जस्टिस ओका ने चुनाव आयोग की ओर से मतदाताओं को दिए जा रहे पहले से भरे हुए गणना फॉर्म (Enumeration Form) पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने यह फॉर्म अपनी ओर से लागू किया है, जबकि उनके अनुसार उसे ऐसा करने का कानूनी अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ने मई 2026 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की; कहा- गणना फॉर्म नहीं भरने पर मतदाता का नाम सीधे नहीं हटाया जा सकता, फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में बदलाव का अधिकार भी चुनाव आयोग के पास नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस ओका ने कहा है कि चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision यानी SIR) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखने वाले अपने फैसले पर फिर से विचार करने की मांग की है।
जस्टिस ओका के मुताबिक, SIR की प्रक्रिया में गणना फॉर्म नहीं भरने के कारण मतदाता का नाम हटाने, सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ पुनरीक्षण करने और मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 तथा फॉर्म-8 में अतिरिक्त घोषणाएं जोड़ने जैसे गंभीर कानूनी सवाल हैं। उनका कहना है कि चुनाव आयोग को कानून से बाहर जाकर किसी मतदाता का नाम हटाने या उसकी नागरिकता पर फैसला करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। Live Law की 14 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस ओका ने बीबीसी मराठी को दिए एक इंटरव्यू में ये बातें कही हैं। उन्होंने विशेष रूप से मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा SIR की संवैधानिक वैधता बरकरार रखने वाले फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत बताई।
सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ SIR कराने पर भी सवाल
जस्टिस ओका ने सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले पर पुनर्विचार की एक प्रमुख वजह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) को बताया। उनके अनुसार, इस प्रावधान के तहत मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण एक समय में किसी एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए किया जा सकता है, न कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ। उन्होंने कहा कि कानून में गहन पुनरीक्षण या आंशिक पुनरीक्षण का प्रावधान है। उनके मुताबिक, धारा 21(3) की व्याख्या करते समय इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि पुनरीक्षण किस क्षेत्र के लिए और किन परिस्थितियों में किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून में पुनरीक्षण को आम चुनावों से पहले किए जाने की बात कही गई है। जस्टिस ओका ने कहा कि सिर्फ इसी कानूनी आधार पर सुप्रीम कोर्ट को अपने मई 2026 के फैसले पर फिर विचार करना चाहिए।
गणना फॉर्म नहीं भरने पर नाम हटाना कानून के खिलाफ
जस्टिस ओका ने चुनाव आयोग की ओर से मतदाताओं को दिए जा रहे पहले से भरे हुए गणना फॉर्म (Enumeration Form) पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने यह फॉर्म अपनी ओर से लागू किया है, जबकि उनके अनुसार उसे ऐसा करने का वैधानिक अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, गणना फॉर्म नहीं भरने वाले मतदाताओं के नाम मसौदा मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। जस्टिस ओका ने इस व्यवस्था को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो केवल गणना फॉर्म नहीं भरने के आधार पर किसी मतदाता का नाम हटाने की अनुमति देता हो।उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया अपनाना जरूरी है। उनके मुताबिक, धारा 21 के तहत संबंधित मतदाता को कारण बताओ नोटिस दिया जाना चाहिए, उसे सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए और उसके बाद मामले पर फैसला किया जाना चाहिए। जस्टिस ओका ने कहा कि यदि कोई मतदाता गणना फॉर्म नहीं भरता है, तो उसका नाम सीधे हटाने के बजाय मसौदा सूची में रहने देना चाहिए। इसके बाद चुनाव आयोग नोटिस जारी कर सकता है, संबंधित व्यक्ति का पक्ष सुन सकता है और कानून के अनुसार निर्णय ले सकता है। उनके अनुसार, चुनाव आयोग को सीधे किसी मतदाता का नाम हटाने का अधिकार नहीं है।
फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में बदलाव का अधिकार किसके पास?
