पूरे देश ने योग किया। विश्व ने किया। सरकार ने किया। अखबार ने किया। टीवी ने किया। बीवी ने किया। ट्रंप ने नहीं किया। बीबी ने भी नहीं किया। कुछ लोगों ने योग किया। अच्छा किया। करना चाहिए। कुछ ने प्रयोग किया अच्छा किया करना चाहिए। पर कुछने दुरुपयोग किया। बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
एक बात सभी मानते हैं। योग को वैश्विक मंच तक पहुँचाने में नरेंद्र मोदी का योगदान ऐतिहासिक है। 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रस्ताव के बाद 177 देशों के समर्थन से 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित हुआ। यह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे व्यापक समर्थन पाने वाले प्रस्तावों में से एक था। 2015 से लेकर आज तक योग दिवस ने भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को नई ऊँचाई दी है। इसके लिए मोदी प्रशंसा के पात्र हैं।
लेकिन जो नहीं जानते हैं, उनको बताना पड़ता है। वो ये कि इतिहास केवल उपलब्धियों का बहीखाता नहीं होता। इतिहास स्मृति भी होता है। और स्मृति कभी-कभी ऐसे प्रश्न पूछती है जो प्रचार विभाग नहीं पूछता।
ऐसा ही एक प्रश्न योग दिवस पर मेरे मन में उठा।
क्या योग में भी मोदी, नेहरू को छू पाए हैं? यह प्रश्न राजनीति का नहीं, प्रतीक का है।
योग में शीर्षासन को राजा कहा जाता है। नेहरू की शीर्षासन करती तस्वीरें स्वतंत्र भारत की सबसे चर्चित सार्वजनिक तस्वीरों में हैं। 1948 में नई दिल्ली में ली गई उनकी तस्वीर आज भी देखी जाती है। तब न कोई पीआर एजेंसी थी, न कोई सोशल मीडिया टीम, न कोई ड्रोन कैमरा और न कोई इवेंट मैनेजमेंट कंपनी।
फिर भी वह तस्वीर इतिहास बन गई। क्यों? क्योंकि उसके पीछे प्रदर्शन नहीं, अभ्यास था। नेहरू ने लिखा था- "मेरे व्यायामों में एक मुझे विशेष रूप से प्रिय है- शीर्षासन। इसके मानसिक प्रभाव मुझे बहुत पसंद हैं। इसकी थोड़ी हास्यास्पद मुद्रा मुझे जीवन के उतार-चढ़ावों के प्रति अधिक सहनशील बनाती है।"
ज़रा इस वाक्य पर ठहरिए।
देश का प्रधानमंत्री शीर्षासन कर रहा है और उसकी सबसे बड़ी चिंता यह नहीं कि तस्वीर कैसी लगेगी, बल्कि यह कि उससे उसका हास्य-बोध और सहनशीलता बढ़ती है। आज के राजनीतिक वातावरण में यह बात लगभग अविश्वसनीय लगती है। नेहरू योग को केवल शारीरिक व्यायाम नहीं मानते थे। उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पतंजलि के योग को शरीर और मन के अनुशासन से आध्यात्मिक विकास तक पहुँचने की विधि बताया। उनके लिए योग शक्ति-प्रदर्शन नहीं, आत्मानुशासन था।
नेहरू का योग से परिचय कोई राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत साधना का विषय था। वे 1929 में स्वामी केवलानंद से मिले और 1931 से नियमित योगाभ्यास करने लगे। जेल जीवन के दौरान भी उन्होंने योग नहीं छोड़ा। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने योग को केवल निजी अभ्यास तक सीमित नहीं रखा। 1952 में उन्होंने राज्यसभा में योग को स्वास्थ्य शिक्षा का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके बाद 1953 में 'सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड फॉर फिजिकल एजुकेशन एंड रिक्रिएशन' ने अपनी राष्ट्रीय योजना में योग को स्वास्थ्य शिक्षा के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में शामिल किया।
यानी योग का इतिहास 2014 से शुरू नहीं हुआ।
मोदी ने योग का वैश्वीकरण किया, लेकिन उससे बहुत पहले योग भारत सरकार की नीतियों, विद्यालयों, दूरदर्शन, योगाश्रमों और लाखों साधकों के जीवन का हिस्सा बन चुका था। उसकी संस्थागत और शैक्षणिक नींव नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में क्रमशः रखी और मजबूत की जा चुकी थी। योग को सरकारी और शैक्षणिक मान्यता मिलने की प्रक्रिया मोदी युग से छह दशक पहले ही शुरू हो चुकी थी।
इंदिरा गांधी स्वयं योगाभ्यास करती थीं, यद्यपि उन्होंने उसका सार्वजनिक प्रदर्शन कभी नहीं किया। उनके कार्यकाल में योग को संस्थागत रूप से आगे बढ़ाने में धीरेंद्र ब्रह्मचारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1978 से 1983 तक दिल्ली दूरदर्शन पर प्रसारित उनका 'योगाभ्यास' कार्यक्रम देश का पहला राष्ट्रीय योग कार्यक्रम था, जिसने लाखों भारतीयों को पहली बार टेलीविजन के माध्यम से योग से जोड़ा। 1981 में केंद्रीय विद्यालयों में योग को औपचारिक रूप से शामिल किया गया। राजीव गांधी के समय इस प्रक्रिया को और गति मिली। केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में योग नियमित शारीरिक शिक्षा का हिस्सा बन चुका था तथा सप्ताह में कई पीरियड विशेष रूप से योग शिक्षा के लिए निर्धारित थे।
मुझे यह इतिहास केवल पुस्तकों से नहीं मालूम। मैं इसका प्रत्यक्ष साक्षी रहा हूँ। 1986 में मैंने स्वयं धीरेंद्र ब्रह्मचारी से योग शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया था। कुल 60 सीटें थीं, जिनमें 30 महिलाओं के लिए आरक्षित थीं। साक्षात्कार स्वयं धीरेंद्र ब्रह्मचारी ले रहे थे। वे प्रत्येक अभ्यर्थी से केवल एक प्रश्न पूछते थे- “योग क्यों सीखना चाहते हो?”
