जंतर मंतर प्रोटेस्ट के भारी दबाव के बाद ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होने के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या मोदी सरकार केवल बड़े जनदबाव के बाद ही अपने फ़ैसलों पर पीछे हटती है। पिछले 12 वर्षों में ऐसे कई मौक़े आए हैं जब लंबे विरोध प्रदर्शनों और बड़े जनदबाव के बाद सरकार को अपना रुख बदलना पड़ा या बड़ा राजनीतिक फ़ैसला लेना पड़ा। ऐसे कम से कम तीन मौक़े आए।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जुड़े इस घटनाक्रम से पहले तीन कृषि क़ानून और सीएए-एनआरसी के मामले में सरकार काफी लंबे और देशव्यापी प्रोटेस्ट के बाद ही अपने फ़ैसले वापस लिये थे। इन तीनों ही मामलों में सरकार शुरुआत में विरोध पर सख्ती करती और बदनाम करने की कोशिश करती दिखी, लेकिन जब आंदोलन का राजनीतिक असर बढ़ने लगा तो उसका रुख बदल गया। लेकिन इन तीनों ही मामलों में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के लिए हुआ प्रोटेस्ट अलग रहा और इसका संदेश भी दूर तक जाने वाला बताया जा रहा है।

CAA-NRC आंदोलन: सरकार पहली बार झुकी

मोदी सरकार के खिलाफ पहला बड़ा देशव्यापी आंदोलन नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी को लेकर हुआ था। देशभर में कई महीनों तक प्रदर्शन हुए। विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि सीएए और एनआरसी मिलकर बड़ी संख्या में लोगों को नागरिकता से वंचित कर सकते हैं।

हालाँकि, सरकार ने सीएए वापस नहीं लिया, लेकिन पूरे देश में एनआरसी लागू करने की योजना पर बाद में कोई ठोस कदम आगे नहीं बढ़ाया गया। जबकि देश के गृहमंत्री अमित शाह लगातार और देश भर में घूम घूमकर कहते फिर रहे थे कि सीएए-एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि देशव्यापी एनआरसी पर कोई फ़ैसला नहीं हुआ है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सरकार के रुख में एक अहम बदलाव था।

कृषि क़ानून पर दूसरी बार झुकी सरकार

साल 2020 में केंद्र सरकार तीन नए कृषि कानून लेकर आई थी। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों के किसान लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे। करीब एक वर्ष तक चले आंदोलन के दौरान सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन समाधान नहीं निकला।

शुरुआत में किसानों को रोकने के लिए सड़कों पर गड्ढे खोदे गए, पानी की बौछारें की गईं, दिल्ली के बॉर्डर पर सड़कों पर कीलें ठोकी गईं। जब किसान बॉर्डर पर पहुँचे तो उनके प्रदर्शन की जगह की पानी, बिजली की लाइनें तक काटी गईं। खालिस्तानी, आतंकवादी बताकर बदनाम करने की कोशिश की गई। इन सबके बाद भी किसान नहीं झुके। आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की और किसानों से माफी भी मांगी। यह फैसला मोदी सरकार के सबसे बड़े राजनीतिक यू-टर्न में से एक माना गया।

पेपर लीक पर तीसरा बड़ा आंदोलन

इस बार आंदोलन का केंद्र प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग रही। इस आंदोलन की खास बात यह रही कि इसका नेतृत्व किसी एक राजनीतिक दल या संगठन के हाथ में नहीं था। बड़ी संख्या में छात्र और युवा सोशल मीडिया के ज़रिए जुड़े और कई शहरों में प्रदर्शन हुए।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगातार धरना चला। बाद में यह आंदोलन कई राज्यों तक फैल गया। छात्रों की मुख्य मांगों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में सुधार और पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून शामिल थे। सरकार ने शुरुआत में आंदोलन को लेकर सख्त रुख अपनाया, लेकिन बाद में प्रदर्शनकारी प्रतिनिधियों से बातचीत शुरू की। इसी दौरान परीक्षा सुधारों और कड़े कानूनों पर भी चर्चा तेज हुई।

आंदोलन की रणनीति क्यों अलग रही?

