भारत का आम और बासमती चावल संकट में फंस गए हैं। जापान और चीन से आ रही सूचनाएं भारतीय किसानों के लिए अच्छी नहीं हैं। भारत सरकार ने अभी इस पर कोई बयान नहीं दिया है।
जापान ने इस सीजन में भारत से ताजे आमों के आयात पर अस्थायी रोक लगा दी है। जापानी अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के रहमानपुर स्थित वेपर हीट ट्रीटमेंट (VHT) प्लांट का दौरा किया था। वहां कीटाणुशोधन (Disinfection) की प्रक्रियाओं में गंभीर तकनीकी खामियां पाई गईं। जापान में फ्रूट फ्लाई या फल मक्खी को लेकर 'जीरो-टोलरेंस' (Zero Tolerance) नीति है। जापान में बैन के कारण अल्फांसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसे प्रीमियम आमों का एक्सपोर्ट पूरी तरह रुक गया है। योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने साफ किया है कि 25 मार्च 2026 के बाद जारी सर्टिफिकेट वाली कोई भी खेप स्वीकार नहीं होगी। इससे पहले 1986 में भी जापान ने ऐसा ही बैन लगाया था, जिसे 20 साल बाद 2006 में हटाया गया था।
जापान में भारतीय आम का निर्यात बहुत ज्यादा नहीं है। जापान को 2025-26 में आम निर्यात लगभग 1.54 मिलियन USD (करीब ₹12.8-13 करोड़) का था। इसमें गुजरात के केसर आम की बड़ी हिस्सेदारी थी (लगभग 0.2 मिलियन USD)।कुल मिलाकर जापान भारतीय आम का बड़ा बाजार नहीं है। लेकिन यूएई, यूके, यूएसए और सऊदी अरब जैसे देश आम के मुख्य बाज़ार हैं)।
चीन में बासमती चावल का रिजेक्शन
चीन भी भारतीय बासमती चावल को बार-बार (करीब 70 बार) खारिज कर रहा है। चीनी कस्टम विभाग ने भारतीय चावल की खेपों में हानिकारक कीड़े (जैसे खपरा बीटल) और तय सीमा से अधिक कीटनाशकों के अवशेष (Pesticide Residue) पाए थे, जिसके कारण इन शिपमेंट्स को वापस कर दिया गया।चीन को भारतीय बासमती का निर्यात 1,000-2,000 टन के आसपास या उससे भी कम है। यह कुल बासमती निर्यात का 0.01% से 0.05% से भी कम हिस्सा है। चीन बासमती का बड़ा बाजार नहीं है। चीन मुख्य रूप से भारत से नॉन-बासमती और टूटा चावल (Broken Rice) आयात करता है। भारतीय बासमती का मुख्य मार्केट सऊदी अरब, ईरान, इराक, UAE, यमन, UK, USA आदि है। जिसमें मिडिल ईस्ट में भारतीय बासमती का 60-70% मार्केट शेयर है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए झटका क्यों है?
भले ही जापान भारत के आमों का सबसे बड़ा खरीदार न हो (भारत सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट यूएई, अमेरिका और ब्रिटेन को करता है), लेकिन यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के लिए कई मायनों में बहुत बड़ा झटका है।वैश्विक व्यापार में साख ही सब कुछ है। जापान को दुनिया के सबसे सख्त और प्रीमियम बाजारों में गिना जाता है। जब जापान गुणवत्ता में कमी का हवाला देकर किसी उत्पाद को बैन करता है, तो यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका, और ब्रिटेन जैसे अन्य विकसित देश भी भारतीय कृषि उत्पादों की जांच (Scrutiny) बढ़ा देते हैं। इससे वैश्विक बाजार में भारत की "गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली" पर सवाल खड़े होते हैं।
जापानी बाजार में भारतीय आमों की भारी मांग थी। इस बैन का सीधा फायदा भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों जैसे पाकिस्तान, वियतनाम, थाईलैंड और ताइवान को मिलेगा। एक बार जब विदेशी आयातक (Importers) दूसरे देशों से डील पक्की कर लेते हैं, तो भारत के लिए उस बाजार को दोबारा हासिल करना बेहद मुश्किल और लंबा काम हो जाता है।
महाराष्ट्र के कोंकण (अल्फांसो बेल्ट) और गुजरात (केसर बेल्ट) के किसान पहले से ही इस साल अल नीनो (El Niño) और भीषण गर्मी के कारण फसल के भारी नुकसान (करीब 80 से 90 प्रतिशत तक) से जूझ रहे हैं। ऐसे नाजुक समय पर एक्सपोर्ट बंद होने से प्रीमियम आमों के दाम घरेलू बाजार में गिरेंगे, जिससे किसानों की रही-सही कमाई भी खत्म हो जाएगी।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है (सालाना करीब 26 मिलियन मीट्रिक टन), लेकिन भारत अपनी कुल फसल का मात्र 1 प्रतिशत ही एक्सपोर्ट कर पाता है। इसका कारण यह है कि हमारे ट्रीटमेंट और कोल्ड-स्टोरेज केंद्र अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं उतर पाते। सरकारी सेंटर्स (जैसे रहमानपुर प्लांट) में इस तरह की लापरवाही भारत के 'एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट हब' बनने के सपने को पीछे धकेलती है।
चावल एक्सपोर्ट पॉलिसी और विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) का नुकसान
बासमती चावल भारत के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का एक बहुत बड़ा जरिया है। चीन जैसे बड़े बाजार द्वारा बार-बार रिजेक्शन और भारत द्वारा घरेलू महंगाई रोकने के लिए गैर-बासमती चावल पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण, भारत के कुल कृषि-निर्यात रेवेन्यू में गिरावट दर्ज की गई है।यह झटका पैसों के नुकसान से कहीं ज्यादा नीतिगत और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की विफलता का है। यदि भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, तो उसे अपने कृषि उत्पादों के डोमेस्टिक प्रोसेसिंग सेंटर्स को 'जीरो-एरर' (Zero Error) के स्तर पर अपग्रेड करना ही होगा।