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जस्टिस कुरियन ने गोगोई मामले पर कहा, न्यायपालिका से लोगों का भरोसा हिल गया है

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा सदस्य मनोनीत करने पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रियाएं जताई हैं। न्यायपालिका से जुड़े लोगों ने भी इस पर अपनी राय रखी है। 
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोजफ़ ने कहा है कि 'राज्यसभा का मनोनयन पूर्व मुख्य न्यायाधीश की ओर से स्वीकार करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता से आम जनता का भरोसा हिल गया है। न्यायपालिका संविधान की बुनियादी संरचनाओं में एक है।' 
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जस्टिस कुरियन ने कहा, 'ज्योंही लोगों का भरोसा हिलता है, यह धारणा बनती है कि जजों का एक वर्ग निष्पक्ष नहीं है, इसके आगे यह भी दिखता है कि राष्ट्र की बुनियाद जिस ज़मीन पर टिकी है, वह हिल गई है।'

क्या कहा जस्टिस कुरियन ने?

सुप्रीम कोर्ट के इस पूर्व जज ने यह भी कहा कि उन्होंने जिन वजहों से रिटायरमेंट के बाद कोई पद ग्रहण करने के इनकार कर दिया था, उसकी वजहों में एक यह भी था। उन्होंने कहा : 

जस्टिस कुरियन ने कहा, 'मैंने अभूतपूर्व ढंग से जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस मदन बी लोकुर के साथ खुल कर राष्ट्र के प्रति इस ख़तरे की बात कही थी और अब मुझे लगता है कि यह ख़तरा बढ़ गया है।'


जस्टिस जोजऱ़ कुरियन, पूर्व जज, सुप्रीम कोर्ट

बता दें कि रंजन गोगोई को राष्ट्रपति ने राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया है। यह मनोनयन राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह पर ही करते हैं। लिहाज़ा, यह माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पूर्व न्यायाधीश को यह पद दिया है। 

क्या कहना है गोगोई का?

जस्टिस गोगोई ने इसे स्वीकार कर लिया है और कहा है कि उनके राज्यसभा में मौजूद होने से 'न्यापालिका और राज्यसभा एक दूसरे को अपनी बात कह पाएंगे।' गोगोई ने कहा :

'मैंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया क्योंकि मैं यह मानता हूं कि किसी न किसी समय न्यायपालिका और विधायिका को एक दूसरे के साथ मिल कर काम करना ही चाहिए।'


रंजन गोगोई, पूर्व मुख्य न्यायाधीश

उन्होंने कहा, 'संसद में मेरी उपस्थिति से यह मौका मिलेगा कि न्यापालिका अपने विचार विधायिका से बता सके और विधायिका अपनी बात न्यायपालिका से कह सके।' 
यह अहम इसलिए भी है कि अयोध्या विवाद पर फ़ैसला जिस खंडपीठ ने सुनाया, उसकी अगुआई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने ही की थी। कई लोगों ने इस फ़ैसले की आलोचना की थी। उसके पहले रफ़ाल विमान सौदे से जुड़े मामले में जस्टिस रंजन गोगोई के फ़ैसले की भी आलोचना हुई थी। 
सुप्रीम कोर्ट में उनके समकक्ष रहे सेवानिवृत्त जस्टिस मदन बी लोकुर ने भी सवाल उठाया है। 'द इंडियन एक्सप्रेस’ से इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘कुछ समय से अटकलें लगाई जाती रही हैं कि न्यायमूर्ति गोगोई को क्या सम्मान मिलेगा। तो, उस अर्थ में नामांकन आश्चर्यजनक नहीं है।' 
जस्टिस मदन लोकुर ने कहा, 'आश्चर्य की बात यह है कि यह इतनी जल्दी हो गया। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अखंडता को पुनर्परिभाषित करता है। क्या आख़िरी क़िला भी ढह गया है?’

ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं गोगोई

रंजन गोगोई कोई पहले रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं, जिन्हें राज्यसभा के लिये मनोनीत किया गया हो। उनसे पहले पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद हिदायतुल्लाह और रंगनाथ मिश्रा भी पद से रिटायर होने के बाद राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए थे।उस समय भी इस पर सवाल उठे थे। रंगनाथ मिश्रा पर आरोप था कि उनकी अध्यक्षता में बने जाँच आयोग ने सिख विरोधी हिंसा में कांग्रेस को क्लीन चिट दी थी।

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