इस आंदोलन को पहले के आंदोलनों से अलग माना जा रहा है। इसका कोई एक बड़ा नेता नहीं था। सोशल मीडिया इसकी सबसे बड़ी ताकत बना। मीम, छोटे वीडियो और ऑनलाइन अभियान के जरिए बड़ी संख्या में युवा इससे जुड़े। आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से लंबे समय तक जारी रहा। माना जा रहा है कि इसी वजह से सरकार के लिए पारंपरिक राजनीतिक बातचीत के जरिए आंदोलन को ख़त्म करना आसान नहीं रहा।

20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन और तेज हो गया। इसके बाद कई सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और विपक्षी नेता भी आंदोलन के समर्थन में सामने आए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पुलिस कार्रवाई से आंदोलन कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ।

बीजेपी के लिए यह आंदोलन अलग क्यों?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या में ऐसे छात्र शामिल थे, जिन्हें परंपरागत रूप से बीजेपी के समर्थक सामाजिक वर्ग का हिस्सा माना जाता है। यही वजह बताई जा रही है कि सरकार ने इस मुद्दे पर बातचीत का रास्ता अपनाया और परीक्षा सुधारों से जुड़े कदमों की घोषणा भी की।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा का राजनीतिक संदेश?

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पिछले कई सप्ताह से चल रहे छात्र आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा रही। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोपों के बाद हजारों छात्र सड़कों पर उतरे और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करने लगे। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना था कि केवल कानून बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि जवाबदेही तय होना भी जरूरी है। इसी कारण उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाया। भारी जनदबाव के बीच धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा।

यह पिछले एक दशक में दूसरा बड़ा मौका है जब किसी केंद्रीय मंत्री को सार्वजनिक दबाव के बीच पद छोड़ना पड़ा। इससे पहले 2018 में #MeToo अभियान के दौरान तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर ने इस्तीफा दिया था।

एमजे अकबर का मामला थोड़ा अलग?

जूनियर विदेश मंत्री के तौर पर एम. जे. अकबर का इस्तीफ़ा अलग हालात में हुआ था। सीएए-एनआरसी, कृषि कानूनों या प्रधान के ख़िलाफ़ हुए विरोध-प्रदर्शनों के उलट, #MeToo आंदोलन सरकार की किसी नीति या उसकी वैधता के ख़िलाफ़ नहीं था। फिर भी, मोदी सरकार के दौर में यह एकमात्र ऐसा साफ़ मामला था जब किसी मंत्री को नागरिक समाज के आंदोलन और जनता के दबाव में इस्तीफ़ा देना पड़ा।

क्या सरकार केवल दबाव में फैसले बदलती है?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कृषि कानून, सीएए-एनआरसी विवाद और हालिया छात्र आंदोलन से एक समान पैटर्न दिखाई देता है। उनके अनुसार सरकार अक्सर शुरुआती दौर में विरोध को कानून-व्यवस्था या राजनीतिक विरोध के रूप में देखती है। लेकिन जब आंदोलन व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लेता है और उसका राजनीतिक असर बढ़ने लगता है, तब सरकार अपने रुख पर फिर से विचार करती है।

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि वह छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से ले रही है और परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए लगातार कदम उठा रही है। सरकार के अनुसार उसका मक़सद केवल तत्काल विवाद का समाधान नहीं, बल्कि भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था तैयार करना है। कृषि कानूनों, CAA और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जुड़े तीन आंदोलनों ने मोदी सरकार के रवैये को दिखाया है कि यह तभी मुद्दों को सुनती है जब इसको बड़ा ख़तरा दिखता है। आम विरोध या नागिरक समाज के तर्क से फर्क नहीं पड़ता?