केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से जनहित याचिका (PIL) को पूरी तरह खत्म करने का आग्रह किया है, यह कहते हुए कि अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) यानी जनहित याचिका को पूरी तरह हटाने का सुझाव दिया है। सरकार का कहना है कि अब PIL की जरूरत नहीं रही है क्योंकि न्याय तक पहुंच आसान हो गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें PIL को लेकर पहले से ही बहुत सतर्क हैं और केवल खास मामलों में ही नोटिस जारी करती हैं।
यह चर्चा सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संवैधानिक बेंच के सामने सबरीमाला मामले की समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई के दौरान हुई। मोदी सरकार के सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से लिखित दलीलें पेश करते हुए कहा कि PIL अब अपवाद नहीं रह गया है, बल्कि नियम बन गया है। उन्होंने लिखित सबमिशन में कहा, "समय आ गया है कि PIL को न सिर्फ रीकैलिब्रेट किया जाए, बल्कि इसे पूरी तरह हटा दिया जाए। PIL की अवधारणा उस दौर के लिए थी जब गरीबी, अशिक्षा, विकलांगता और संस्थागत कानूनी सहायता की कमी के कारण बड़ी आबादी अदालतों तक नहीं पहुंच पाती थी।"
मेहता ने कहा कि अब ई-फाइलिंग जैसी तकनीकी प्रगति, नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) और डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी जैसी संस्थाओं के कारण न्याय तक पहुंच आसान हो गई है। उन्होंने बंधुआ मुक्ति मोर्चा मामले का जिक्र करते हुए कहा, "आजकल तो एक साधारण पत्र भी अदालत तक पहुंच सकता है।" सरकार का तर्क है कि 1985 में सालाना 25,000 PIL दाखिल होते थे, जो 2019 में बढ़कर 70,836 हो गए, लेकिन इनमें से सिर्फ बहुत कम प्रतिशत ही वास्तविक होते हैं। बाकी ज्यादातर PIL एजेंडा वाले और मोटिवेटेड होते हैं, जिससे अदालतों का समय बर्बाद होता है और सीधे प्रभावित पक्षों के मामलों पर असर पड़ता है।
केंद्र ने सुझाव दिया कि सामान्य locus standi (याचिका दायर करने का अधिकार) के सिद्धांत को बहाल किया जाए। यानी केवल वही व्यक्ति अदालत जा सके जिसके अधिकार सीधे प्रभावित हुए हों। दुर्लभ मामलों में लीगल एड, गार्जियनशिप या अन्य प्रक्रियात्मक उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "आजकल अदालतें PIL को लेकर बहुत सतर्क हैं। हमने पैरामीटर तय कर रखे हैं। हर रोज हम वास्तविक कारण की जांच करते हैं। कई फैक्टर्स को देखते हुए ही PIL को लिया जाता है।" CJI ने कहा कि 2006 से 2026 तक के पिछले दो दशकों में अदालतें और अधिक सावधान हो गई हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, "नोटिस केवल तभी जारी होता है जब मामले में कुछ सार (substance) हो।"
सबसे बड़ा सवाल ये है कि पीआईएल को खत्म करने को लेकर सरकार की सोच इतनी खतरनाक कैसे हो सकती है। क्या अडानी समूह, अंबानी समूह, चुनावी चंदा घोटाला, पीएम केयर्स फंड, मोदी की डिग्री आदि को लेकर जनहित याचिकाओं से सरकार परेशान हुई। जिसकी वजह से पीआईएल जैसे जनता से जुड़े हथियार को मोदी सरकार छीनना चाहती है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने सबरीमाला मामले में गैर-भक्तों द्वारा दायर याचिकाओं पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि भगवान अयप्पा के भक्त नहीं होने वाले लोग इस धार्मिक प्रथा को कैसे और क्यों चुनौती दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि मूल याचिकाकर्ता (Indian Young Lawyers Association) भक्त नहीं थे और ऐसी याचिकाएं शुरू में ही खारिज की जानी चाहिए थीं। जस्टिस नागरत्ना ने सिविल प्रक्रिया संहिता के ऑर्डर VII रूल 11 का हवाला देते हुए कहा कि जहां cause of action नहीं है, वहां याचिका खारिज की जा सकती है।
चीफ जस्टिस ने 2018 के सबरीमाला फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें गंभीर संवैधानिक मुद्दों पर locus standi की परवाह किए बिना न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति दी गई थी। बेंच व्यापक मुद्दों पर विचार कर रही है, जिसमें पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति (FGM) जैसे मामले भी शामिल हैं।
सरकार ने तर्क दिया कि PIL अब संस्थागत अतिरेक और न्यायिक संसाधनों के बंटवारे का कारण बन गया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें खुद PIL को सख्ती से परख रही हैं और सामान्य सिद्धांत पर सुनवाई की जरूरत नहीं है।
यह सुनवाई सबरीमाला मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं पर लगे प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं की समीक्षा से जुड़ी है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन का मुद्दा है।