NALSAR हैदराबाद विवाद ने अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के भीतर और कानूनी बिरादरी में भी राजनीतिक और संस्थागत बहस को तेज कर दिया है। गुरुवार 20 अगस्त को दिल्ली में BCI मुख्यालय के बाहर वकीलों ने प्रदर्शन कर BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन का आयोजन All India Young Advocates Association ने किया था, जबकि Cockroach Janta Party (CJP) ने इसे समर्थन दिया।
प्रदर्शन के दौरान वकील BCI कार्यालय के बाहर जुटे और मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ नारे लगाए। मौके पर पुलिस की भारी तैनाती की गई थी। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं और वे BCI अध्यक्ष की जवाबदेही तय करने तथा उनके इस्तीफे की मांग कर रहे थे।

CJP ने क्यों जोड़ा आंदोलन से नाता?

Cockroach Janta Party यानी CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने प्रदर्शन का समर्थन करते हुए इसे जवाबदेही और पद की जिम्मेदारी तय करने की लड़ाई बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर खुद को और प्रदर्शनकारियों को व्यंग्यात्मक तौर पर “Legal Cockroaches” कहा। यह संदर्भ CJI सूर्यकांत की उस कथित टिप्पणी से जुड़ा है जिसमें उन्होंने बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में “cockroaches” शब्द का इस्तेमाल किया था। इस टिप्पणी के बाद छात्रों के बीच CJP नाम से एक व्यापक विरोध अभियान सामने आया था। दास ने यह भी कहा कि Bombay Bar Association ने भी मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग की है।
Bombay Bar Association ने 20 अगस्त को जारी अपने बयान में 13 अगस्त की BCI कार्रवाई को सत्ता के कथित दुरुपयोग के रूप में आलोचना की और कहा कि बड़ी संख्या में छात्रों को बिना सुनवाई के प्रभावित किया गया। एसोसिएशन ने इस मामले में BCI अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग की।
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इस बीच, All India Lawyers' Association for Justice (AILAJ) ने भी मनन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा है कि पूरे NALSAR 2026 बैच के खिलाफ BCI की शुरुआती कार्रवाई ने BCI की वैधानिक शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर संवैधानिक और संस्थागत सवाल पैदा किए।

दिल्ली के वकीलों ने उठाए कई बड़े सवाल

दिल्ली में प्रदर्शनकारी अधिवक्ता रमन शर्मा ने कहा कि यह आंदोलन मूल रूप से कानूनी बिरादरी का आंदोलन है। उन्होंने कहा कि CJP ने प्रदर्शन को समर्थन दिया है, लेकिन मुद्दा वकीलों का अपने ही शीर्ष नियामक संस्थान के कामकाज को लेकर है। उनके मुताबिक, वकील BCI के कामकाज में कमियों को सामने लाने और अपनी मांगों को रखने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।
शर्मा ने मनन मिश्रा के लंबे कार्यकाल पर भी सवाल उठाया और कहा कि वह करीब 14 वर्षों से इस पद पर हैं तथा कानूनी बिरादरी के कल्याण के लिए उनके कार्यों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने BCI अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग को अपना प्रमुख मुद्दा बताया।
एक अन्य प्रदर्शनकारी अधिवक्ता उमेश कुमार ने वकीलों के कल्याण से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए कहा कि BCI को वकीलों की सुरक्षा, स्टाइपेंड, चैंबर, पेशेवर कल्याण और कानून की पढ़ाई की गुणवत्ता जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने फर्जी कानून कॉलेजों और डिग्रियों पर भी कड़ी निगरानी की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने Advocates Act, वकीलों के स्टाइपेंड, चैंबर, पेशेवरों की सुरक्षा और कल्याण तथा कानून कॉलेजों की निगरानी जैसे मुद्दों को भी अपनी मांगों में शामिल किया। प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने दावा किया कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी कानून के पेशे में हो सकते हैं जिनकी योग्यता या संस्थान को लेकर सवाल हैं। हालांकि यह दावा प्रदर्शनकारियों का है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती है।

क्या है पूरा NALSAR विवाद?

