सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग के वकील होने की जानकारी सामने आने के बाद हितों के टकराव को लेकर सवाल उठ खड़े हुए हैं। जस्टिस शर्मा का बेटा सिद्धार्थ शर्मा मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसिल यानी स्थायी वकील हैं। यह जानकारी इसलिए अहम है क्योंकि जस्टिस शर्मा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति क़ानून और सीईसी ज्ञानेश कुमार की बेटी से जुड़े दो मामलों में सुनवाई करने वाली बेंचों का हिस्सा थे। उन्होंने एक मामले में सरकार के पक्ष में तो दूसरे में ज्ञानेश कुमार की बेटे के पक्ष में फ़ैसला दिया।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम को अंतरिम राहत दिए जाने और उसी दिन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर उनकी राय सामने आने के बाद संभावित हितों के टकराव को लेकर सवाल उठाए गए। इन सवालों को और गंभीर बनाने वाली एक जानकारी यह है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर सिद्धार्थ शर्मा का नाम चुनाव आयोग यानी ईसीआई के काउंसिल के रूप में दर्ज है। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड में भी सिद्धार्थ शर्मा ईसीआई से जुड़े मामलों में आयोग की ओर से पेश होते दिखाई देते हैं।
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ममता बनर्जी खेमे वाली टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा ने इस पूरे मामले को लेकर CJI को संबोधित करते हुए सवाल उठाया है कि अगर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे का पेशेवर संबंध चुनाव आयोग से है, तो उनके पिता ने ईसीआई से संबंधित संवैधानिक मामले की सुनवाई कैसे की। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सीईसी ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम की याचिका को जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने आउट-ऑफ-टर्न कैसे सूचीबद्ध किया गया।

MP हाईकोर्ट की वेबसाइट पर नाम दर्ज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध काउंसिल संबंधी रिकॉर्ड में ईसीआई के सामने सिद्धार्थ शर्मा का नाम दर्ज है। रिकॉर्ड में उन्हें ईसीआई के लिए काउंसिल के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

अदालती रिकॉर्ड भी दिखाते हैं कि सिद्धार्थ शर्मा ईसीआई से जुड़े मामलों में पेश हुए हैं। मिसाल के तौर पर सितंबर 2025 के एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश में उन्हें ईसीआई की ओर से पेश वकील के रूप में दर्ज किया गया था। अगस्त 2026 के एक अन्य मामले में भी वे ईसीआई से जुड़े प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए थे। इसके अलावा हाईकोर्ट के अन्य रिकॉर्ड में सिद्धार्थ शर्मा को केंद्र सरकार के आयकर विभाग के लिए वरिष्ठ स्टैंडिंग काउंसल के रूप में भी दर्ज किया गया है।

यानी ईसीआई के साथ सिद्धार्थ शर्मा का पेशेवर संबंध केवल किसी सोशल मीडिया दावे तक सीमित नहीं है; इसका दस्तावेजी आधार मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में मिलता है।

जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने दो बड़े केस

विवाद को देखते हुए 23 सितंबर 2026 का दिन अहम है। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने सीईसी नियुक्ति कानून और सीईसी की बेटी मेधा रूपम के दो मामले आए थे। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की उस याचिका पर अंतरिम राहत दी, जिसमें उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए के तहत हिरासत को रद्द करते हुए मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणियाँ की थीं तथा छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसकी वसूली संबंधित अधिकारियों के वेतन से की जानी थी। 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इन कड़े टिप्पणियों और 5 लाख रुपये की वसूली वाले हिस्से पर रोक लगाई।

हालांकि, अगले दिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को स्पष्ट किया। 24 सितंबर को पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के उस फैसले के उन पैराग्राफ पर रोक है जिनमें मेधा रूपम के खिलाफ टिप्पणियां और मुआवजे का आदेश शामिल था, लेकिन आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत रद्द करने वाले हाईकोर्ट के मूल फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होनी है।

मेधा रूपम की याचिका की लिस्टिंग पर उठे सवाल

मेधा रूपम की याचिका जिस पीठ के सामने आई, उसकी लिस्टिंग को लेकर भी पहले सवाल उठ चुके हैं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मामला सुना, जबकि 13 जुलाई 2026 से लागू रोस्टर के मुताबिक इस पीठ के पास प्रिवेंटिव डिटेंशन मामलों की नियमित रोस्टर जिम्मेदारी नहीं थी।
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रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नोएडा के इसी मजदूर आंदोलन से जुड़े दूसरे मामले पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने लंबित थे। इस वजह से मेधा रूपम की याचिका की इस पीठ के सामने लिस्टिंग को लेकर सवाल उठाए गए। यहीं से मामला सिर्फ आदेश तक सीमित न रहकर मामले की लिस्टिंग और बेंच आवंटन की प्रक्रिया से जुड़े सवालों तक पहुंच गया।

मेधा रूपम कौन हैं और मामला क्या है?

मेधा रूपम गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी हैं। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की एनएसए के तहत हिरासत को रद्द किया गया था। आकृति चौधरी को अप्रैल 2026 में नोएडा के औद्योगिक मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन पर एनएसए लगाया गया था।

2 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि हिरासत के आधार में पर्याप्त सामग्री नहीं थी और अधिकारियों को एनएसए जैसे कड़े कानून का इस्तेमाल करने से पहले रिकॉर्ड की सावधानी से जांच करनी चाहिए थी। अदालत ने 5 लाख रुपये मुआवजे का भी आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस आदेश के खिलाफ मेधा रूपम की चुनौती में हाईकोर्ट की टिप्पणियों और मुआवजे वाले हिस्से पर अंतरिम रोक लगाई है।

सीईसी नियुक्ति कानून पर भी आया था फैसला

23 सितंबर को ही जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस दीपांकर दत्ता की दो सदस्यीय पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाया। यहां दोनों जजों की राय अलग थी।

जस्टिस दत्ता ने केंद्र की उस मांग को स्वीकार नहीं किया जिसमें मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की गई थी। वहीं जस्टिस शर्मा का मत था कि मामला महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाता है और इसकी सुनवाई संविधान पीठ को करनी चाहिए। दोनों जजों ने अंततः इस बात पर सहमति जताई कि मामला CJI के सामने रखा जाए ताकि उपयुक्त संख्या वाली संविधान पीठ गठित करने पर फैसला हो सके। इसका मतलब यह है कि जस्टिस शर्मा ने 2023 के नियुक्ति कानून को अंतिम रूप से वैध घोषित नहीं किया है। मामला अब संविधान पीठ के सामने जाने की प्रक्रिया में है।

विवादित कानून में क्या बदला था?

2023 के कानून में सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनूप बरनवाल फैसले के तहत चयन प्रक्रिया में सीजेआई की भूमिका थी। नए कानून में सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इसी बदलाव को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की गई हैं।