एलपीजी के बाद खाद संकट बढ़ने वाला है। ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज का समुद्री रास्ता बंद है। खाद की सप्लाई रुक गई है। सल्फर न आने की वजह से प्लांट बंद हो गए है। खाद की कीमतें बढ़ रही हैं। किसान संकट में है। सरकार भरोसे पर है।
ईरान युद्ध की वजह से भारत में फर्टिलाइज़र संकट बढ़ रहा है।
ईरान युद्ध के चलते होर्मुज से गुजरने वाली खाद की शिपमेंट प्रभावित होने लगी है, जिससे सल्फर जैसे प्रमुख रसायनों की आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। भारत के किसानों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होने वाली है। ग्लोबल मार्केट में खाद के दाम भी चढ़ गए हैं।
भारत में यूरिया कंपनियों के प्लांट बंद
इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक ईरान युद्ध के कारण कतर से यूरिया की लिक्विड प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति बंद हो गई है। इस वजह से भारत में कुछ यूरिया कंपनियों ने अपने प्लांट बंद कर दिए हैं। खाद की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड सहित कई कंपनियों ने या तो अपने कुछ प्लांटों को बंद कर दिया है या नियमित मरम्मत का काम शुरू कर दिया है। उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एलएनजी की आपूर्ति फिर से शुरू होने पर किसी बंद प्लांट को दोबारा चालू करने में एक महीने तक का समय लग सकता है।
एलएनजी यूरिया उत्पादन का सबसे प्रमुख कच्चा माल है। ऊर्जा स्रोत होने के साथ-साथ दुनिया के सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले उर्वरक के निर्माण में एक महत्वपूर्ण एलीमेंट भी है। भारत के खाद उद्योग में एलएनजी की खपत लगभग 70% है।
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल खाद व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इस संकट से प्रभावित हो सकता है। खेती में खाद की हिस्सेदारी 25 फीसदी से ज्यादा होती है। खाद सप्लाई में बाधा सीधे किसानों की लागत और फसलों की उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। अमेरिका में Council on Foreign Relations के सीनियर फेलो Michael Werz ने अल जज़ीरा को बताया कि एलएनजी की शिपमेंट में तेज गिरावट आई है, जो नाइट्रोजन आधारित खाद के लिए महत्वपूर्ण फीडस्टॉक है। इससे यूरिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव पूरी दुनिया में बन रहा है।
रिसर्च एजेंसी BMI के अनुसार ईरान युद्ध फिलहाल खाद के मामले में अमेरिका और चीन को सीधे प्रभावित नहीं कर रहा। एजेंसी ने चेतावनी दी है कि भारत के लिए जोखिम सबसे अधिक है, क्योंकि देश में खाद की मांग का महत्वपूर्ण समय मार्च के अंत से अप्रैल तक रहता है। भारत में मई से मक्का की बुआई शुरू होती है, जो खाद पर अत्यधिक निर्भर फसल है। फॉस्फेट उत्पादन का पीक सीजन जून से शुरू होता है। इस समय आयात बाधित होना कृषि उत्पादन पर गंभीर असर डाल सकता है।
International Food Policy Research Institute के अनुसार ग्लोबल खाद निर्यात का 20-30 प्रतिशत हिस्सा, जिसमें यूरिया, अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर शामिल हैं, Hormuz समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। एजेंसी ने चेतावनी दी कि अगर संघर्ष लंबा चला तो फारस की खाड़ी क्षेत्र के समुद्री व्यापार में बाधा आएगी, जिससे ऊर्जा और खाद की कीमतें बढ़ेंगी और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा पैदा होगा।
संघर्ष से प्रभावित बहरीन, ओमान, कतर और सऊदी अरब यूरिया, डायमोनियम फॉस्फेट (DAP) और एन्हाइड्रस अमोनिया के प्रमुख निर्यातक हैं। शिपिंग गतिविधियों में गिरावट से वैश्विक खाद निर्यात पर “कैस्केडिंग प्रभाव” पड़ सकता है।
(एक के बाद एक टैक्स की स्थिति को कैस्केडिंग प्रभाव कहा जाता है। इसमें उत्पादन और वितरण के हर चरण पर कई टैक्स लगते हैं। कैस्केडिंग प्रभाव से वस्तु या सेवाओं की अंतिम कीमत में भारी बढ़ोतरी हो जाती है।)
BMI का अनुमान है कि अगर ईरान युद्ध एक महीने से ज्यादा चला तो भारत में खाद का इस्तेमाल कम हो सकता है। इसके अलावा अलनीनो की संभावना से पहले से ही फसलों की स्थिति खराब हो सकती है। यानी सूखा पड़ने पर कृषि उत्पादन पर चौतरफा मार हो सकती है। कम खाद के इस्तेमाल से फसलों की पैदावार घट सकती है और खेती से जुड़ी चीजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की नौबत आ सकती है। भारत आपूर्ति अंतर को भरने के लिए रूस से अधिक आयात की कोशिश कर सकता है, लेकिन तीन महीने से अधिक संकट रहने पर उत्पादन में कमी लगभग तय हो जाएगी।
भारत की मांग पर चीन का रुख
भारत सरकार ने चीन से खाद शिपमेंट भेजने का अनुरोध किया था। लेकिन चीन ने ठंडा रुख दिखाया। चीन ने अब खाद निर्यात पर रोक लगा दी है। चीन यूरिया (नाइट्रोजन आधारित उर्वरक) का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक है। चीन कोटे के जरिए निर्यात को सख्ती से नियंत्रित करता है और उसने इस साल शिपमेंट के लिए कोई परमिट जारी नहीं किया है। चीन नाइट्रोजन उर्वरक उद्योग संघ ने कहा कि मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष वैश्विक उत्पादन को कम कर सकता है। हालांकि चीन इस वर्ष रिकॉर्ड 76.5 मिलियन टन यूरिया उत्पादन करने की राह पर है।
वैश्विक कीमतों में उछाल
मिडिल ईस्ट में यूरिया की कीमत एक सप्ताह में 19% बढ़ी।अमेरिकी खाड़ी क्षेत्र में ग्रेन्युलर यूरिया की कीमत 2–11 मार्च के बीच 15.9% बढ़ी। 5 मार्च को यूरिया कीमत 590 डॉलर प्रति टन से ऊपर पहुंच गई। अमेरिकी खाड़ी में DAP कीमत 655 डॉलर प्रति टन दर्ज हुई।हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतें अभी भी 2021-22 के रिकॉर्ड स्तर से नीचे हैं, लेकिन यह वृद्धि ऐसे समय में आई है जब किसानों को पहले से ही अनाज और तिलहन की कम कीमतों का सामना करना पड़ रहा है।
अगर होर्मुज में तनाव जल्द खत्म नहीं हुआ तो खाद सप्लाई, कृषि लागत, फसल उत्पादन और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। जिसमें भारत सबसे अधिक संवेदनशील देशों में शामिल है। भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशियाई देशों में कृषि लागत में बढ़ोतरी का असर फसलों की कीमतों और व्यापक महंगाई पर भी पड़ेगा। भारत चावल का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। इसी तरह गेहूं, कपास और चीनी के मामले में भी दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।