राजनीतिक सलाहकार कंपनी आई-पैक ने रोहतक की एक फर्म से ₹13.5 करोड़ का लोन लिया। लेकिन जांच से पता चला है कि लेन-देन से कई साल पहले ही कंपनी भंग हो चुकी थी। आई-पैक ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का काम देखती है। उसकी मुश्किलें बढ़ रही हैं।
कोलकाता में आई-पैक का दफ्तर
राजनीति के बिसात पर गोटियां बिछाने वाली मशहूर कंसल्टेंसी फर्म I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) इन दिनों एक ऐसे 'लोन' को लेकर विवादों में है, जिसकी परतें जितनी उधेड़ी जा रही हैं, रहस्य उतना ही गहराता जा रहा है। एक तरफ करोड़ों के लेनदेन का दावा है, तो दूसरी तरफ हकीकत के धरातल पर उस कंपनी का वजूद ही नहीं है जिससे यह पैसा लिया गया। प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने हाल ही में आई-पैक के कोलकाता दफ्तर पर छापा मारा था। जिसके बाद तमाम राजनीतिक विवाद शुरू हो गए।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, I-PAC ने आधिकारिक दस्तावेजों में यह घोषणा की कि उसने साल 2021 में हरियाणा के रोहतक स्थित एक कंपनी से 13.50 करोड़ रुपये का 'अनसिक्योर्ड लोन' (बिना गारंटी का कर्ज) लिया था। कंपनी का नाम बताया गया- 'रामसेतु इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया (पी) लिमिटेड'।
लेकिन जब इस दावे की पड़ताल की गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जिस पते (अशोक प्लाजा, दिल्ली रोड, रोहतक) पर इस कंपनी का होना बताया गया था, वहां ऐसी किसी कंपनी का नामोनिशान तक नहीं मिला।
कागजों से गायब कंपनी का 'लेनदेन
रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (ROC) के रिकॉर्ड खंगालने पर पता चला कि 'रामसेतु इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' नाम की एक कंपनी साल 2013 में बनी तो थी, लेकिन उसे अगस्त 2018 में ही आधिकारिक तौर पर बंद (Struck off) कर दिया गया था।हैरानी की बात यह है कि I-PAC ने लोन लेने की तारीख 2021 बताई है। यानी जिस कंपनी का वजूद तीन साल पहले ही खत्म हो चुका था, उसने I-PAC को साढ़े तेरह करोड़ रुपये कैसे दे दिए? इतना ही नहीं, जून 2025 की एक अन्य घोषणा में I-PAC ने यह भी कहा कि उसने इस कर्ज में से 1 करोड़ रुपये चुका दिए हैं और अब 12.50 करोड़ का बकाया है।
रिपोर्ट के अनुसार, जब रोहतक की उस बंद हो चुकी कंपनी के पुराने शेयरधारकों से संपर्क किया गया, तो उनके जवाब और भी हैरान करने वाले थे। संदीप राणा (शेयरधारक) ने कहा: "हमने कंपनी खोली थी लेकिन कोई काम नहीं हुआ और जल्द ही इसे बंद कर दिया गया। हमें किसी लेनदेन की जानकारी नहीं है।" विजेंदर (शेयरधारक) ने कहा: "कंपनी जमीन के सौदे के लिए बनी थी, पर कुछ काम नहीं बना तो हमने इसे खत्म कर दिया। मैं तो सालों से बाकी पार्टनर्स के संपर्क में भी नहीं हूँ।" कंपनी के सभी छह पूर्व शेयरधारकों ने एक सुर में कहा कि वो न तो I-PAC को जानते हैं और न ही कभी कोई लोन दिया।
इस पूरे मामले पर जब I-PAC के को-फाउंडर प्रतीक जैन, चार्टर्ड अकाउंटेंट पूनम चौधरी और कंपनी सेक्रेटरी से इंडियन एक्सप्रेस ने सवाल पूछे, तो किसी ने भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया। ईमेल और फोन कॉल्स का कोई उत्तर नहीं मिला, जिससे संदेह और गहरा गया है।
राजनीतिक तूफान और ED की जांच
यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब I-PAC पहले से ही जांच एजेंसियों के रडार पर है। हाल ही में कोलकाता में इसके निदेशक के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप ने इसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया था।अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह 'लोन' महज कागजी हेरफेर है? क्या 13.50 करोड़ की यह रकम कहीं और से आई थी जिसे छिपाने के लिए एक बंद हो चुकी कंपनी का नाम इस्तेमाल किया गया? फिलहाल, रोहतक के उस बंद दफ्तर और गायब हो चुकी कंपनी ने भारतीय राजनीति और कॉर्पोरेट जगत में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
आईपैक को किसने खड़ा किया
आई-पैक (I-PAC) यानी 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' की नींव मुख्य रूप से राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अपने सहयोगियों प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल के साथ मिलकर रखी थी। इसकी शुरुआत साल 2013 में 'सिटिजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस' (CAG) के रूप में हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान को तकनीक और डेटा के माध्यम से आधुनिक बनाना था। बाद में साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान इसे औपचारिक रूप से 'I-PAC' का नाम दिया गया।
यह कंपनी भारत के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ काम कर चुकी है। आई-पैक ने भारतीय जनता पार्टी (2014 लोकसभा चुनाव), जनता दल यूनाइटेड (बिहार), आम आदमी पार्टी (दिल्ली विधानसभा), वाईएसआर कांग्रेस (आंध्र प्रदेश), तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल), और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (तमिलनाडु) जैसे दलों के लिए चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा, कांग्रेस के लिए भी इन्होंने उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में रणनीति तैयार की थी।
आई-पैक से कई नामी हस्तियां और प्रभावशाली व्यक्तित्व जुड़े रहे हैं। प्रशांत किशोर इसके सबसे चर्चित चेहरे रहे हैं, जिन्हें आज भारतीय राजनीति में एक बड़े ब्रांड के तौर पर देखा जाता है। उनके अलावा, आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और रॉबिन शर्मा जैसी हस्तियां इस संगठन के मुख्य स्तंभ रहे हैं। यह संस्थान अपनी डेटा-संचालित रणनीतियों जैसे 'नीतीश के सात निश्चय', 'दीदी के बोलो', और 'नवरत्नालु' के लिए मशहूर है, जिसने भारतीय राजनीति में कैंपेन मैनेजमेंट का स्वरूप बदल दिया है।