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क्या वाकई 'पुलिस राज' कायम हो गया है, कानून कहां है?

भारत में पुलिस राज की तरफ तमाम अदालतें लगातार इशारा कर रही हैं। किसी भी राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में घुसकर किसी को उठा लाती है, कभी कानून हाथ में भी ले लेती है। गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी के केस में अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए इस तरफ ध्यान खींचा है। लेकिन इस दौरान हुई अन्य घटनाएं भी इससे अलग नहीं थीं। 

26 अप्रैल को दिल्ली के इंपीरियल होटल में आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। उसकी कवरेज के लिए गए पत्रकार नरेश वत्स को पीटा गया। हो सकता है कि पत्रकार को लेकर केजरीवाल या भगवंत मान का कोई पूर्वाग्रह रहा हो लेकिन पंजाब पुलिस ने किसके इशारे पर पत्रकार को पीटने और कानून हाथ में लेने की पहल की। पत्रकार निहत्था था। पुलिस वालों के पास हथियार भी थे। अगर पत्रकार ने अंदर जाने की जिद भी की थी तो क्या इसके लिए निहत्थे पत्रकार को पीटा जाएगा। इस मामले में हालांकि दिल्ली पुलिस ने घटना के कई दिन बाद एफआईआर कर ली है लेकिन अब यह मामला दिल्ली पुलिस बनाम पंजाब पुलिस हो गया है। दिल्ली पुलिस भी अपने तमाम ऑपरेशन के सिलसिले में पंजाब जाती है, जाहिर है पंजाब पुलिस भी ऐसी कार्रवाई करेगी।

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पत्रकार को पीटने से पहले भी पंजाब पुलिस का दुरुपयोग दिल्ली में किया गया। दोनों ही घटनाओं में पंजाब पुलिस के इस्तेमाल किए जाने की साफ तस्वीर नजर आती है। 19 अप्रैल को कवि कुमार विश्वास और 20 अप्रैल को कांग्रेस नेता अलका लांबा के घर पंजाब पुलिस ने दस्तक दी। ये दोनों नेता केजरीवाल के खिलाफ बयान देने में मुखर रहे हैं। इनके खिलाफ आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पंजाब पुलिस में शिकायत की। अपराधों को ठीक से नियंत्रित न कर पाने जैसे आरोपों का सामने कर रही पंजाब पुलिस के अधिकारी दोनों नेताओं के घरों पर मामूली शिकायतों पर जा पहुंचे थे। यह घटना पंजाब सरकार का आप के बिग बॉस केजरीवाल के सामने जहां समर्पण माना गया, वहां इस इस बात की भी आलोचना हुई कि पंजाब पुलिस ने किसी को खुश करने के लिए यह कदम उठाया। अलका लांबा ने तो पंजाब पुलिस का तीखा विरोध किया और वो 26 अप्रैल को रूपनगर थाने में सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बयान दर्ज कराने जा पहुंचीं। वहां उन्होंने कहा कि वो केजरीवाल के बारे में जो बोल चुकी हैं, उसे वापस नहीं लेंगी। वो अपने बयान पर कायम हैं।   

जिग्नेश मेवाणी के मामले असम पुलिस को अदालत ने ही बेनकाब कर दिया है। पहले उन पर गुजरात में केस दर्ज किया गया। उसमें उन्हें जमानत मिली तो फौरन असम पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। असम पुलिस का रवैया इतना पक्षपातपूर्ण था कि उसने एक और एफआईआर मेवाणी के खिलाफ दर्ज की। जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने महिला पुलिसकर्मी को अश्लील इशारे किए। लेकिन अदालत ने इस तथ्य की बखिया उधेड़ दी। अदालत ने कहा कि विधायक मेवाणी को वो महिला पुलिसकर्मी अकेले नहीं ले जा रही थी। उसके साथ दो पुरुष पुलिस अधिकारी भी थे। ऐसी घटना होने पर उनके द्वारा की जाने वाली कोई कार्रवाई सामने नहीं आई, न ही उनका कहीं कोई बयान है। यह केस पूरी तरह फर्जी है। अदालत की इस तल्ख टिप्पणी के बावजूद एक सवाल असम पुलिस की टाइमिंग को लेकर है। मेवाणी को जैसे ही गुजरात में जमानत मिली और वो जेल से बाहर आए तो वहां असम पुलिस खड़ी थी, जिसने उन्हें फौरन गिरफ्तार कर लिया। असम पुलिस ने इस घटना के बारे में पहले से न तो मीडिया को अवगत कराया, न गुजरात पुलिस को सूचना दी और न ही मेवाणी को कोई नोटिस दिया। इस तरह मेवाणी के खिलाफ पूरा ताना-बाना असम पुलिस ने गुजरात पुलिस के सहयोग से बुना।

