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राज्यों का हक छीनने के लिए आईएएस नियम बदल रही मोदी सरकार?

आईएएस नियमों में केंद्र के प्रस्तावित बदलावों का जबरदस्त विरोध हो रहा है। राज्य इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि ये बदलाव आईएएस अधिकारियों की पोस्टिंग पर निर्णय लेने के लिए केंद्र को व्यापक अधिकार देते हैं। नियमों में प्रस्तावित बदलाव को लेकर कम से कम पाँच राज्यों ने आपत्ति की है और इसमें एनडीए व बीजेपी शासित राज्य भी शामिल हैं। हालाँकि, इस संबंध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ख़त ही साामने आया है और इससे केंद्र और राज्यों के बीच तनातनी बढ़ने के आसार हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आठ दिनों में गुरुवार को दूसरा पत्र भेजा है। उन्होंने इस प्रस्तावित बदलाव को और अधिक 'कठोर' क़रार दिया है।

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ममता बनर्जी ने कहा कि प्रस्तावित बदलाव से संबंधित अधिकारी और राज्य सरकार की सहमति के बिना ही केंद्र को आईएएस अधिकारियों को स्थानांतरित करने का अधिकार मिलेगा। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने इस क़दम को भारत की संवैधानिकता के बुनियादी ढांचे का विरोधी क़रार दिया।

उन्होंने कहा, 'यह हमारे संघीय ताने-बाने और हमारे संविधान के बुनियादी ढांचे को भी नष्ट करने वाला है। यह हमारा संविधान है जो राज्यों को उनकी शक्तियां और कार्य देता है और यह हमारा संविधान है जो अखिल भारतीय सेवाओं की रूपरेखा और संरचना देता है जैसा कि वे मौजूद हैं। केंद्र सरकार ने अब जिस तेजी से एकतरफा प्रस्ताव रखा है, वह उस ढांचे की जड़ पर प्रहार करेगा जो हमारे लोकतंत्र की स्थापना के बाद से मौजूद है और अच्छी तरह से काम करता रहा है।' 

ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी को अपनी सख्त नाराज़गी जताते हुए दो पन्नों का ख़त लिखा है। इस बीच महाराष्ट्र सरकार ने भी एक कैबिनेट बैठक में आईएएस कैडर नियमों में बदलाव का कड़ा विरोध करने का फ़ैसला किया है। 

मुंबई में महाराष्ट्र कैबिनेट की बैठक में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और बिजली मंत्री नितिन राउत ने यह मुद्दा उठाया। राउत ने कहा,

मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों ने केंद्र के उन संशोधनों का कड़ा विरोध करने का फ़ैसला किया है जो स्पष्ट रूप से राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना आईएएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर बुलाने के लिए अधिक अधिकार देते हैं।


नितिन राउत, महाराष्ट्र मंत्री

मौजूदा नियमों के तहत तीन अखिल भारतीय सेवा यानी एआईएस के अधिकारी - आईएएस, भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस और भारतीय वन सेवा के अधिकारी - एक कैडर के रूप में एक राज्य (या छोटे राज्यों के समूह) से जुड़े होते हैं। ये अधिकारी उसी कैडर में तब तक सेवा देते हैं जब तक कि वे केंद्र सरकार में सेवा देने का विकल्प नहीं चुनते हैं। यदि वे इस विकल्प का प्रयोग करते हैं तो संबंधित राज्य को केंद्र द्वारा पोस्टिंग के लिए विचार किए जाने से पहले उनके अनुरोध पर सहमत होना होता है।

अब केंद्र सरकार इस नियम में बदलाव करना चाहती है। उसने अपने ताज़ा मसौदे में दो और संशोधन शामिल किए हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ये संशोधन किसी भी आईएएस अधिकारी को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर 'जनहित' में एक निर्धारित समय सीमा के भीतर बुलाने की शक्ति देते हैं। यदि राज्य अधिकारी को कार्यमुक्त करने में विफल रहता है, तो उसे केंद्र द्वारा निर्धारित नियत तारीख़ के बाद अपने आप कार्यमुक्त माना जाएगा। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि केंद्र ने आईपीएस और भारतीय वन सेवा के अधिकारियों के लिए इसी तरह के संशोधन का प्रस्ताव दिया है।

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रिपोर्ट के अनुसार सूत्रों ने कहा है कि कम से कम पांच राज्यों ने प्रस्तावित बदलावों का विरोध करते हुए केंद्र को पत्र भेजे हैं। इनमें पश्चिम बंगाल और ओडिशा के अलावा बीजेपी और एनडीए शासित मध्य प्रदेश, बिहार और मेघालय भी शामिल हैं। अन्य राज्यों ने अभी तक प्रतिक्रिया नहीं दी है, हालांकि महाराष्ट्र सरकार इस कदम का विरोध करने के लिए केंद्र को एक पत्र भेजने की तैयारी कर रही है। राज्यों को जवाब देने की समय सीमा 5 जनवरी से बढ़ाकर 25 जनवरी कर दी गई है।

प्रस्तावों के बारे में पूछे जाने पर डीओपीटी के पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "केंद्र यह नहीं कह रहा है कि राज्यों का अधिकार ख़त्म कर दिया जाएगा। एक बार जब केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों की संख्या आपसी परामर्श के बाद तय हो जाती है तो केंद्र सरकार के पास उन अधिकारियों को प्राप्त करने के लिए अधिक शक्तियां होनी चाहिए। यहां तक ​​कि 'जनहित' में भी आपसी सहमति वाले पूल से अधिकारियों को बुलाया जाएगा।"

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तो सवाल है कि आईएएस कैडर के नियमों में बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी? वैसे तो एक जवाब विपक्षी दल यह आरोप लगाकर दे रहे हैं कि इससे राज्य का अधिकार कम करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास डेपुटेशन पर लगाने के लिए आईएएस अधिकारियों की कमी है। 

एचटी ने कुछ दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट दी है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व यानी सीडीआर पर उपलब्ध आईएएस अधिकारियों की संख्या घट गई है। 2011 में यह संख्या जहाँ 309 थी वह अब घटकर 223 रह गई है। सवाल तो यह भी है कि यह संख्या कैसे घट गई?

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