मोदी सरकार ने अब नई डिपोर्टेशन पॉलिसी तैयार की है। 'अवैध' प्रवासियों को निकालने के लिए। इसमें अवैध बांग्लादेशी और म्यांमारी नागरिकों का ख़ास ज़िक्र है। नयी पॉलिसी के अनुसार यदि आपके पास सिर्फ़ आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पैन कार्ड हैं तो यह काफी नहीं है। यदि नागरिकता साबित करने वाले दूसरे दस्तावेज नहीं दे पाए तो देश से निकाला जा सकता है। कम से कम सरकार ने तो यही मंशा जताई है। ठीक उस तरह से जिस तरह से पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अवैध प्रवासियों को बीजेपी शासित राज्यों ने देश से बाहर निकालना शुरू किया था। तो सवाल है कि क्या सरकार ऐसा कर पाएगी? क्या बांग्लादेश और म्यांमार भारत से निकाले गए लोगों को स्वीकार करेंगे? असम एनआरसी में पहचान गिए गए 19 लाख लोगों को 7 साल में देश से बाहर निकाला क्यों नहीं गया? इन सवालों के जवाब से पहले यह जान लीजिए कि सरकार की आख़िर नयी डिपोर्टेशन पॉलिसी क्या है।

देश के हर जिले में डिटेंशन सेंटर?

दरअसल, केंद्र सरकार ने अवैध बांग्लादेशी और म्यांमार के नागरिकों को जल्दी से जल्दी भारत से वापस भेजने के लिए एक नई और सख्त नीति बना ली है। द हिंदू ने यह रिपोर्ट दी है। इस नीति के तहत हर राज्य के हर जिले में एक खास टास्क फोर्स बनाई जाएगी। यह इन अवैध प्रवासियों को ढूंढेगी, उनकी पहचान करेगी और उन्हें वापस भेजेगी। अवैध प्रवासियों को रखने के लिए सेंटर बनाया जाएगा। साथ ही, हर महीने विदेशियों के बारे में रिपोर्ट भेजनी होगी। कौन ग़ायब है या वीज़ा ख़त्म होने के बाद भी रुक गया है।
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यह नीति गृह मंत्रालय ने बनाई है। रिपोर्ट के अनुसार इस नीति में कहा गया है कि अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए हर राज्य में 'होल्डिंग सेंटर' या कैम्प बनाए जाएंगे। इन कैम्पों के चारों ओर 10 फीट ऊँची दीवार होगी, जिस पर कांटेदार तार लगी होगी। यह कैम्प से बाहर जाने से रोकने के लिए लगाया जाएगा। विजयता सिंह ने द हिंदू में लिखे अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हर जिले में इस कैंप को बनाया जाना है। अगर सरकारी जमीन न मिले तो निजी इमारतें किराए पर ली जा सकती हैं।

कैम्प में कैसी होगी व्यवस्था?

रिपोर्ट के अनुसार कैम्प में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग जगह होंगी। परिवार को अलग नहीं किया जाएगा। पूरे परिवार को एक ही जगह रखा जाएगा। कैम्प में रसोई में गैस कनेक्शन, आग से बचाव की व्यवस्था, 24 घंटे सुरक्षा, अच्छी रोशनी और पर्याप्त जगह होगी जहां कैम्प में रहने वाले घूम-फिर सकें। कैम्प में रहने वाले अपने परिवार से मिल सकते हैं और बात कर सकते हैं। उन्हें बेसिक मोबाइल फोन रखने की इजाजत होगी। कैम्प में लैंडलाइन फोन भी लगाया जाएगा। बच्चों के लिए क्रेच और पास के स्कूलों में पढ़ाई की व्यवस्था की जाएगी। महिलाओं, नर्सिंग मदर्स, ट्रांसजेंडर और बच्चों का खास ख्याल रखा जाएगा। मेडिकल सुविधा, एम्बुलेंस, भाषा अनुवादक और अच्छी खाने-पीने की व्यवस्था होगी। कैम्प जेल में नहीं चलाए जाएंगे।

पूछताछ में अगर कोई संदिग्ध व्यक्ति कहे कि वह किसी दूसरे राज्य का रहने वाला है तो उसकी पृष्ठभूमि की जांच सिर्फ 90 दिन में पूरी करनी होगी। जाँच के बाद उन्हें वापस भेज दिया जाएगा।

दस्तावेज रद्द करने का प्लान

अवैध प्रवासियों ने अगर आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पैन कार्ड बनवा लिया हो तो उन्हें पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा। ये दस्तावेज रद्द कर दिए जाएंगे और व्यक्ति को सरकार के रिकॉर्ड में ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।

पोर्टल और बॉर्डर पर तुरंत कार्रवाई

गृह मंत्रालय ने फोरेनर्स आइडेंटिफिकेशन पोर्टल यानी FIP नाम का नया पोर्टल शुरू किया है। इसमें अवैध प्रवासियों के फिंगरप्रिंट, फोटो और बाकी डिटेल्स भरे जाएंगे।
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अगर कोई बांग्लादेशी या म्यांमार का नागरिक भारत की जमीन या समुद्री बॉर्डर पर पकड़ा गया तो बॉर्डर फोर्स तुरंत उन्हें वापस भेज देगा। लेकिन पहले उनकी बायोमेट्रिक डिटेल्स ली जाएंगी। अगर कोई गलती से बॉर्डर पार कर गया हो तो पहले पूछताछ होगी। निर्दोष पाए जाने पर पड़ोसी देश की फोर्स को सौंप दिया जाएगा।

कब शुरू हुई यह मुहिम?

