सकती है।
डील में क्या शामिल है?
- कुल 114 राफेल विमान खरीदे जाएंगे।
- इनमें से 18 विमान तैयार हालत में फ्रांस से सीधे आएंगे।
- बाक़ी 96 विमान भारत में ही असेंबल होंगे और बनाए जाएंगे।
- 'मेक इन इंडिया' के तहत करीब 80% विमान देश में बनेंगे और इसमें स्वदेशी सामग्री 50-60% तक पहुंच सकती है।
- भारतीय वायुसेना में 88 सिंगल-सीट और 26 ट्विन-सीट राफेल शामिल होंगे।
फ्रेंच कंपनी दसॉ एविएशन भारतीय निजी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप करेगी, ताकि भारत में असेंबलिंग, मैन्युफैक्चरिंग और सपोर्ट सिस्टम मजबूत हो।
वायुसेना की मौजूदा स्थिति
भारतीय वायुसेना में फ़िलहाल स्क्वाड्रन की भारी कमी है। स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन के मुक़ाबले अभी सिर्फ़ 29 स्क्वाड्रन काम कर रहे हैं। पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर ख़तरे बढ़ रहे हैं, इसलिए यह डील बहुत ज़रूरी है। इससे वायुसेना की ताक़त काफ़ी बढ़ेगी।
अभी भारत के पास पहले से 36 राफेल विमान हैं। ये दो स्क्वाड्रन में हैं। हरियाणा के अंबाला में नंबर 17 'गोल्डन एरो' और पश्चिम बंगाल के हासिमारा में नंबर 101 'फाल्कन्स'। पहला राफेल जुलाई 2020 में अंबाला में शामिल हुआ था।
राफेल विमान की खासियत
राफेल एक मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जो हवा में लड़ाई, जमीन पर हमला और टोही मिशन सब कर सकता है। यह बेहद तेज, मज़बूत और आधुनिक हथियारों से लैस है। भारत में पहले से इस्तेमाल हो रहे राफेल ने अपनी क्षमता साबित की है। नई डील में भारतीय हथियारों को भी राफेल में जोड़ा जा सकेगा।
यह फ़ैसला भारत की रक्षा क्षमता बढ़ाने और आत्मनिर्भर भारत बनाने की दिशा में बड़ा क़दम है। इसके साथ ही, फ्रांस के साथ रक्षा साझेदारी और मजबूत होगी। डील से देश में रोजगार भी बढ़ेगा और डिफेंस इंडस्ट्री को फायदा होगा। अभी डील अंतिम रूप से साइन होने वाली है, लेकिन डीएसी की मंजूरी से यह प्रक्रिया तेज हो गई है।10 साल पहले हुआ था विवाद
भारत सरकार द्वारा 2016 में फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर विवाद हुआ था। विपक्ष द्वारा आरोप लगाए जाने के कारण यह भारत की राजनीति में 2017-2019 के बीच सबसे बड़ा मुद्दा रहा।
दरअसल, मूल टेंडर यूपीए सरकार के समय 2007-2012 का था। भारतीय वायुसेना के लिए 126 मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की खरीद की प्रक्रिया शुरू हुई। इसमें राफेल को 2012 में टेक्निकल रूप से सबसे बेहतर माना गया था। योजना थी कि पहले 18 विमान तैयार हालत में आएंगे और बाकी 108 भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल के साथ मिलकर बनाए जाएंगे, जिसमें ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी शामिल था। प्रति विमान अनुमानित क़ीमत लगभग 526 करोड़ रुपये थी।
लेकिन 2015-2016 में बदलाव हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा में अचानक घोषणा हुई कि अब केवल 36 राफेल ही तैयार हालत में खरीदे जाएंगे।
पुराना 126 का टेंडर रद्द हो गया। यह नया सौदा 2016 में इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट के तहत फाइनल हुआ। कुल क़ीमत लगभग 58,000-59,000 करोड़ रुपये बताई गई। आरोप लगाया गया कि यूपीए के समय प्रति विमान 526 करोड़ का था, जबकि नई डील में 1600-1670 करोड़ प्रति विमान खरीदा गया। कुल अतिरिक्त लागत 41000 करोड़ का नुकसान होने का दावा किया गया। सरकारी एचएएल की जगह अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पार्टनर बनाए जाने पर भी आपत्ति की गई। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि भारत सरकार ने रिलायंस का नाम सुझाया था। बिना टेंडर के सीधे खरीद, सुरक्षा समझौते का हवाला देकर कीमत गोपनीय रखना और एचएएल को बाहर करने पर अनियमितता के आरोप लगे।
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा तो इसने दिसंबर 2018 में सर्वसम्मति से कहा कि डील में कोई अनियमितता, भ्रष्टाचार या प्रक्रियागत गड़बड़ी नहीं पाई गई। नवंबर 2019 में पुनर्विचार याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं और अदालत ने सील्ड कवर में सरकार के दस्तावेज देखे और क्लीन चिट दे दी।