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कमला हैरिस-जो बाइडन जीते तो क्या भारत से ख़राब होंगे अमेरिका के रिश्ते?

नरेंद्र मोदी और रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप  की दोस्ती जगज़ाहिर है। चाहे वह ‘हाउडी मोदी’ हो या फिर ‘नमस्ते ट्रंप’, हर जगह दोनों नेताओं के बीच की केमिस्ट्री साफ़ दीखती है। ऐसे में यह सवाल खड़ा हो गया है कि अगर नवंबर में अमेरिका में होने वाले चुनाव में राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडन जीतते हैं तो भारत और अमेरिकी रिश्तों का क्या होगा? 

भारत की आलोचना

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा, नागरिकता संशोधन क़ानून, एनआरसी, मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों, ख़ास कर मुसलमानों, के प्रति जो बाइडन और कमला हैरिस की नीतियाँ बीजेपी की नीतियों से उलट हैं। ऐसी छवि बन रही है कि इन अमेरिकी नेताओं की नीतियाँ भारत-विरोधी हैं और यदि जो बाइडन राष्ट्रपति बन गए तो भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते बिगड़ सकते है।
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जो बाइडन ने राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने के बाद जो अपना पॉलिसी स्टेटमेंट दिया, उसमें अल्पसंख्यक और कश्मीर, ये दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर वह खुले रूप से भारत की आलोचना करते दिखते हैं।
बाइडन ने बहुत ही स्पष्ट रूप से कहा कि सीएए और एनआरसी की नीतियाँ स्वयं भारत की अब तक की ‘धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी विचारधारा’ से मेल नहीं खाती हैं।
कश्मीर के मुद्दे पर उन्होंने खुले आम कहा है कि भारत सरकार को तुरन्त ‘कश्मीरियों के राजनीतिक व मौलिक अधिकार’ बहाल करना चाहिए। 

क्या कहा कमला हैरिस ने?

उनकी सहयोगी कमला हैरिस तो उनसे दो कदम आगे हैं। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि ‘कश्मीरी यह न समझें कि वे दुनिया में अकेले हैं, ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप किया जा सकता है।’
इसके पहले सीएए के मुद्दे पर अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेज़ेन्टेटिव्स की सदस्य प्रमिला जयपाल के बयानों से भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने कहा कि वह उस प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिलेंगे, जिसमें प्रमिला होंगी। कमला हैरिस ने इस पर प्रमिला जयपाल का समर्थन करते हुए कहा कि ‘किसी भी विदेशी ताक़त को यह नही कहना चाहिए कि अमेरिकी सदन में होने वाली किस बैठक में कौन शिरकत करेगा।’ 
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि कमला हैरिस और जो बाइडन ने जो बातें कश्मीर, सीएए, एनआरसी और मुसलमानों के बारे में कही हैं, वे तो भारत में करोड़ों लोग कह रहे है। वे बीजेपी से सहमत नहीं हैं, पर भारतीय हैं।

भारत-विरोधी?

भारतीयों ने ही तो सीएए, एनआरसी के मुद्दे पर लंबा संघर्ष किया है। उनकी बातों और कमला हैरिस-जो बाइडन की बातों में बुनियादी अंतर नहीं है।
रविवार की एक बैठक में कमला-बाइडन की जोड़ी ने ये साफ़ करने की कोशिश की कि वे भारत विरोधी नहीं हैं, यह बात भारतीय नीति-निर्माता समझें। 

भारत का साथ देंगे बाइडन?

