परिसीमन पर संसद का विशेष सत्र बुलाने के सरकार के संकेत के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसको लेकर पीएम मोदी को ख़त लिखा है और विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने साफ़ कहा है कि मौजूदा 543 सीटें अगले 25 साल तक बरकरार रखी जाएँ। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि यदि विशेष सत्र की तैयारी है तो पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और सभी दलों को बिल की कॉपी देकर पर्याप्त समय दिया जाए। खड़गे ने कहा है कि वह यह ख़त इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि संसदीय कार्य मंत्री किरेण रिजिजू ने एक मीडिया इंटरव्यू में इसका संकेत दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि मानसून सत्र के अवसान की घोषणा में लगातार देरी की भी शायद इसी वजह से है।

तो एक बार फिर से देश में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या सरकार परिसीमन से जुड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी कर रही है। खड़गे का यह पत्र तब आया है जब संसदीय कार्य मंत्री किरेण रिजिजू ने एक टीवी इंटरव्यू में संकेत दिया कि संसद की मौजूदा बैठक पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और जरूरत पड़ने पर फिर से बुलाई जा सकती है।
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'पीएम मोदी स्थिति साफ़ करें'

अपने पत्र में मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि उन्होंने 16 जुलाई 2026 को भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर परिसीमन के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस विषय पर कोई विधेयक लाने की योजना बना रही है तो पहले सभी दलों को उसका मसौदा दिया जाए ताकि वे विस्तार से उसका अध्ययन कर सकें और अपनी राय रख सकें।

खड़गे ने पीएम मोदी को लिखा कि परिसीमन देश के संघीय ढाँचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा बेहद अहम विषय है, इसलिए इस पर पूरी चर्चा और सहमति ज़रूरी है।

कांग्रेस की मांगें क्या?

अपने पत्र में कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने पार्टी का आधिकारिक रुख भी साफ़ किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की मांग है-
  • लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या अगले 25 वर्षों तक बरकरार रखी जाए।
  • राज्यों के हिसाब से लोकसभा सीटों का वर्तमान बंटवारा भी अगले 25 साल तक नहीं बदला जाए।
  • 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जाए।
खड़गे ने कहा कि इस मुद्दे पर जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय व्यापक राजनीतिक सहमति बनाई जानी चाहिए।

'जल्दबाजी में फैसला न लें'

पत्र में खड़गे ने सरकार को सलाह दी कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी न की जाए। उन्होंने लिखा कि सरकार को इस विषय पर पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ खुली चर्चा करनी चाहिए और पर्याप्त समय देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अप्रैल 2026 की तरह किसी संवैधानिक संशोधन को जल्दबाजी में पारित कराने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।

रिजिजू के बयान से बढ़ी अटकलें

खड़गे का पत्र संसदीय कार्य मंत्री किरेण रिजिजू के उस बयान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि संसद के मानसून सत्र का अभी तक औपचारिक रूप से अवसान नहीं हुआ है। रिजिजू ने कहा कि जब तक संसद का सत्र औपचारिक रूप से समाप्त नहीं होता, तब तक सरकार जरूरत पड़ने पर उसी सत्र को दोबारा बुला सकती है। उन्होंने कहा कि सही समय आने पर सरकार स्थिति साफ़ करेगी।

कांग्रेस ने पहले भी उठाया था सवाल

कुछ दिन पहले कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया था कि मानसून सत्र ख़त्म होने के कई दिन बाद भी लोकसभा को औपचारिक रूप से स्थगित क्यों नहीं किया गया। कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई थी कि सरकार परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए विशेष बैठक बुला सकती है।

परिसीमन क्यों है अहम मुद्दा?

परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएँ तथा सीटों का पुनर्निर्धारण किया जाता है।
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इस प्रक्रिया का असर अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने पहले भी आशंका जताई है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण हुआ, तो उनकी लोकसभा सीटें घट सकती हैं जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं। इसी वजह से यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।

सरकार की ओर से अभी अंतिम फ़ैसला नहीं

फिलहाल केंद्र सरकार ने परिसीमन पर किसी विशेष सत्र की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। हालाँकि संसदीय कार्य मंत्री के बयान और कांग्रेस अध्यक्ष के पत्र के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। अब सभी की नज़र इस बात पर रहेगी कि सरकार विशेष सत्र बुलाती है या पहले इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक आयोजित करती है।