दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक नया हलफनामा दायर कर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से उनकी याचिकाओं की सुनवाई से हटने (Recusal) की मांग की है। केजरीवाल ने इस मांग के पीछे जज के बच्चों के केंद्र सरकार के वकील के रूप में पैनल में शामिल होने का हवाला देते हुए 'हितों के टकराव' की आशंका जताई है। केजरीवाल का हलफनामा सोशल मीडिया पर भी वायरल है। दिल्ली आप अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिया पर इसे शेयर किया है।

मुख्य विवाद क्या है?

यह मामला दिल्ली आबकारी नीति (Excise Policy) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती देने वाली याचिकाओं से संबंधित है। केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा द्वारा उनकी गिरफ्तारी को जायज ठहराने वाले पिछले फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें इंसाफ मिलने की संभावना पर शक जताया है।

केजरीवाल के हलफनामे की खास बातें

हलफनामे में केजरीवाल ने इन आधारों पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को इस केस से हटाने की मांग की है:
केंद्र सरकार के साथ संबंध: हलफनामे में दावा किया गया है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बेटा और बेटी केंद्र सरकार के वकील के रूप में 'एम्पेनल्ड' (पैनल में शामिल) हैं। चूँकि केंद्र सरकार इस मामले में एक पक्ष है, इसलिए केजरीवाल का तर्क है कि इससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
हितों का टकराव (Conflict of Interest): याचिका में कहा गया है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। जब जज साहिबा के करीबी सदस्य उस पक्ष (केंद्र सरकार) के साथ पेशेवर रूप से जुड़े हों जिससे संबंधित मामला सुना जा रहा है, तो यह 'उचित निष्पक्षता' के सिद्धांत के खिलाफ है।
पिछले फैसले का संदर्भ: केजरीवाल ने जस्टिस के उस पिछले फैसले का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने केजरीवाल की गिरफ्तारी को वैध माना था। अब नई याचिका के संदर्भ में, केजरीवाल चाहते हैं कि इस मामले की सुनवाई कोई अन्य पीठ करे।
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केजरीवाल के हलफनामे में साफ कहा गया है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के दोनों बच्चे केंद्रीय सरकारी पैनलों में यानी वरिष्ठ अधिवक्ता और मोदी सरकार के सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता के अधीन काम कर रहे हैं। तुषार मेहता उन्हें मामले सौंपते हैं। ऐसी स्थिति में माननीय जज के लिए तुषार मेहता के खिलाफ कोई आदेश पारित करना कठिन होगा। इसलिए अन्य कारणों के साथ-साथ, माननीय न्यायाधीश को इस मामले से स्वयं को अलग कर लेना चाहिए।

पहले क्या हुआ था

गिरफ्तारी: अरविंद केजरीवाल को 21 मार्च 2024 को ईडी ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में गिरफ्तार किया था।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का फैसला: 9 अप्रैल 2024 को जस्टिस शर्मा की सिंगल बेंच ने केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताया था। अदालत ने तब कहा था कि ईडी द्वारा पेश किए गए सबूतों से प्रथम दृष्टया गिरफ्तारी के पर्याप्त आधार मिलते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां केजरीवाल को अंतरिम जमानत मिली और अंततः नियमित जमानत भी मिली। 

कानूनी प्रक्रिया और अगला कदम

अदालत में अब यह तय होना बाकी है कि क्या जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा इस नए हलफनामे के आधार पर खुद को मामले से अलग करती हैं या नहीं। आमतौर पर, 'रिक्यूजल' (हटने) का निर्णय संबंधित जज के विवेक पर निर्भर करता है। यदि जज को लगता है कि कोई वास्तविक हितों का टकराव है, तो वे मामले को दूसरी पीठ को ट्रांसफर कर सकते हैं।