जो बाइडन ने कहा कि राष्ट्रपति चुने जाने पर वह भारत के साथ रहेंगे और सीमा पर किसी तरह की चुनौती आने पर भारत का साथ देंगे। बाइडन का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत की सरज़मीं पर लगभग 40 हज़ार चीनी सैनिक जमे हुए हैं। भारत सरकार के बार-बार कहने और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और मिलिटरी कमिशन के उच्च अधिकारियों से मिल कर भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ है। 
बाइडन ने यह भी कहा कि ‘लोकतंत्र में मतभेद तो रहते ही है’, पर वह भारत के साथ ‘दोस्त की तरह बैठ कर बात करेंगे।’
‘साउथ एशियन्स फ़ॉर बाइडन’ नामक इस कार्यक्रम में कमला हैरिस ने अपने भाषण में भारत की आज़ादी की लड़ाई, महात्मा गांधी और अमेरिकी अश्वेत नेता मार्टिन लूथर किंग की चर्चा की। उन्होंने कहा कि ‘भारत में सहिष्णुता, बहुलतावाद, और अनेकता में एकता है’ और इन्ही कारणों से उसने इतनी प्रगति की है।

परमाणु-क़रार

बाइडन ने 2005 में मनमोहन सिंह सरकार के समय भारत-अमेरिका परमाणु क़रार की याद दिलाई और उसमें अपनी भूमिका की चर्चा की। बता दें कि 2005 में हुए इस क़रार के समय जो बाइडन सीनेटर थे और उन्होंने इस प्रस्ताव पर बराक ओबामा के साथ मिल कर वोट किया था। 
बाइडन ने याद दिलाया कि उन्होंने उस समय कहा था कि भारत के साथ रहने से अमेरिका भी सुरक्षित है और इस परमाणु समझौते से दोनों देशों को फ़ायदा होगा। 
कमला हैरिस ने बार-बार अपने भारतीय मूल की बात कही, अपने नाना-नानी की चर्चा की और बचपन व छात्र दिनों में तमिलनाडु स्थित अपनी नानी के घर जाने की यादें साझा कीं। 
यह समझना ज़रूरी है कि भारत का सत्तारूढ़ दल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति और जो बाइडन के विरोधी डोनल्ड ट्रंप के नज़दीक हैं। यह नज़दीकी इसलिए है कि दोनों ही दक्षिणपंथी रुझान के है, दोनों की ही छवि अल्पसंख्यक विरोधी की है, यानी दोनों में वैचारिक समानता है।

अबकी बार, ट्रंप सरकार!

इस वैचारिक समानता की वजह से मोदी ने अमेरिका के टेक्सस में ‘हाउडी मोडी’ कार्यक्रम में तमाम राजनयिक परंपरा को ताक पर रखा कर ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा तक लगा दिया।
हालाँकि यह भी सच है कि तमाम दोस्ती के बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को मिलने वाले व्यापारिक रियायतों को ख़त्म कर दिया, आयात पर मिल रही कम टैक्स की सुविधा छीन ली, भारतीय आयात पर टैक्स बढ़ा दिया और कुछ भारतीय आयातों पर काउंटरवेलिंग तो कुछ पर एंटी डंपिंग टैक्स थोप दिया।

भारत की मुश्किलें

भारत के लिए अमेरिका निर्यात करना मुश्किल हो चुका है। और उस पर तुर्रा यह कि ट्रंप बार-बार भारत से कहते है कि वह अमेरिकी उत्पादों को अपने बाज़ार में अधिक सुविधाएं दे। 
भारत को लेकर ट्रंप क्या सोचते हैं, इसे इससे समझा जा सकता है कि उन्होंने कोरोना के इलाज के लिए क्लोरोक्विन दवा की माँग भारत से की और खुले आम प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत ने उनकी बात नहीं मानी तो वह ‘बदले की कार्रवाई करेगे।’ भारत ने उसी दिन क्लोरोक्विन निर्यात पर लगा प्रतिबंध वापस ले लिया। 
सवाल यह है कि मोदी सरकार की विदेश नीति उनकी निजी पसंद-नापसंद से तय होगी या इस सच्चाई से कि भारत को किससे फ़ायदा है। ऐसे में रविवार को बाइडन और कमला हैरिस के बयान और उनका रवैया बेहद अहम है।
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