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चीन को रोकने के लिए भारत- अमेरिका सुरक्षा क़रार?

ऐसे समय जब भारत और चीन के  लगभग एक लाख सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास तैनात हैं और दोनों देशें की सेनाओं के बीच 7 दौर की बातचीत नाकाम हो चुकी है, भारत और अमेरिका ने एक बहुत ही अहम रक्षा सहयोग समझौते पर दस्तख़त किए हैं। 
इससे दोनों देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच सहयोग ही  नहीं बढ़ेगा, बल्कि वायु सेना और नौसेना भी एक दूसरे को सहयोग करेंगी। इस क़रार के बाद अमेरिका से भारत के रिश्ते निकट के सहयोगी (क्लोज़ अलाई) के हो जाएंगे। इस समझौते के बाद नैटो सदस्यों को अमेरिका जिस तरह की मदद करता है, उससे कुछ कम ही सहयोग वह भारत को कर सकेगा। 
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2+2 बातचीत

दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच बातचीत के बाद बेसिक एक्सचेंज एंड को-ऑपरेशन एग्रीमेंट (बीईसीए यानी बेका) पर दस्तख़त हो गए। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने एस. जयशंकर और राजनाथ सिंह से बात की है। 
इसे  ‘टू प्लस टू’ बातचीत कहा जाता है, यानी दो देशों के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री ने बातचीत की। यह ‘टू प्लस टू’ की तीसरी बातचीत है। इसके पहले यह बातचीत दो बार यानी 2018 और 2019 में हो चुकी है और लगभग इसी समय हुई है। 

छाया रहा चीन

लेकिन इस बार की बातचीत में चीन का मुद्दा बुरी तरह छाया रहा और ऐसा लगता रहा कि मानो चीन की वजह से ही बातचीत हो रही है, हालांकि ऐसा नहीं है। 
बातचीत की पृष्ठभमि में चीन छाया रहा, यह तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों देशों के मंत्रियों के बयानों से ही साफ है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से जब एक भारतीय पत्रकार ने बेलाग सवाल किया कि क्या यह चीन की वजह से हुआ है तो उन्होंने कहा कि ‘इस बातचीत के एक नहीं, कई कारण हैं।’

विदेश मंत्री ने क्या कहा?

जयशंकर ने चीन का नाम नहीं लिया, पर उन्होंने जो कुछ कहा, उससे साफ है कि चीन बड़ा मुद्दा बना रहा। उन्होंने कहा कि ‘दोनों देशों के बीच यह बातचीत ज़रूरी इसलिए थी कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति बनी रहे और अंतरराष्ट्रीय समुद्र में सबको बेरोकटोक आने जाने की छूट मिलती रहे।’
हालांकि कूटनीति की भाषा में इसे ‘फ्रीडम ऑफ़ नैविगेशन’ कहते हैं और जयशंकर ने भी इसी शब्द का इस्तेमाल किया, पर इसका अर्थ गहरा है यह सबको मालूम है। 
‘फ्रीडम ऑफ नैविगेशन’ का अर्थ साफ है कि हिंद-प्रशांत सागर में सबको अपने जहाज़ लाने- ले जाने की छूट हो, सबको सबकुछ करने की छूट हो, यानी किसी एक देश का कब्जा न हो। साफ शब्दों में कहा जाए तो चीन का प्रभुत्व न हो।

बहुध्रुवीय एशिया का मतलब?

इसी तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि ‘आज के समय बहुध्रुवीय विश्व के लिए यह ज़रूरी है कि बहुध्रुवीय एशिया हो।’ उन्होंने चीन का नाम फिर नहीं लिया, पर मतलब साफ है कि एशिया पर बीजिंग का दबदबा न हो, इसलिए यह बातचीत ज़रूरी थी। 
चीजें साफ हैं, और दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने अपरोक्ष रूप से यह मान भी लिया कि चीन की दादागिरी रोकने के लिए यह बातचीत ज़रूरी थी। 

भारत को क्या मिलेगा?

