सोशल मीडिया पर पीएम मोदी का क्या बुरा दौर आ चुका है। इंस्टाग्राम, फेसबुक पर जिस तरह पीएम मोदी के खिलाफ पोस्ट और रील डाली जा रही है, उससे पूरी सरकार और बीजेपी परेशान है। पीएम मोदी ने गुरुवार को पेपर लीक विरोधी बिल पास होने के बाद अपनी तीसरी रील डाली थी। कुछ ही मिनट में उस पर आपत्तिजनक टिप्पणियां होने लगीं। लोग मीम बनाने लगे। इसी तरह उनकी पिछली दो इंस्टा रील का भी हाल हुआ था। 
इसी के मद्देनज़र तेलंगाना की हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित रूप से आपत्तिजनक, एडिटेड (मॉर्फ्ड) और एआई-जनरेटेड (AI-generated) सामग्री पोस्ट करने के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस ने कई फेसबुक (Facebook) और इंस्टाग्राम (Instagram) अकाउंट ऑपरेटरों के साथ-साथ सोशल मीडिया कंपनी मेटा (Meta) के भारत प्रमुख अरुण श्रीनिवास को सह-आरोपी बनाते हुए दो अलग-अलग मामले (FIR) दर्ज की हैं।
यह पूरी कार्रवाई हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा नीट (NEET) पेपर लीक और छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान चलाए गए सोशल मीडिया अभियानों से जुड़ी है।
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क्या है पूरा मामला?

BJP के नेताओं और समर्थकों की शिकायतों के आधार पर हैदराबाद पुलिस ने यह कार्रवाई की है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि छात्रों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिकी राष्ट्रपति और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की तस्वीरों और वीडियोज को एडिट कर अश्लील, भ्रामक व मानहानिकारक रूप में सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जा रहा था। 

दो प्रमुख शिकायतों के आधार पर बड़ी कार्रवाई

  • टी. साईकिरण गौड़ (तेलंगाना बीजेपी सोशल मीडिया कोर कमेटी सदस्य):
उन्होंने पुलिस को 20 फेसबुक और इंस्टाग्राम लिंक्स सौंपते हुए आरोप लगाया कि ये अकाउंट्स देश के प्रधानमंत्री और संवैधानिक गरिमा को ठेस पहुँचाने तथा सार्वजनिक व्यवस्था एवं संप्रभुता को प्रभावित करने वाली सामग्री फैला रहे थे। उन्होंने इस तरह के कंटेंट की मेजबानी (hosting) करने के लिए प्लेटफॉर्म के रूप में मेटा पर भी कार्रवाई की मांग की।

  • एस. अरविंद रेड्डी (बीजेपी समर्थक, नामपल्ली):
उन्होंने शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि कई इंस्टाग्राम हैंडल्स ने प्रधानमंत्री व अन्य नेताओं के खिलाफ एआई और डिजिटल टूल्स की मदद से अश्लील व फर्जी वीडियो/तस्वीरें बनाकर जनता को गुमराह करने का प्रयास किया।

दर्ज धाराएं और पुलिस की कार्रवाई

हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की प्रासंगिक धाराओं के तहत मामले दर्ज किए हैं। साइबर अपराध जांच अधिकारियों ने बताया कि मेटा को एक औपचारिक नोटिस जारी कर शिकायत की गई आपत्तिजनक सामग्री और संबंधित अकाउंट्स के विवरण मांगे गए हैं। पुलिस के अनुसार, शिकायत में उल्लेख किए गए सभी 20 सोशल मीडिया लिंक्स 30 जुलाई की शाम तक निष्क्रिय (In-active) कर दिए गए हैं। पुलिस अब इन सोशल मीडिया अकाउंट्स को चलाने वाले डिजिटल ऑपरेटरों की पहचान करने और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए तकनीकी जांच कर रही है।
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एन. वी. सुभाष ने इस कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा: "लोकतंत्र में असहमति और आलोचना की अनुमति है, लेकिन डिजिटल लिंचिंग और संगठित गाली-गलौज की नहीं। आलोचना और राजनीतिक बहस का स्वागत है, लेकिन अभद्र और अश्लील कंटेंट को एक्टिविज़्म का नाम नहीं दिया जा सकता।"