फरवरी 2021 में पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को बेंगलुरु से दिल्ली पुलिस उठा लाई और अगले दिन उनकी गिरफ्तारी दिखाई। बेंगलुरु पुलिस ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने तो उसे इस केस के बारे में कोई सूचना दी और न ही कोई एफआईआर दिखाई। बेंगलुरु के स्थानीय लोगों ने वहां के पुलिस कमिश्नर के दफ्तर पर प्रदर्शन किया, उन्हें ज्ञापन सौंपा। बेंगलुरु पुलिस ने अपनी मजबूरी जताई। दिशा रवि को मोदी सरकार के खिलाफ एक टूलकिट केस में दिल्ली पुलिस ने पकड़ा था और इसे बहुत बड़ी साजिश बता डाली थी लेकिन सारा मामला बाद में कुछ नहीं निकला। दिशा रवि की गिरफ्तारी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बनीं। यह बात भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने रेखांकित की कि दोनों राज्यों की पुलिस में आपसी तालमेल नहीं था। बेंगलुरु पुलिस को विश्वास में लिए बिना दिल्ली पुलिस ने सारी कार्रवाई की थी। आज ये केस कहां है, इसकी दिशा क्या है, दिल्ली पुलिस इस पर क्या सोचती है, कोई नहीं जानता। लेकिन पर्यावरण पर नोबेल पुरस्कार पाने वाली ग्रेटा थनबर्ग ने इस मामले को उठाकर भारत सरकार की खासी किरकिरी कर दी थी।

2021 में असम-मिजोरम सीमा पर हुए खूनी संघर्ष में जिस तरह 6 असम पुलिस के जवानों और एक नागरिक की हत्या हुई थी, वो सीमा विवाद के अलावा दोनों राज्यों की पुलिस के बीच रस्साकशी का भी मामला था। आए दिन मिजोरम पुलिस असम की सीमा में और असम पुलिस मिजोरम की सीमा में घुसकर लोगों को पकड़ लाती थी। दोनों राज्यों के बीच स्मगलिंग का धंधा करने वालों ने मिजोरम के लोगों को भड़काया और उन्होंने जुलाई 2021 में असम पुलिस पर हमला किया, जिसमें 6 पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद 2 सितंबर 2021 में असम पुलिस पर आरोप लगा कि उसने मिजोरम सीमा के अंदर जाकर एक जेसीबी ऑपरेटर को उठा लिया है। मिजोरम पुलिस को इसकी कोई सूचना नहीं दी गई। बहरहाल, असम-मिजोरम सीमा में विवाद वाले क्षेत्रों में अब सीआरपीएफ 24 घंटे चौकसी कर रही है, जबकि सीआरपीएफ का इस्तेमाल इस काम के लिए नहीं होता है।

2020 में बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की कथित रहस्यमय मौत के समय मुंबई पुलिस और बिहार पुलिस के बीच चली तनातनी भला किसको नहीं याद होगी। सुशांत के जीजा हरियाणा काडर के आईपीएस हैं। सुशांत की मौत की सूचना मिलते ही बिहार पुलिस के अधिकारी और सुशांत के जीजा मुंबई पहुंच गए। वहां अखबारों में इन लोगों के बयान छपे, सूत्रों का हवाला दिया गया कि मुंबई पुलिस की जांच सही दिशा की तरफ नहीं बढ़ रही है। मुंबई पुलिस ने इन लोगों पर आरोप लगाया कि ये लोग जांच में दखलन्दाजी कर रहे हैं। दोनों राज्यों की पुलिस के बीच यह नूरा कुश्ती मीडिया के जरिए लड़ी गई। लेकिन इस सारे प्रकरण का फायदा नुकसान दो अभिनेत्रियों को हुआ। सुशांत की दोस्त एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती का करियर तबाह हो गया। रिया पर तमाम आरोप लगाए गए और अंततः उनके खिलाफ साबित कुछ भी नहीं हुआ। इसी तरह कंगना रानौत जो उन दिनों तरह-तरह के आरोप लगा रही थीं, उन्हें एक दूसरे प्रकरण में वाई श्रेणी की सुरक्षा मिल गई, वो सत्ता के नजदीक जा पहुंची लेकिन उनकी ताजा सफलता में सुशांत का मामला ही मूल था।

