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लोकसभा जीतने के लिए राज्यों में हारी बीजेपी: शरद पवार

क्या कांग्रेस को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के बारे में गुमराह करने के लिए बीजेपी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता कांग्रेस को सौंप दी थी? एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने यह सवाल उठाकर राजनीति में नयी बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि देश में फिर से सत्ता हासिल करने के लिए यह बीजेपी का दाँव हो सकता है कि उसने इन तीन राज्यों में सत्ता से दूर रहने का खेल खेला। केंद्र की सत्ता में आने के बाद इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को अस्थिर करने का काम भी बीजेपी ने शुरू कर दिया है।
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पवार ने यह भी कहा कि ईवीएम के आंकड़ों को लेकर उन्हें हमेशा से ही शंका रही है लेकिन अब यह शंका देश भर में बड़े पैमाने पर लोगों के मन में घर कर गयी है। उन्होंने कहा कि चुनावों को लेकर इतना संशय कभी नहीं रहा था जैसा अब देखने को मिलता है। लोगों को यह चिंता रहने लगी है कि उन्होंने जो वोट डाला है वह उसी पार्टी या उम्मीदवार को मिला है या नहीं जिसको उन्होंने दिया था।उल्लेखनीय है कि पवार ने चुनाव परिणाम आने से पहले भी बयान दिया था कि उनके सामने एक ईवीएम का ट्रायल दिखाया गया था जिसमें कोई भी बटन दबाया जाए तो वोट बीजेपी को जाता था। 
शरद पवार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब लोकसभा चुनावों में ईवीएम के आंकड़ों को लेकर चुनाव आयोग सवालों के घेरे में खड़ा है। दरअसल, कई लोकसभा सीटों में ईवीएम में डाले गए वोट और गिने गए वोटों की संख्या को लेकर अंतर आया है।
न्यूज़ वेबसाइट ‘द क्विंट’ ने ख़बर प्रकाशित की है कि लोकसभा चुनाव के प्रथम चार चरणों में देश भर में जिन 373 लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ उनमें डाले गए वोट और ईवीएम से ग़िने गए वोटों की संख्या में अंतर है। इसी क्रम में एक और न्यूज़ वेबसाइट ‘न्यूज़ क्लिक’ ने ख़बर की है कि उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 लोकसभा सीटों में 119 सीटों पर डाले गए वोटों की संख्या और ईवीएम की ग़िनती में निकले वोटों की संख्या में अंतर है। दोनों ही ख़बरों में आधार चुनाव आयोग की वेबसाइट के आंकड़ों, आयोग की ओर से लाँच किए गए वोटर टर्नआउट ऐप के आंकड़ों को बनाया गया।

इन ख़बरों ने निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बार ईवीएम और वीवीपैट के मिलान को लेकर जितनी बार राजनीतिक दलों व सामाजिक संगठनों ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, इतनी बार पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। 

ईवीएम पर उठ रहे संदेहों को दूर करने के लिए आयोग ने 9000 करोड़ रुपये खर्च कर वीवीपैट मशीनों को ईवीएम से जोड़ा लेकिन जब उसकी पर्चियाँ ग़िनने की बात आयी तो उसने समय का हवाला देकर अड़ियल रुख अपना लिया और विपक्षी दलों की माँग को नकार दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में विपक्षी दलों को कोई राहत नहीं दी। हमारी न्यायपालिका का आधार वाक्य है "सौ गुनहगार बच जाएँ लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए" की बात शायद सुप्रीम कोर्ट को वीपीपैट को लेकर आदेश देते समय याद नहीं आयी?
यह सवाल देश में सरकार चुनने की प्रक्रिया की पारदर्शिता का था और देश की अनेकों पार्टियाँ जब इस पर सवाल उठा रहीं हैं तो उनकी शंका का समाधान क्यों नहीं होना चाहिए था? जो सरकार आने वाले पाँच साल देश को चलाने वाली है, वह सही प्रक्रिया से चुनी गयी है या नहीं यह जानने में यदि पाँच दिन का समय लगना था तो यह समय क्यों नहीं दिया गया?
चुनाव आयोग हमारे देश में डेढ़ से दो महीने लंबी चुनाव प्रक्रिया चलाता है और इतने लंबे अरसे तक देश में आचार संहिता लागू रहने के कारण सारे सरकारी कामकाज ठप पड़े रहते हैं। यदि पाँच दिन की मतगणना का समय इतना अहमियत भरा है तो चुनाव प्रक्रिया की डेढ़ से दो महीने की अवधि में कटौती कर क्या देश भर में तीन या चार चरण में मतदान नहीं कराये जा सकते हैं?
अब जब इतने बड़े पैमाने यानी अधिकांश लोकसभा सीटों पर डाले गए वोट और ग़िने गए वोटों की संख्या में अंतर सामने आया है तो क्या सुप्रीम कोर्ट इसको लेकर देश के लोगों के मन में पैदा हो रही शंका के निवारण के लिए कोई पहल करेगा?
चुनावी आंकड़ों को लेकर जो शंकाएं उत्पन्न हो रही हैं वे लोकतंत्र को अराजकता की तरफ़ भी ले जा सकती हैं। वैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने कहा है कि इस मामले में राजनीतिक दलों को अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। कुरैशी के अलावा अन्य दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एचएस ब्रम्हा और एन. गोपालस्वामी ने भी  कहा है कि चुनाव आयोग को इस मामले में जवाब देना चाहिए। लेकिन जिस चुनाव आयोग को इन शंकाओं का निवारण करना चाहिये उसका रुख मामले को सुलझाने से ज़्यादा उलझाने वाला ही लग रहा है।
चुनाव आयोग ने वोटों की संख्या को लेकर इन गड़बड़ियों को लेकर कहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मनुष्यों ने वोट डाले थे न कि भूतों ने।
आयोग ने कहा है कि उसकी वेबसाइट पर डाले गए मतदान प्रतिशत के आंकड़े प्रोविजनल थे और इन्हें बदला जाना था। आयोग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि उसकी वेबसाइट पर मतदान का जो प्रोविजनल डेटा दिया गया है वह फ़ाइनल डेटा नहीं है।आयोग की ओर से इस बात का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा रहा है कि ईवीएम से आख़िर ज़्यादा वोट कैसे निकल सकते हैं। 

मोदी-शाह को हर मामले में दी क्लीन चिट

चुनाव आयोग चुनाव प्रचार के समय से ही आरोपों के घेरे में है। प्रचार अभियान के दौरान जब वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के ख़िलाफ़ की गई शिकायतों पर कार्रवाई नहीं कर रहा था तब विपक्षी दलों को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी  चुनाव आयोग ने क्या कार्रवाई की यह सभी के सामने है। आयोग ने मोदी-शाह को हर मामले में क्लीन चिट दे दी थी।
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अब सवाल यह है कि आख़िर इतनी बड़ी गलतियों के उजागर होने पर भी राजनीतिक दल खामोश क्यों हैं? इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि ये दल इतनी बड़ी हार के दबाव से ही नहीं निकल पा रहे हैं। कांग्रेस अपने अध्यक्ष पद को लेकर उलझी हुई है? लेकिन शरद पवार ने जिस तरह से अपनी चिंता जतायी है उसकी प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में ज़रूर सुनाई देगी।

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संजय राय
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