विवाद की शुरुआत 13 अगस्त को हुई, जब BCI ने सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के किसी भी स्नातक को अगली सूचना तक अधिवक्ता के रूप में नामांकित न करें। यह कार्रवाई उन छात्रों के एक अभियान के बाद की गई थी, जिन्होंने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की प्रस्तावित मौजूदगी पर आपत्ति जताई थी।
BCI ने NALSAR से इस अभियान से जुड़े लोगों के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भी मांगी थी। उससे यह जानकारी देने को कहा गया था कि अभियान शुरू करने, उसका मसौदा तैयार करने, उसे प्रसारित करने, समन्वय करने या छात्रों को संगठित करने में किन लोगों की भूमिका थी। BCI ने मामले पर 19 अगस्त को विचार करने की बात कही थी।
हालांकि इस आदेश के खिलाफ व्यापक प्रतिक्रिया हुई। आलोचना के बाद BCI ने कुछ ही घंटों में अपना रुख बदला और कहा कि 2026 बैच के अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों की कथित गतिविधियों के लिए पूरे बैच को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। अंततः नामांकन पर रोक वाला निर्देश वापस ले लिया गया और छात्रों को अपनी पसंद के राज्य बार काउंसिल में नामांकन कराने की अनुमति दी गई।

CJI सूर्यकांत ने भी जताई थी आपत्ति

इस मामले में CJI सूर्यकांत ने BCI की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि NALSAR में छात्रों और उनके बीच यह मूल रूप से संवाद का मामला था। सुप्रीम कोर्ट ने भी छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर जोर दिया और BCI की कार्रवाई के आधार पर NALSAR के छात्रों या शिक्षकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई थी।
NALSAR के Student Bar Council ने भी BCI की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट और CJI भी वैध आलोचना और असहमति से परे नहीं हैं। छात्रों ने मनन कुमार मिश्रा से सार्वजनिक माफी की मांग की थी।

मनन मिश्रा ने मांगी थी माफी

विवाद बढ़ने के बाद BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने स्वतंत्रता दिवस पर कानून छात्रों से माफी मांगी थी। उन्होंने कहा था कि उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाएं आहत हुई हों तो उन्हें इसका खेद है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों को यह तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे दीक्षांत समारोह में शामिल होना चाहते हैं या नहीं। साथ ही उन्होंने विवाद को बाहरी राजनीतिक प्रभाव से रंग देने से बचने की अपील की थी। लेकिन माफी और आदेश वापस लिए जाने के बावजूद उनके इस्तीफे की मांग खत्म नहीं हुई। CJP ने भी मनन मिश्रा के इस्तीफे की मांग जारी रखी और BCI कार्यालय तथा उनके आवास के बाहर प्रदर्शन का आह्वान किया।
NALSAR विवाद ने BCI की शक्तियों और उसके कामकाज पर व्यापक सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों का सवाल है कि क्या किसी छात्र समूह की असहमति या विरोध के जवाब में पूरे graduating batch के पेशेवर नामांकन को रोकना उचित था। BCI ने बाद में अपना आदेश वापस ले लिया, लेकिन इस कार्रवाई से पैदा हुआ संस्थागत विवाद अब भी जारी है।
इस तरह NALSAR के छात्रों से शुरू हुआ विवाद अब छात्रों के असहमति के अधिकार, BCI की वैधानिक शक्तियों, वकीलों के कल्याण, संस्थागत जवाबदेही और BCI अध्यक्ष के कार्यकाल जैसे बड़े सवालों में बदल गया है। फिलहाल मनन कुमार मिश्रा ने माफी मांग दी है और NALSAR छात्रों के नामांकन पर रोक वाला आदेश वापस लिया जा चुका है, लेकिन वकीलों और विभिन्न संगठनों की ओर से उनके इस्तीफे की मांग जारी है।