Jignesh Mevani: Is 'Police Raj' really established, Where is Law? - Satya Hindi
बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत
ये वो घटनाएं हैं जो सुर्खियां बनीं लेकिन एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में जाकर हस्तक्षेप करने की घटनाएं बढ़ रही हैं। बहुत सारे छोटे-छोटे मामले तो सामने ही नहीं आते हैं और न मीडिया को इसकी जानकारी मिल पाती है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) कैंपस से एक शादीशुदा जोड़े को यूपी की गाजियाबाद पुलिस उठा ले गई। यह मामला 2018 में जब यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचा तो वहां दिल्ली पुलिस ने कहा कि यूपी पुलिस ने हमें इसकी जानकारी नहीं दी। हाईकोर्ट ने इस पर यूपी पुलिस को जमकर फटकार लगाई।

जम्मू कश्मीर दिल्ली पुलिस की गतिविधियों का केंद्र बना रहता है। आतंकवाद खत्म करने और आतंकियों को पकड़ने के नाम पर दिल्ली पुलिस आए दिन जम्मू कश्मीर में छापे मारती रहती है और शिकार करके लौटती है यानी आरोपी को पकड़कर लाती है। दिल्ली में जब प्रेस कॉन्फ्रेंस करके उस मामले का खुलासा किया जाता है तब जम्मू कश्मीर की पुलिस को पता चलता है। जम्मू कश्मीर पुलिस के जिस डीएसपी देविंदर सिंह के मामले का अब जिक्र नहीं होता है। 2020 में जब दिल्ली 26 जनवरी पर गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां जोरों पर थीं तो उससे तीन दिन पहले जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी देविंदर सिंह को दो आतंकवादियों के साथ पकड़ा गया। देविंदर ने जम्मू कश्मीर पुलिस को बताया कि इन आतंकियों को दिल्ली भेजा जाना था। मीडिया ने इसे राष्ट्रीय सुर्खियां बना दिया। आगे जो हुआ, वो भयानक था। आनन-फानन में यह मामला दिल्ली पुलिस को सौंप दिया गया। दिल्ली पुलिस ने दिल्ली की कोर्ट में समय पर देविंदर सिंह के खिलाफ चार्जशीट नहीं जमा की। देविंदर को जमानत मिल गई। जाने-माने वकील प्रशांत भूषण समेत तमाम लोगों ने इस रहस्यमय जमानत के घटनाक्रम को उठाया लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब कोई नहीं जानता कि देविंदर सिंह को आतंकवादियों के साथ पकड़े जाने पर इस देश कि किसी अदालत ने क्या सजा दी। इस मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर आज तक सवाल है। इसी से पता चलता है कि दिल्ली पुलिस का ऑपरेशन किसी दूसरे राज्य में किस तरह और किस स्तर पर होता है। 

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जम्मू कश्मीर पुलिस के पूर्व डीएसपी देविंदर सिंह

जहांगीरपुरी साम्प्रदायिक हिंसा का मामला ताजा है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने मीडिया में सूत्रों के हवाले से बताया कि घटना को अंजाम देने के पीछे बांग्लादेशी गिरोहों का हाथ है। यही बात बीजेपी से लेकर आम आदमी पार्टी तक कह रही है। मुख्य आरोपी अंसार को मास्टरमाइंड बताया गया। एकाध और आरोपियों को पश्चिम बंगाल से पकड़ कर दिल्ली पुलिस लाई। बंगाल की पुलिस को दिल्ली पुलिस के इस ऑपरेशन की जानकारी नहीं है। देश का मीडिया और प्रबुद्ध वर्ग यह सवाल नहीं उठा रहा है कि पश्चिम बंगाल में बंगाली जुबान बोलने वाले मुसलमान बांग्लादेश कैसे हो गए। जिस तरह तमाम राज्यों के लोग अपनी जुबान के साथ दिल्ली में रह रहे हैं, उसी में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम भी हैं, लेकिन दिल्ली में सरकारी एजेंसियों से लेकर राजनीतिक दलों की नजर में वो बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। हालांकि अंसार और अन्य आरोपियों के घर पश्चिम बंगाल में हैं। इस सारे प्रकरण में वो बात दब कर रह गई कि 16 अप्रैल की शोभा यात्रा में जिन लोगों ने पिस्तौल, तलवारें, चाकू और डंडे लहराए थे, उन आरोपियों को दिल्ली पुलिस नहीं पकड़ पाई लेकिन बंगाल से आरोपी पकड़ने में उसे अपार सफलता मिल रही है। 

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