संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में एक इंटरव्यू में विपक्ष को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर विपक्ष संसद को ठीक से चलने नहीं देगा, तो सरकार 'गिलोटिन' प्रक्रिया का सहारा लेगी। उन्होंने इसे विपक्ष के लिए 'करारा झटका' बताया। इस बयान को सरकार की ओर से विरोध प्रदर्शनों के बावजूद महत्वपूर्ण बजटीय और विधायी मदों को आगे बढ़ाने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, कई राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी नेताओं ने इसे तानाशाही और अलोकतांत्रिक कदम करार दिया है। आखिर क्या है यह 'गिलोटिन' प्रक्रिया, जिसकी धमकी से संसद में हलचल मच गई है? 

रिजिजू का बयान और उसका संदर्भ

संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने अपने इंटरव्यू में स्पष्ट कहा, "अगर विपक्ष संसद को चलने नहीं देगा, तो हम गिलोटिन का सहारा लेंगे। यह उनके लिए करारा झटका होगा।" यह बयान ऐसे समय में आया है जब संसद में विपक्ष के विरोध प्रदर्शन अक्सर कार्यवाही को बाधित करते रहे हैं। सरकार का तर्क है कि महत्वपूर्ण विधेयकों और बजट संबंधी मुद्दों को समय पर पास करना जरूरी है, ताकि देश का विकास प्रभावित न हो। लेकिन विपक्ष इसे संसद की बहस को दबाने की कोशिश मानता है। सवाल उठता है कि अगर विपक्ष की आपत्तियों को नजरअंदाज कर विधेयक पारित किए जाएंगे, तो संसद में लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है? बिना विपक्ष के संसद कैसी, और ऐसी प्रक्रियाएं क्या वाकई लोकतांत्रिक हैं? इसकी आड़ में एक देश एक चुनाव जैसे विधेयक पास कराए जा सकते हैं।

गिलोटिन प्रक्रिया क्या है?

'गिलोटिन' शब्द मूल रूप से फ्रांसीसी क्रांति के दौरान इस्तेमाल हुआ, जिसे सिर काटने के लिए इस्तेमाल किया गया। लेकिन संसदीय संदर्भ में यह एक प्रक्रिया है, जो मुख्य रूप से लोकसभा में बजट सत्र के दौरान वित्तीय कार्यों को तेजी से निपटाने के लिए अपनाई जाती है। दृष्टि आईएएस के एक विश्लेषण के अनुसार, यह प्रक्रिया अनुदान मांगों (Demands for Grants) को एक साथ जोड़कर बिना विस्तृत बहस के मतदान के जरिए पारित कराने की अनुमति देती है।

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कैसे काम करती है यह प्रक्रिया? 

बजट पेश होने के बाद संसद करीब तीन सप्ताह के लिए स्थगित हो जाती है। इस दौरान विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों की जांच के लिए सदन की स्थायी समितियां (House Standing Committees) रिपोर्ट तैयार करती हैं। संसद दोबारा शुरू होने पर बिजनेस सलाहकार समिति (Business Advisory Committee - BAC) अनुदान मांगों पर चर्चा का शेड्यूल तय करती है। समय की कमी के कारण सभी मंत्रालयों की मांगों पर बहस नहीं हो पाती। आमतौर पर महत्वपूर्ण मंत्रालयों (जैसे गृह, रक्षा, विदेश, कृषि, ग्रामीण विकास और मानव संसाधन विकास) की मांगों पर ही चर्चा होती है। इसके बाद स्पीकर 'गिलोटिन' लागू करते हैं, जिसके तहत बाकी बची मांगों (चर्चित या अचर्चित) को एक साथ वोटिंग के लिए रख दिया जाता है। इससे समय की बचत होती है और बजट सत्र समाप्त होने में देरी नहीं होती।

इतिहास और नियम

भारतीय संसद में यह प्रक्रिया बजट सत्र के दौरान वित्तीय कार्यों को कुशलतापूर्वक संभालने के लिए अपनाई जाती है। इसमें संविधान या प्रक्रिया नियमों की कोई विशेष धारा का उल्लेख नहीं है, लेकिन यह स्पीकर की भूमिका और BAC के फैसलों पर निर्भर करती है। फ्रांस से लिया गया यह शब्द अब संसदीय भाषा में तेजी से फैसले लेने का प्रतीक बन गया है।

यह प्रक्रिया लोकसभा में बजट सत्र के दौरान सामान्य रूप से इस्तेमाल होती है। वर्ष 2023 में संसद में गतिरोध के दौरान अनुदान मांगों और वित्त विधेयक (Finance Bill) को बिना चर्चा के पारित करने के लिए गिलोटिन के इस्तेमाल की अटकलें लगी थीं।

फायदे और आलोचना

राजनीतिक विश्लेषक और आलोचक इसे अलोकतांत्रिक मानते हैं, क्योंकि इससे महत्वपूर्ण वित्तीय मुद्दों पर विस्तृत बहस छूट जाती है। विपक्ष की आपत्तियां नजरअंदाज हो सकती हैं, जो संसद के मूल उद्देश्य - बहस और जवाबदेही, को कमजोर करती है। जैसा कि रिजिजू के बयान में देखा गया, यह विपक्ष को 'झटका' देने का माध्यम बन सकता है, लेकिन इससे लोकतंत्र की छवि पर सवाल उठते हैं। अगर विपक्ष की भूमिका ही नकार दी जाए, तो संसद मात्र एक रबर स्टैंप बनकर रह जाएगी।

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रिजिजू की चेतावनी से साफ है कि सरकार संसद को सुचारू रखने के लिए सख्त कदम उठाने को तैयार है। लेकिन गिलोटिन जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल लोकतंत्र की भावना के अनुरूप होना चाहिए। विपक्ष को भी जिम्मेदारी से कार्यवाही में भाग लेना चाहिए, ताकि संसद सही मायनों में जनता की आवाज बन सके। यह मुद्दा राजनीतिक बहस को और गर्माने वाला है, और आने वाले सत्रों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।