कृति सैनन के रक्षाबंधन विज्ञापन में उनके पहनावे को लेकर कंगना रनौत ने तीखी आलोचना की थी। कुछ लोग सोशल मीडिया पर कृति सैनन व 'जीवा' का विरोध करने लगे। जीवा से पहले भी दक्षिणपंथियों के विरोध पर तनिष्क और फैबइंडिया के विज्ञापनों को वापस लेने पड़ा था।
अभिनेत्री कृति सैनन के रक्षाबंधन विज्ञापन में पहनावे पर विवाद के बाद ज्वेलरी ब्रांड जीवा ने इस विज्ञापन को वापस ले लिया है। विज्ञापन में सैनन के पहनावे को लेकर अभिनेत्री और बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी आलोचना की थी। इस बीच सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने जीवा और कृति सैनन के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। इसके बाद कंपनी ने विज्ञापन हटाने का फ़ैसला किया।
यह पहला ऐसा मामला नहीं है जब सोशल मीडिया पर विरोध या बहिष्कार की धमकी के कारण विज्ञापन को हटाना पड़ा हो। 2020-21 के आसपास ज्वेलरी ब्रांड तनिष्क और कपड़ा ब्रांड फैबइंडिया को भी अपने-अपने विज्ञापन हटाने पड़े थे। इन विज्ञापनों के ख़िलाफ़ भी बीजेपी नेता से लेकर उनके समर्थक और दक्षिणपंथी लोगों ने अभियान चलाया था। अब यह ज्वेलरी ब्रांड जीवा के विज्ञापन का मामला सामने आया है।
क्या है कृति सैनन का विवाद?
जीवा ने रक्षाबंधन के मौक़े पर एक विज्ञापन जारी किया था, जिसमें कृति सैनन अपने भाई को राखी बांधती नजर आ रही थीं। विज्ञापन में उन्होंने आधुनिक परिधान पहना था। कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने इसे धार्मिक त्योहार के लिए 'ग़लत' बताते हुए कहा कि इस तरह का पहनावा भारतीय परंपरा और रक्षाबंधन जैसे त्योहार की भावना के अनुरूप नहीं है। इसके बाद सोशल मीडिया पर विज्ञापन का विरोध शुरू हो गया।
कंगना रनौत ने क्या कहा?
कंगना रनौत ने भी इस विज्ञापन पर नाराज़गी जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि विज्ञापन 'जानबूझकर अजीब और असहज' बनाया गया है। उन्होंने सवाल किया कि कोई महिला अपने भाई को राखी बांधने के लिए इस तरह के कपड़े क्यों पहनेगी, जबकि पारंपरिक और भारतीय परिधान के कई विकल्प मौजूद हैं।जीवा ने विज्ञापन हटाया
विवाद बढ़ने के बाद जीवा ने बुधवार को एक बयान जारी किया। कंपनी ने कहा कि वह भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों का पूरा सम्मान करती है। कंपनी ने कहा कि यदि इस विज्ञापन से किसी की भावनाएँ आहत हुई हैं तो उसका ऐसा कोई इरादा नहीं था। लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए विज्ञापन को सभी डिजिटल और अन्य प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया है।कृति सैनन ने दिया जवाब
विज्ञापन पर विवाद के बीच कृति सैनन ने इंस्टाग्राम पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि किसी महिला की संस्कृति और परंपरा उसके दिल में होती है, उसके कपड़ों की नेकलाइन में नहीं। उन्होंने कहा कि त्योहारों की असली भावना कपड़ों से नहीं, बल्कि उनसे जुड़े प्रेम, सम्मान और भावनाओं से तय होती है।
कृति ने यह भी सवाल उठाया कि आज भी महिलाओं को यह क्यों बताया जाता है कि उन्हें क्या पहनना चाहिए। उनके अनुसार फैशन समय के साथ बदलता है, लेकिन इससे किसी की संस्कृति या परंपरा के प्रति सम्मान कम नहीं हो जाता।राहुल गांधी ने भी किया समर्थन
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कृति सैनन की बात का समर्थन किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि एक महिला क्या पहनेगी, क्या करेगी और कहां जाएगी, यह उसका अपना फैसला है। राहुल गांधी ने महिलाओं को उनके कपड़ों के आधार पर ट्रोल किए जाने का विरोध करते हुए महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थन किया।
यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े ब्रांड को विरोध के बाद अपना विज्ञापन हटाना पड़ा हो।
फैबइंडिया का 'जश्न-ए-रिवाज़' विवाद
साल 2021 में कपड़ा कंपनी फैबइंडिया ने दिवाली कलेक्शन का नाम 'जश्न-ए-रिवाज़' रखा था। कुछ बीजेपी नेताओं और दक्षिणपंथी संगठनों ने आरोप लगाया कि हिंदू त्योहार का 'इब्राहीमीकरण' किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर बहिष्कार अभियान चलने के बाद कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया था।बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने ट्वीट कर फैबइंडिया पर निशाना साधा था, 'दीपावली जश्न-ए-रिवाज़ नहीं है। पारंपरिक हिंदू परिधानों के बिना मॉडल का चित्रण करने वाले हिंदू त्योहारों के इब्राहिमीकरण के इस जानबूझकर प्रयास को बंद किया जाना चाहिए। और फैबइंडिया जैसे ब्रांडों को इस तरह के जानबूझकर किए गए दुस्साहस के लिए आर्थिक नुक़सान का सामना करना पड़ेगा।' बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने ट्वीट किया था, 'वक़्त है फैबइंडिया के बहिष्कार का। वे हमारे पैसे के लायक नहीं हैं।'
तनिष्क के विज्ञापन पर भी हुआ था विरोध
साल 2020 में टाटा समूह के ज्वेलरी ब्रांड तनिष्क का 'एकत्वम' विज्ञापन भी विवादों में आ गया था। इसमें अलग-अलग धर्मों के बीच विवाह दिखाया गया था। कुछ संगठनों ने इसे 'लव जिहाद' से जोड़कर विरोध किया, जिसके बाद कंपनी ने विज्ञापन हटा दिया।
इसके बाद दिवाली पर पटाखे कम जलाने और प्यार व सकारात्मकता के साथ त्योहार मनाने वाले तनिष्क के एक अन्य विज्ञापन का भी विरोध हुआ था। आलोचकों का कहना था कि कोई कंपनी लोगों को यह नहीं बता सकती कि हिंदू त्योहार कैसे मनाया जाए। बढ़ते विवाद के बाद वह विज्ञापन भी हटा लिया गया था।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक संवेदनशीलता
बहरहाल, जीवा के विज्ञापन को लेकर एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि विज्ञापनों और रचनात्मक अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा क्या होनी चाहिए। एक पक्ष का कहना है कि त्योहारों से जुड़े विज्ञापनों में सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाना चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि किसी महिला के पहनावे के आधार पर उसकी संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान का आकलन नहीं किया जा सकता।
इस पूरे विवाद के बाद जीवा ने विज्ञापन हटाने का फ़ैसला कर लिया है, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर विज्ञापन, सामाजिक दबाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।