सरकार कहती है कि कृषि और डेयरी क्षेत्र सुरक्षित हैं, फिर अमेरिका के विपरीत दावों पर चुप्पी क्यों? भारत-अमेरिका व्यापार, किसानों और नीति विरोधाभासों की पड़ताल।
पीयूष गोयल और डोनाल्ड ट्रंप
मोदी सरकार जब अमेरिकी डील में कृषि, डेयरी के संरक्षण का दावा कर रही है तो अमेरिकी अधिकारियों के दावों को झूठा क्यों नहीं बता रही है? केंद्र सरकार यह तो कह रही है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और व्हाइट हाउस के अधिकारी बार-बार कह रहे हैं कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों को ज्यादा खरीदेगा और बाजार खोलेगा, तो केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इन दावों को क्यों नहीं खारिज कर रहे हैं? क्यों सरकार अमेरिकी पक्ष के बयानों पर चुप्पी साधे हुए है?
ऐसे ही सवालों और लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के हंगामे के बीच पीयूष गोयल ने कहा कि एक साल की लंबी बातचीत के बाद यह डील हुई है। उन्होंने आश्वासन दिया, 'भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों, खासकर कृषि और डेयरी की सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित की है।' गोयल ने बताया कि अमेरिका ने भारतीय सामानों पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है, जो कई अन्य देशों से बेहतर है। उन्होंने कहा कि यह डील भारतीय निर्यातकों, एमएसएमई और श्रम-गहन क्षेत्रों के लिए फायदेमंद होगी।
गोयल ने एक दिन पहले भी मंगलवार को भरोसा दिलाया था कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि और डेयरी जैसे भारत के संवेदनशील सेक्टर्स के हितों की पूरी तरह से रक्षा की गई है, जो नई दिल्ली के प्रतिद्वंद्वियों को वॉशिंगटन से मिले डील से कहीं बेहतर है। मंगलवार शाम को मीडिया से बात करते हुए गोयल ने कहा कि यह डील दोनों देशों की बातचीत करने वाली टीमों के बीच डिटेलिंग के आखिरी स्टेज में है, और इसकी टेक्निकल डिटेल्स जल्द ही जारी होने वाले भारत-अमेरिका के जॉइंट स्टेटमेंट के ज़रिए उपलब्ध कराई जाएंगी।
तो फिर अमेरिकी जीत के दावे कैसे कर रहे?
लेकिन दूसरी तरफ अमेरिकी पक्ष के दावे अलग हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर घोषणा की कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद करेगा और अमेरिका से ऊर्जा, तकनीक, कृषि, कोयला आदि उत्पादों में 500 अरब डॉलर से ज्यादा खरीदेगा। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने इसे अमेरिकी कामगारों और किसानों के लिए बड़ी जीत बताया। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के विशाल बाजार में ज्यादा पहुंच मिलेगी और अमेरिकी किसानों की आय बढ़ेगी।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने कहा कि समझौते से भारत का औद्योगिक क्षेत्र काफ़ी खुलेगा, जहाँ शुल्क 13.5 प्रतिशत से घटाकर शून्य प्रतिशत हो जाएगा।
अमेरिकी कृषि सचिव ब्रूक रॉलिन्स ने कहा कि यह डील अमेरिकी फार्म प्रोडक्ट्स को भारत के बड़े बाजार में ज्यादा निर्यात करने देगी, जिससे अमेरिकी किसानों की कमाई बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि अमेरिका का भारत के साथ कृषि व्यापार घाटा 1.3 अरब डॉलर है और भारत की बढ़ती आबादी अमेरिकी उत्पादों के लिए बड़ा बाजार है।
चक शूमर या मिच मैककॉनेल जैसे अमेरिकी संसद के प्रमुख सदस्यों ने इशारों में खुशी जताई। अमेरिकी व्यापार संगठनों ने इसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद माना है।
अमेरिकी मीडिया का क्या रुख
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, 'मोदी के लिए कृषि से जुड़ी रियायतें अक्सर समस्या साबित हुई हैं और भारत का कृषि क्षेत्र काफ़ी हद तक संरक्षित है। किसी भी पक्ष ने यह नहीं कहा है कि क्या भारत इन बाधाओं को कम करेगा।' इसने लिखा है, 'भारत आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों पर भी सख्त प्रतिबंध बनाए रखता है जबकि अमेरिका में मक्का और सोयाबीन का अधिकांश उत्पादन ऐसी ही फसलों पर आधारित है। बातचीत के दौरान वॉशिंगटन ने आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के लिए अधिक पहुंच के साथ-साथ अपने डेयरी उत्पादों के प्रवेश पर भी ज़ोर दिया लेकिन भारत शायद ही इसे स्वीकार करे।'
कृषि क्षेत्र की चिन्ता
कृषि क्षेत्र में चिंता है कि मक्का, सोयाबीन और गेहूं जैसे अमेरिकी सब्सिडी वाले उत्पाद भारत में डंपिंग कर सकते हैं, जिससे भारतीय किसानों की आय घटेगी। सेफ फूड अलायंस के सदस्य अनंतू ने कहा, 'अगर ये उत्पाद भारत में आएंगे तो यह हमारे किसानों, स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा।' हालाँकि, भारत ने संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा है, लेकिन दबाव बरकरार है। विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने कहा कि भारी टैक्स जारी रहते तो भारत को 50 अरब डॉलर का निर्यात नुकसान और 35-50 लाख नौकरियां जातीं, लेकिन अब भी ऊर्जा निर्भरता में बदलाव से नुकसान होगा।
कृषि क्षेत्र में चिंता है कि अमेरिकी उत्पादों की डंपिंग से भारतीय किसानों की आय घट सकती है। सेफ फूड अलायंस जैसे संगठनों ने कहा कि इससे किसान, स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान होगा। हालाँकि सरकार कह रही है कि संवेदनशील क्षेत्र सुरक्षित हैं, लेकिन अमेरिकी बयानों को झूठा बताने या स्पष्ट खंडन न करने से सवाल बढ़ रहे हैं।
विपक्ष का मोदी सरकार पर हमला
कांग्रेस ने इस पर मोदी सरकार पर हमला बोला। राहुल गांधी ने कहा कि पीएम मोदी देश को बेच रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि ट्रंप के दावों से लगता है कि भारत को अमेरिकी कृषि उत्पाद जैसे मक्का, सोयाबीन और गेहूं पर बाजार खोलना पड़ेगा, जो सब्सिडी वाले हैं और भारतीय किसानों पर दबाव डाल सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यह डील मुख्य रूप से अमेरिका की जीत है। भारत को टैरिफ़ में राहत मिली है, लेकिन रूसी तेल बंद करने से ऊर्जा महंगी हो सकती है, जिससे महंगाई बढ़ेगी। अमेरिकी उत्पादों पर भारत को शुल्क शून्य करना पड़ सकता है, जबकि अमेरिका 18 प्रतिशत रखेगा, जिससे भारतीय निर्यातकों को नुक़सान हो सकता है।
बहरहाल, अभी डील की पूरी डिटेल्स सामने नहीं आई हैं। दोनों देश जल्द संयुक्त बयान जारी कर सकते हैं। यह डील भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव कम करने की कोशिश है, लेकिन कृषि और डेयरी पर असर को लेकर बहस जारी है। विपक्ष सरकार से मांग कर रहा है कि अमेरिकी दावों पर स्पष्ट जवाब दे और डील की पूरी जानकारी संसद में रखे।