केंद्र सरकार ने लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण एक्टिविस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की एनएसए के तहत जारी हिरासत को वापस लेने का फैसला किया है। गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि लद्दाख में शांति, स्थिरता और पारस्परिक विश्वास का माहौल बनाने तथा सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ सार्थक संवाद को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता के तहत यह कदम उठाया गया है।
मंत्रालय ने कहा, “सरकार लद्दाख में शांति, स्थिरता और आपसी विश्वास का माहौल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि सभी हितधारकों के साथ रचनात्मक और सार्थक संवाद संभव हो सके। इस उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए और उचित विचार-विमर्श के बाद, सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत उपलब्ध शक्तियों का प्रयोग करते हुए सोनम वांगचुक की हिरासत को तत्काल प्रभाव से रद्द करने का निर्णय लिया है।”
सोनम वांगचुक को सितंबर 2025 में लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के बाद एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए थे। केंद्र ने उन पर नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में हुए विरोध प्रदर्शनों का हवाला देकर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया था। हिरासत के बाद उन्हें राजस्थान के जोधपुर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया था।
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उनकी हिरासत करीब पांच महीने तक चली। इस दौरान उनकी पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उनकी रिहाई की मांग की थी। केंद्र ने अदालत में दावा किया था कि वांगचुक की सेहत संबंधी शिकायतें “बनावटी और दिखावटी” हैं। जेल में उनके 24 बार मेडिकल जांच हुई, जिसमें उन्हें “फिट, स्वस्थ और मजबूत” बताया गया। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने स्वास्थ्य आधार पर रिहाई से इनकार किया था।
रिहाई की घोषणा के दो दिन पहले 12 मार्च 2026 को सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश दिया था कि वे सक्रियता से पीछे नहीं हटे हैं, लेकिन इसमें “स्पष्टता, एकता और सच्चे संवाद” की जरूरत है। उनकी पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो ने कहा कि रिहाई के बाद वे आंदोलन के रास्ते पर नहीं चलेंगे, बल्कि लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग को चर्चा और संवाद के माध्यम से आगे बढ़ाएंगे।
यह फैसला लद्दाख में हितधारकों के साथ सरकार की जारी बातचीत के बीच आया है, जहां क्षेत्रीय आकांक्षाओं और चिंताओं को दूर करने पर जोर दिया जा रहा है। सोनम वांगचुक को लद्दाख का “परिवर्तन का इंजीनियर” कहा जाता है, जो शिक्षा, पर्यावरण और क्षेत्रीय अधिकारों के लिए लगातार काम करते रहे हैं।
उनकी रिहाई से लद्दाख में संवाद की नई उम्मीद जगी है, और कार्यकर्ता अब आंदोलन को शांतिपूर्ण चर्चा की ओर मोड़ने की बात कर रहे हैं।

सोनम वांगचुक के काम जानिए

सोनम वांगचुक लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षाविद् और जलवायु कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी में जल संकट और पर्यावरण संरक्षण के लिए कई अभिनव पहल की हैं। उनकी सबसे प्रमुख पहल आइस स्टूपा (कृत्रिम हिमनद) है, जिसे उन्होंने 2013-2015 में विकसित किया। यह तकनीक सर्दियों में बेकार बहने वाले पानी को पाइपों के माध्यम से ऊंचाई पर ले जाकर ठंडी हवा में स्प्रे करती है, जिससे स्तूपाकार विशाल बर्फ के ढेर बनते हैं। ये आइस स्टूपा वसंत-ग्रीष्म में धीरे-धीरे पिघलकर लाखों लीटर पानी प्रदान करते हैं, जिससे खेती के लिए सिंचाई संभव हो पाती है। यह परंपरागत लद्दाखी हिमनद-ग्राफ्टिंग तकनीक का आधुनिक रूप है और अब लद्दाख में दर्जनों स्थानों पर लागू हो चुकी है, साथ ही चिली, पाकिस्तान, नेपाल आदि देशों में भी इसका अनुकरण किया गया है।
वांगचुक ने पैसिव सोलर हीटेड भवनों और सतत वास्तुकला पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। SECMOL (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) और Himalayan Institute of Alternatives Ladakh (HIAL) के माध्यम से उन्होंने मिट्टी-आधारित, कम लागत वाले भवन डिजाइन किए, जो सूर्य की ऊर्जा से सर्दियों में -15 डिग्री सेल्सियस के बाहर तापमान पर भी अंदर +15 डिग्री तक गर्म रहते हैं। ये भवन जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हैं और ठंडे रेगिस्तानी इलाकों के लिए जलवायु-अनुकूल आवास के मॉडल हैं। छात्र इन निर्माणों में सक्रिय भाग लेते हैं, जिससे शिक्षा और पर्यावरण जागरूकता एक साथ जुड़ती है।
इसके अलावा, वांगचुक ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जागरूकता के लिए कई विरोध प्रदर्शन और क्लाइमेट फास्ट (भूख हड़ताल) किए हैं, जैसे 2024 में 21 दिनों की उपवास और दिल्ली तक पैदल मार्च। वे हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने को रोकने, आदिवासी अधिकारों और छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा की मांग करते रहे हैं। उनका मानना है कि स्थानीय समुदाय-आधारित, कम-तकनीकी समाधान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से बचाव के लिए नीतिगत बदलाव जरूरी हैं। उनकी पहलें वैश्विक स्तर पर पर्वतीय जल सुरक्षा और स्वदेशी जलवायु अनुकूलन पर चर्चा को प्रेरित करती हैं।