जस्टिस ओका ने मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 और मतदाता सूची में विवरण बदलने या सुधार के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-8 में अतिरिक्त घोषणाएं जोड़ने के मुद्दे पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मतदाता पंजीकरण से संबंधित नियम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। ये फॉर्म संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत तैयार किए गए हैं। इसलिए इनमें अतिरिक्त घोषणा या नई शर्त जोड़ने का फैसला चुनाव आयोग अपनी मर्जी से नहीं कर सकता।जस्टिस ओका के मुताबिक, यदि इन फॉर्मों में कोई बदलाव करना है, तो उसके लिए केंद्र सरकार को कानून के अनुरूप निर्णय लेना होगा और जहां आवश्यक हो, संसद के माध्यम से बदलाव करना होगा।
उन्होंने संशोधित फॉर्म-6 का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें जोड़ी गई घोषणा का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने पहले की सुनवाई के दौरान नहीं उठाया गया था। इसलिए अदालत को उस विशेष सवाल पर विचार करने का अवसर नहीं मिला। जस्टिस ओका ने कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर फैसला दे सकता है और यह स्पष्ट कर सकता है कि फॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ना कानून के अनुरूप है या नहीं।
SIR वैध होने के बावजूद मनमाने तरीके से लागू नहीं की जा सकती
जस्टिस ओका ने एक और महत्वपूर्ण कानूनी पहलू उठाया। उन्होंने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट SIR की संवैधानिक वैधता पर अपने मई 2026 के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करता, तब भी इसका अर्थ यह नहीं होगा कि चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया को मनमाने ढंग से लागू करने की छूट मिल जाएगी। उनके मुताबिक, किसी प्रक्रिया का कानूनी रूप से वैध होना और उसे लागू करने का तरीका दो अलग-अलग सवाल हैं। यदि कोई कानूनी प्रक्रिया मनमाने ढंग से लागू की जाती है, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है और उसके क्रियान्वयन को रोक सकती है।उन्होंने आगाह किया कि चुनाव आयोग को यह नहीं मानना चाहिए कि SIR की संवैधानिक वैधता बरकरार रहने के बाद वह इस प्रक्रिया को किसी भी तरीके से लागू कर सकता है। जस्टिस ओका का तर्क है कि चुनाव आयोग को SIR लागू करते समय कानून, निष्पक्षता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। संवैधानिक वैधता का फैसला प्रशासनिक मनमानी को उचित नहीं ठहराता।
नागरिकता का सवाल तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं
जस्टिस ओका की सबसे अहम टिप्पणी भारतीय नागरिकता को लेकर है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति का नाम इस आधार पर हटा देता है कि वह अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाया, तो यह उसके अधिकार क्षेत्र से जुड़ा गंभीर कानूनी सवाल है।जस्टिस ओका के मुताबिक, मतदाता सूची का पुनरीक्षण और किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण अलग-अलग विषय हैं। चुनाव आयोग को मतदाता सूची से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन इससे उसे किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। यह टिप्पणी SIR के दौरान मतदाताओं से मांगे जा रहे दस्तावेजों, घोषणाओं और नागरिकता के प्रमाण से जुड़े विवाद के बीच महत्वपूर्ण है। जस्टिस ओका का कहना है कि नागरिकता साबित करने में कथित विफलता के आधार पर किसी व्यक्ति का नाम सीधे मतदाता सूची से हटाना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में संबंधित कानूनों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
SIR पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा क्यों अहम?
जस्टिस ओका की आपत्तियां SIR के चार प्रमुख पहलुओं पर केंद्रित हैं:
- पुनरीक्षण का दायरा: क्या सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ SIR कराने की अनुमति कानून देता है?
- गणना फॉर्म: क्या केवल फॉर्म नहीं भरने के आधार पर किसी मतदाता का नाम हटाया जा सकता है?
- फॉर्म-6 और फॉर्म-8: क्या चुनाव आयोग इन फॉर्मों में अपने स्तर पर अतिरिक्त घोषणाएं जोड़ सकता है?
- नागरिकता का निर्धारण: क्या चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता पर फैसला कर सकता है?
हालांकि, जस्टिस ओका की टिप्पणी एक पूर्व न्यायाधीश की कानूनी राय है। इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदलाव या अदालत के नए आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी मांग का सार यह है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहे और चुनाव आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नागरिकता या मताधिकार से जुड़े फैसले न करे।