अगस्त 2024 में बांग्लादेश में सरकार बदलने के बाद गृह मंत्रालय ने पूरे देश की पुलिस को निर्देश दिए थे कि जाली दस्तावेजों पर रह रहे बांग्लादेशियों को पकड़ो। इसके बाद अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमला और मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह अभियान और तेज हो गया। कुछ मामलों में अवैध बांग्लादेशियों को भारतीय वायुसेना के प्लेन से ले जाकर जमीन बॉर्डर से वापस भेजा गया।

कार्रवाई के दौरान अलग-अलग समय पर पश्चिम बंगाल के सात लोगों को विदेशी बताकर ग़लती से बांग्लादेश भेज दिया गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के हस्तक्षेप के बाद उन्हें वापस लाया गया।

नीति कब जारी हुई?

बहरहाल, यह पूरी नीति फरवरी 2026 में राज्यों को भेजी गई। इसमें पुरानी गाइडलाइंस को दोहराया गया है और एक अलग अध्याय बांग्लादेशी-म्यांमार के अवैध नागरिकों के लिए बनाया गया है। असम में विदेशी ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किए गए लोगों पर भी यही नियम लागू होंगे।

गिरफ्तार विदेशियों की राष्ट्रीयता की जांच तुरंत शुरू करनी होगी, ताकि कोर्ट की कार्यवाही खत्म होते ही तुरंत वापस भेजा जा सके। वापस भेजने के बाद उन्हें भारत में दोबारा आने से रोकने के लिए ब्लैकलिस्ट करने का प्रस्ताव ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन को भेजा जाएगा। होल्डिंग सेंटर के स्टाफ को खास ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि कैम्प में रहने वालों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो।

यह नीति सिर्फ़ बांग्लादेश और म्यांमार के अवैध प्रवासियों के लिए नहीं है। दूसरे देशों के विदेशी जो डिपोर्ट होने का इंतजार कर रहे हैं, उनके लिए भी यही नियम लागू होंगे।
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असम NRC: 19 लाख लोगों का क्या हुआ?

असम में 2019 में एनआरसी की अंतिम सूची जारी हुई थी। इसमें 3.29 करोड़ लोगों में से करीब 19 लाख लोगों के नाम नहीं थे। बीजेपी ने कहा था कि असम से बांग्लादेशी घुसपैठिये को बाहर फेंक दिया जाएगा। लेकिन जब सूची आई तो इसमें बड़ी संख्या में हिंदू भी शामिल थे जिनके पास यह साबित करने के लिए दस्तावेज नहीं थे कि वे भारतीय हैं। 7 साल बाद भी 19 लाख में से ज्यादातर को बाहर नहीं निकाला जा सका है।

कारण बताया जा रहा है कि एनआरसी से बाहर हुए लोगों को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील करने का मौक़ा मिलता है। यह एक अदालत जैसी व्यवस्था है। ज्यादातर लोग अभी अपील में फंसे हैं। ट्रिब्यूनल में फैसला आने के बाद ही डिपोर्टेशन होता है। इस बीच असम सरकार ने 2024 में कहा कि गैर-मुस्लिमों के खिलाफ फॉरेनर केस वापस लिए जाएंगे। एक दिक्कत यह भी आ रही है कि डिपोर्टेशन के लिए बांग्लादेश की सहमति जरूरी है। बांग्लादेश अक्सर इन लोगों को अपना नागरिक मानने से इनकार करता है। इससे प्रक्रिया रुक जाती है। कई रिपोर्टों में कहा गया कि कुछ लोग गलती से बाहर हुए हैं, जैसे दस्तावेजों की कमी की वजह से। अपील प्रक्रिया लंबी है और लोग डिटेंशन सेंटर में रखे जाते हैं, जहां हालात खराब हैं। डिटेंशन सेंटर भी नहीं बने हैं। 2025 के आख़िर तक हजारों अपीलें पेंडिंग हैं।

तो सवाल है कि असम में पहले से ही पहचाने गए 19 लाख लोगों को निकाला नहीं जा सका है तो पूरे देश में पहचान करने की प्रक्रिया क्यों और ऐसे लोगों का क्या होगा? इसका पूरा समाधान कैसे होगा? कहीं इस पूरी कवायद का मक़सद राजनीतिक लाभ लेना तो नहीं है?