जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों के साथ पुलिस के कथित दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि वह इन आरोपों की जाँच के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर रही है। इस समिति में पूर्व महिला न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया जा सकता है।
यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रही महिला पत्रकारों के साथ कथित बदसलूकी का है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर प्रदर्शन कवर करने वाली महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए जरूरी निर्देश देने की मांग की है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने पत्रकारों और सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वालों की पहचान को लेकर सवाल उठाए। हालाँकि, अदालत ने साफ़ किया कि महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप गंभीर हैं और इनकी जांच की ज़रूरत पर विचार किया जा रहा है।
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'रील बनाने वाले और स्वतंत्र पत्रकार...': केंद्र

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आज के तकनीकी दौर में मोबाइल फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति पत्रकार होने का दावा कर सकता है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर कई लोग माइक लेकर वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर रील के रूप में अपलोड कर देते हैं। मेहता ने अदालत में कहा कि ऐसे हालात में यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन स्वतंत्र पत्रकार है और कौन केवल रील बनाने के लिए वहां मौजूद है।
हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए कि किसी भी महिला के साथ अनुचित व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। इसमें महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। केंद्र की दलील का एक अहम पहलू यह था कि महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए व्यापक या एकमुश्त निर्देश जारी करने से पहले पुलिस की कार्रवाई और उपलब्ध तथ्यों की जाँच की जानी चाहिए। मेहता ने समिति गठित करने और महिला पत्रकारों के ख़िलाफ़ किसी भी एफ़आईआर पर रोक लगाने जैसे व्यापक निर्देशों को लेकर अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई।

मामला गंभीर, स्वतंत्र जांच पर भी विचार: SC

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने महिला पत्रकारों के साथ कथित उत्पीड़न के आरोपों को गंभीर बताया। सॉलिसिटर जनरल ने भी माना कि मामला गंभीर है और कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई जा सकती है। इसमें मुख्य रूप से पूर्व महिला न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त IPS अधिकारियों को शामिल करने पर विचार किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वह इस पहलू पर विचार कर रही है कि पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए या नहीं।

इंदिरा जयसिंह ने अदालत को दो रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में देने की पेशकश की। इनमें से एक में उन महिला पत्रकारों के नाम होंगे जिन्होंने कथित उत्पीड़न की शिकायत की है। दूसरी रिपोर्ट में उन पूर्व महिला न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों के नाम होंगे, जिन पर जांच समिति में शामिल करने के लिए विचार किया जा सकता है। जयसिंह ने कहा कि मामले को संवेदनशीलता के साथ देखने और प्रदर्शन कवर करने वाली महिला पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत है। हालाँकि, सुनवाई के दौरान समिति बनाने पर विचार करने का संकेत दिया गया है। 

पत्रकार, स्वतंत्र रिपोर्टर, इन्फ्लुएंसर में अंतर पर बहस

सुनवाई में पत्रकारों की पहचान और उनके अधिकारों का सवाल भी उठा। अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के बीच अंतर कैसे किया जाए और प्रदर्शन कवर करते समय किस तरह की सुरक्षा उपलब्ध होनी चाहिए। केंद्र सरकार ने कहा कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के दौर में केवल कैमरा या माइक लेकर रिपोर्टिंग करने वाले हर व्यक्ति की पेशेवर पहचान तय करना आसान नहीं है।
दूसरी ओर, याचिका में महिला पत्रकारों की सुरक्षा और उनके साथ कथित दुर्व्यवहार की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। इस बहस का महत्व इसलिए भी है क्योंकि विरोध प्रदर्शन जैसे संवेदनशील मौकों पर घटनाओं को रिकॉर्ड करने और सार्वजनिक करने वाले लोगों की भूमिका अहम होती है। हालांकि, किसी व्यक्ति की पत्रकारिता की पहचान को लेकर सवाल उठने से महिला के साथ कथित हिंसा या दुर्व्यवहार के आरोपों की जांच की जरूरत ख़त्म नहीं हो जाती। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी विचार का विषय है कि ऐसे मामलों में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कौन-से व्यावहारिक और कानूनी उपाय किए जा सकते हैं।

3, 10 और 11 अक्टूबर के प्रदर्शनों से जुड़ा मामला

इंदिरा जयसिंह की याचिका में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कवर करने वाली महिला पत्रकारों के साथ कथित पुलिस ज्यादती के अलग-अलग आरोप शामिल हैं। इनमें 3 अक्टूबर की घटना के साथ-साथ 10 और 11 अक्टूबर को SIR के विरोध से जुड़े प्रदर्शनों के दौरान हुई घटनाओं का भी ज़िक्र है।
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सुप्रीम कोर्ट इस मामले में करीब 32 याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इन याचिकाओं में कथित पुलिस ज्यादती, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा चुनाव आयुक्तों की शक्तियों से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। महिला पत्रकारों की सुरक्षा का मामला इसी व्यापक सुनवाई का एक हिस्सा है। अदालत को यह तय करना है कि आरोपों की जांच किस तरीके से हो, संबंधित पत्रकारों को किस तरह की सुरक्षा दी जाए और पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायतों की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित की जाए।

महिला पत्रकार की गिरफ्तारी पर रोक

सुनवाई में एक महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR का मामला भी उठा। इस पत्रकार ने आरोप लगाया था कि 3 अक्टूबर को प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते समय दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने उसके साथ यौन उत्पीड़न और ग़लत शारीरिक व्यवहार किया। यह शिकायत दिल्ली पुलिस के सहायक पुलिस आयुक्त यानी ACP विवेक भगत के खिलाफ थी। इसके बाद भगत ने महिला पत्रकार के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में जवाबी शिकायत दर्ज कराई। महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि उसे गिरफ्तार न किया जाए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि यदि महिला पत्रकार जांच में शामिल होती है, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।