मोदी सरकार ने सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को अब राष्ट्र गान 'जन गण मन' से पहले गाना अनिवार्य कर दिया है। इसके लिए सरकार ने राज्यों और मंत्रालयों को एक नया निर्देश जारी किया है। गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों से कहा है कि सरकारी कार्यक्रमों में यदि राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' और राष्ट्रगान 'जन गण मन' दोनों गाए या बजाए जाएँ तो सबसे पहले 'वंदे मातरम' पेश किया जाए। मंत्रालय ने इस निर्देश का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।

इसके साथ ही केंद्र सरकार 'वंदे मातरम' के अपमान या इसके गायन में बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। इसके लिए राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन का विधेयक संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना है।

राज्यों और मंत्रालयों को भेजा गया पत्र

गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव अरविंद खरे ने 9 जुलाई को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों के सचिवों को पत्र भेजकर कहा है कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान से जुड़े पहले से जारी आदेशों का सख्ती से पालन कराया जाए। द हिंदू ने यह ख़बर दी है। रिपोर्ट के अनुसार पत्र में साफ़ कहा गया है कि यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में 'वंदे मातरम' और 'जन गण मन' दोनों पेश किए जाएं तो पहले 'वंदे मातरम' गाया या बजाया जाएगा।
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इसने यह भी कहा है कि दोनों के मूल शब्द, सही लिपि और सही उच्चारण का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए। सभी सरकारी संस्थानों, विभागों और संगठनों को इस संबंध में आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।

फरवरी में भी जारी हुए थे निर्देश

गृह मंत्रालय ने इससे पहले 6 फरवरी को भी इसी विषय पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। उन निर्देशों में कहा गया था कि सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' के सभी छह अंतरे यानी Stanzas गाए या बजाए जाएं। पूरे राष्ट्रीय गीत को पेश करने में क़रीब 3 मिनट 10 सेकंड का समय लगता है। इसे राष्ट्रगान से पहले प्राथमिकता दी जाए।

संसद में आएगा नया कानून

केंद्र सरकार अब कानून में भी बदलाव की तैयारी कर रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 5 मई को राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन को मंजूरी दी थी। 

यदि संसद इस संशोधन को पारित कर देती है तो 'वंदे मातरम' का अपमान करना और इसके गायन या वादन में बाधा डालना दंडनीय अपराध माना जाएगा। सरकार इस संशोधन विधेयक को 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में पेश कर सकती है।

अभी क्या है कानून?

मौजूदा क़ानून के तहत राष्ट्रगान 'जन गण मन' का अपमान, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान और संविधान का अपमान दंडनीय अपराध हैं। ऐसे मामलों में तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। प्रस्तावित संशोधन के बाद 'वंदे मातरम' को भी इसी कानूनी संरक्षण के दायरे में लाया जाएगा।

वंदे मातरम कैसे बना राष्ट्रगीत

'वंदे मातरम' की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित हुआ था। 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कार्यक्रमों में इसके पहले दो अंतरों के उपयोग का निर्णय लिया था। स्वतंत्र भारत में संविधान ने 'वंदे मातरम' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया, जबकि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित 'जन गण मन' को राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त है।
राष्ट्रीय गीत को लेकर केंद्र सरकार के लगातार फैसलों पर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि इससे राष्ट्रीय गीत को उसका उचित सम्मान मिलेगा और सरकारी कार्यक्रमों में एक समान व्यवस्था लागू होगी। वहीं, आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को लेकर नई व्यवस्थाओं तथा प्रस्तावित दंडात्मक प्रावधानों पर व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक चर्चा होनी चाहिए।

वंदे मातरम पर लगातार हो रहा विवाद?

वंदे मातरम पर मोदी सरकार के एक के बाद एक फ़ैसले पर लगातार विवाद हो रहा है। गृह मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में आदेश जारी किया था कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम के पूरे 6 छंद को राष्ट्रगान जन गण मन से पहले बजाया या गाया जाए। सरकार का तर्क है कि वंदे मातरम राष्ट्रगीत है, स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है। 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसका पूरा सम्मान दिया जाना चाहिए।

आलोचकों की आपत्ति है कि पूरे 6 छंदों में हिंदू देवी-देवताओं दुर्गा, लक्ष्मी आदि का उल्लेख है, जो कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को धार्मिक रूप से असहज करता है। कुछ मुस्लिम संगठन और मुस्लिम व्यक्ति आपत्ति जताते रहे हैं। कुछ मुस्लिम नेता, काउंसिलर इसे मूर्तिपूजा मानकर गाने से इनकार कर चुके हैं।

इन आपत्तियों के पीछे ऐतिहासिक संदर्भ है। 1937 में गांधी, नेहरू, पटेल आदि के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यसमिति ने फैसला लिया था कि केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे, क्योंकि बाद के छंदों में धार्मिक प्रतीक हैं। पूरे गीत को अनिवार्य करने को धार्मिक रूप से थोपना और अल्पसंख्यकों पर दबाव माना गया। तब यह भी तर्क दिया गया कि यदि सभी छंद गाए जाएँ तो सांप्रदायिक फूट हो सकती है और स्वतंत्रता आंदोलन कमजोर पड़ सकता है।

विपक्ष क्या आरोप लगाता है?

विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि मोदी सरकार सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति कर रही है। इसका आरोप है कि बीजेपी 1937 के फैसले को 'मुस्लिम तुष्टिकरण' बताकर इतिहास को तोड़-मरोड़ रही है। राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम को अनिवार्य करना संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है। यह अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने की कोशिश है।

क्या होना चाहिए?

जानकारों का कहना है कि वंदे मातरम राष्ट्रगीत है, लेकिन जन गण मन राष्ट्रगान है। दोनों का सम्मान जरूरी है, लेकिन अनिवार्यता विवादास्पद है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हिमायती तर्क देते हैं कि किसी को जबरन गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। अदालतें भी यही कह चुकी हैं। गीत का सम्मान बढ़ाने के बजाय इसे राजनीतिक हथियार बनाना दोनों पक्षों के लिए ठीक नहीं।

यह विवाद पुराना है, लेकिन मोदी सरकार के नए आदेश ने इसे फिर से जिंदा कर दिया। यह राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर धार्मिक-राजनीतिक मतभेद का प्रतीक बन गया है। इसी बीच संसद के मानसून सत्र में सरकार 'वंदे मातरम' के अपमान को दंडनीय अपराध बनाने वाला विधेयक पेश कर सकती है। संसद में यह मुद्दा और गरमाएगा।