यह तो हुई कूटनीतिक बात। इस क़रार पर दस्तख़त करने  से भारत को सुरक्षा के क्षेत्र में अमेरिका से जो मिलेगा, वह बेहद महत्वपूर्ण है। 
‘बेका’ पर दस्तख़त होने के बाद अमेरिका भारत को जियो स्पैशियल तसवीरे यानी सैटेलाइट से ली गई तसवीरें साझा कर सकेगा। इसके तहत अमेरिकी सुरक्षा ख़ुफ़िया उपग्रहों से ली गई मिसाइल, ड्रोन व दूसरे हथियारों व प्रणालियों की तसवीरें भारत को मिलेंगी।
याद दिला दें कि गलवान संकट के समय अमेरिका ने वहां मौजूद चीनी सैनिकों और उनके साजो-सामान की कई तसवीरें भारत को दी थीं, हालांकि उस समय तक यह करार नहीं हुआ था। उपग्रह से ली गई तसवीरों के अलावा टेलीफोन इंटरसेप्ट, डाटा एक्सचेंज और दूसरी ख़फ़िया जानकारियाँ भी अमेरिका भारत को देगा।

नौसेना सहयोग

दोनों देशों की वायु सेना और नौसेनाओं के बीच भी सहयोग इससे बढ़ेगा। इस पर विस्तार से जानकारी तो अभी नहीं मिल सकी है, पर यह साफ है कि अमेरिका का ज़ोर नौसेना सहयोग पर है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने खुले आम कहा कि दोनों देशों के बीच मैरीटाइम यानी नौसेना सहयोग बढ़ाया जाएगा। 
उन्होंने आज भी कहा और पहले भी कह चुके हैं कि भारत अमेरिका के हिंद-प्रशांत रणनीति का हिस्सा है।
अमेरिका भारतीय नौसेना को हिंद- प्रशांत क्षेत्र में आगे बढ़ाएगा। ज़ाहिर है, वह दक्षिण चीन सागर समेत पूरे क्षेत्र में चीन को रोकने के लिए भारत की मदद करेगा और अपने हित में उसका इस्तेमाल भी करेगा।
नौसेना सहयोग के बारे में भी विस्तृत जानकारी बाद में ही मिल सकेगी, पर यह साफ है कि दोनों देशों का मक़सद चीन को रोकना है। इसमें भारत से ज़्यादा दिलचस्पी अमेरिका की है। 

क्वाड से आगे

इसके साथ यदि क्वाडिलैटरल स्ट्रैटेजिक डॉयलॉग यानी ‘क्वाड’ की पिछली बैठक को जोड़ लिया जाए तो साफ है कि दोनों देश मिल कर बीजिंग की घेराबंदी करना चाहते हैं। इस तरह यह ‘बेका’ क़रार ‘क्वाड’ को आगे बढाएगा। 
नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गनाइजेशन यानी नैटो एक सैनिक गठबंधन है, जिसमें अमेरिका और शीत युद्ध दिनों के उसके सहयोगी हैं। भारत-अमेरिका के इस क़रार के बाद नई दिल्ली नैटो देशों के आसपास पहुँच जाएगा, यानी जो सुविधाएं नैटो देशों को अमेरिका देता है, उससे थोड़ी कम सुविधाएं भारत को मिल सकेंगी। 

नैटो की सुविधाएं?

पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस क़रार पर दस्तख़त होने के बाद भारत अमेरिका का निकट का सहयोगी बन जाएगा, उसे पाकिस्तान से भी अधिक सुविधाएं मिल सकेंगी। वायु सेना, नौसेना, ख़ुफ़िया जानकारी और साजो सामान की अदलाबदली हो सकेगी। 
इससे भारत को यह फ़ायदा ज़रूर होगा कि वह चीन के सामने तन कर खड़ा हो सकेगा। लेकिन भारत से अधिक फ़ायदा अमेरिका को होगा, क्योंकि वह भारत को आगे बढ़ा कर चीन को रोक सकेगा।
इस तरह वह भारत की मदद तो करेगा, पर अपने सैनिकों, जहाज़ों, साजो-सामान का इस्तेमाल किए बग़ैर ही चीन पर अंकुश लगा सकेगा। इस तरह हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर उसका दबदबा बढ़ेगा, दक्षिण चीन सागर पर वह अपना प्रभाव बढ़े सकेगा।

भारत-चीन

चीन को रोकने में अमेरिकी मदद मिलने से भारत को यह फ़ायदा होगा कि बीजिंग के साथ भविष्य में होने वाली बातचीत में उसका पलड़ा भारी होगा। चीन पर एक तरह का दबाव रहेगा और मौजूदा घुसपैठ की तरह वह भविष्य के किसी घुसपैठ के पहले सोचेगा।
पर इसका दूसरा पक्ष यह है कि भारत जाने-अनजाने अमेरिका के जाल में फंस गया, जहां वह धीरे-धीरे अमेरिकी रक्षा नीतियों को लागू करता हुआ देखा जाएगा। हालांकि माइक पॉम्पिओ ने इस बातचीत को भारत की संप्रभुता से जोड़ने की कोशिश की और कहा कि यह भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए ज़रूरी है। उन्होंने गलवान घाटी में हुई झड़प में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की श्रद्धांजलि भी दीं।  
अमेरिका के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी मुलाक़ात की।

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