पीएम मोदी की लोकप्रियता जेन ज़ी में क्यों घट रही है

भारत की युवा पीढ़ी यानी जेन ज़ी (Gen Z) के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्ता पक्ष के प्रति बढ़ते असंतोष के पीछे कई आर्थिक और सामाजिक कारक काम कर रहे हैं। इस पीढ़ी का मुख्य सरोकार करियर, शिक्षा और भविष्य की स्थिरता है। हाल के दिनों में नीट (NEET) जैसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए पेपर लीक, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी की ऊंची दर और सरकारी विभागों में जवाबदेही की कमी ने युवाओं को गहरा आघात पहुँचाया है। वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद जब युवाओं का भविष्य अंधकार में दिखता है, तो उनका निराशाजनक गुस्सा किसी राजनीतिक व्यक्ति या सरकार के शीर्ष नेतृत्व की ओर सीधा लक्षित होता है।
सोशल मीडिया पर इस गुस्से के तेवर आक्रामक और कभी-कभी अभद्र होने के पीछे इंटरनेट संस्कृति और भाषा के बदलाव की बड़ी भूमिका है। जेन ज़ी का संचार माध्यम मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, डार्क ह्यूमर (Dark Humor), मीम्स और रील संस्कृति है। अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने के लिए यह पीढ़ी पारंपरिक भाषणों या ज्ञापनों के बजाय व्यंग्य, मॉर्फ्ड तस्वीरें, एआई-जनरेटेड कंटेंट और कटाक्ष भरे शब्दों का सहारा लेती है। डिजिटल स्पेस में बिना किसी प्रत्यक्ष डर के तुरंत ध्यान आकर्षित करने की चाहत और वायरल होने की होड़ में अक्सर राजनीतिक विरोध और अश्लीलता/अभद्रता के बीच की लाइन धुंधली हो जाती है।
दूसरा मुख्य कारण लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के पार पारंपरिक रास्तों का बंद होना या बेअसर महसूस होना है। मुख्यधारा के मीडिया (टीवी न्यूज चैनलों) को लेकर युवाओं में एक बड़ा अविश्वास पैदा हुआ है, जहाँ उन्हें लगता है कि उनके वास्तविक मुद्दों (जैसे नौकरी, पेपर लीक, महंगाई) की अनदेखी की जाती है। जब युवाओं को लगता है कि संस्थागत स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही या उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है, तो वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ही अपना हथियार बना लेते हैं। मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों के स्तर पर कार्रवाई न होने की स्थिति में वे सीधे प्रधानमंत्री को ही सत्ता का अंतिम प्रतीक मानकर निशाने पर लेते हैं।
हालाँकि, इस आक्रोश में सीमा पार करना या व्यक्तिगत स्तर पर अपशब्दों का प्रयोग करना इंटरनेट की स्वाभाविक उग्रता (Online Disinhibition Effect) को दर्शाता है। ऑनलाइन दुनिया में नाम छिपाने (अनाम रहने) की सुविधा और तुरंत प्रतिक्रिया देने का माहौल युवाओं को उत्तेजित करता है। जब किसी एक मुद्दे पर सामूहिक आक्रोश (Digital Mob Mentality) बनता है, तो लोग अक्सर बिना दूरगामी परिणाम सोचे मर्यादा की सीमाएं लांघ जाते हैं। जहाँ एक तरफ यह युवाओं के वास्तविक अधिकारों और जवाबदेही मांगने का जरिया है, वहीं दूसरी ओर भाषा का गिरता स्तर डिजिटल संवाद में बढ़ती आक्रामकता को भी स्पष्ट रूप से उजागर करता है।