अधिकांश उम्मीदवारों का उत्तर होता था- “योग सीख लेंगे तो शिक्षक की नौकरी मिल जाएगी।” जब मुझसे पूछा गया, तो मैंने कहा- “योग हमारी भारतीय सभ्यता की अमर विरासत है। ऋषि-मुनियों से चली आ रही इस परंपरा को मैंने अपने पिता राम सुरेश पांडेय जी से थोड़ा-बहुत सीखा है, लेकिन इसे व्यवस्थित रूप से सीखना चाहता हूँ ताकि स्वयं स्वस्थ रह सकूँ और इस विरासत को आगे भी बढ़ा सकूँ।” मेरे उत्तर पर ब्रह्मचारी जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने परिवार के बारे में कुछ प्रश्न पूछे और मेरा चयन हो गया।
इसके बाद कटरा (जम्मू) स्थित विश्वायतन योगाश्रम में तीन महीने का कठोर प्रशिक्षण हुआ। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो वे मेरे जीवन के स्वर्णिम दिनों में गिने जाते हैं। उस समय श्री अरुण कुमार डे हमारे योग गुरु थे। प्रशिक्षण के बाद मैंने अपने गृह जिला आरा (बिहार) में विवेकानंद योग संस्थान की स्थापना की, जिसे लगभग तीन वर्षों तक चलाया। बाद में 1989 में असम जाने पर स्थानीय समाचार पत्रों में 'योगं शरणं गच्छामि' शीर्षक से नियमित स्तंभ भी लिखता रहा।
गांधी का योग इससे भी अलग था। गांधी शीर्षासन नहीं करते थे। उनका योग कर्मयोग था। अनासक्ति योग था। उपवास, आत्मसंयम, सत्याग्रह, प्रार्थना, पैदल यात्राएँ और निरंतर आत्मपरीक्षण- यही उनकी योग साधना थी। 1935 में परमहंस योगानंद ने उन्हें क्रिया योग की दीक्षा दी थी। पर गांधी की सबसे बड़ी साधना सत्ता से दूरी और अहंकार पर नियंत्रण थी। योग की भारतीय परंपरा में यही सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है- पहले स्वयं को जीतिए, फिर संसार को सुधारने निकलिए।
यही कारण है कि पतंजलि का पहला सूत्र आसन नहीं है। पहला सूत्र चित्त है।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। भगवद्गीता ने इसे और स्पष्ट किया-
समत्वं योग उच्यते।
सफलता और असफलता, लाभ और हानि, मित्र और शत्रु- सभी में संतुलन। फिर कृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
योगस्थः कुरु कर्माणि।
अर्थात योग में स्थित होकर कर्म करो।
योग दिवस के अवसर पर हजारों मंचों पर यह श्लोक पढ़ा i/e। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारी राजनीति भी इसका पालन करती है? योग की कहानी किसी सरकार से शुरू नहीं होती। सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों से लेकर उपनिषदों तक, पतंजलि से लेकर गीता तक, नाथ योगियों से लेकर संत परंपरा तक, विवेकानंद से लेकर आधुनिक भारत तक- योग की धारा लगातार बहती रही है।
मुगल काल में भी योग समाप्त नहीं हुआ। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के दौर में योगियों के चित्र बनवाए गए। दारा शिकोह ने योग वशिष्ठ का फारसी अनुवाद कराया। अनेक सूफी परंपराओं में ध्यान, श्वास नियंत्रण और आत्मानुभूति की साधना योग से संवाद करती दिखाई देती है। ब्रिटिश शासन ने योग को पिछड़ेपन और अंधविश्वास से जोड़ने की कोशिश की। लेकिन स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में भारत की आध्यात्मिक परंपरा का परिचय देकर योग को पुनः वैश्विक विमर्श में स्थापित किया।
स्वतंत्र भारत में नेहरू ने योग को स्वास्थ्य और शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की। इंदिरा गांधी के समय धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने दूरदर्शन के माध्यम से योग को घर-घर पहुँचाया। राजीव गांधी के समय विद्यालयों में योग का विस्तार हुआ।
और फिर नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने इस परंपरा को संयुक्त राष्ट्र तक पहुँचाया। लेकिन यहीं एक रोचक प्रश्न खड़ा होता है। जो नेहरू नहीं कर पाए, वह मोदी ने कर दिखाया। और जो मोदी नहीं कर पाए, वह नेहरू कर गए। मोदी ने योग को विश्व मंच पर पहुँचाया। नेहरू ने योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। नेहरू योग में शीर्षासन करते थे। मोदी का शीर्षासन, विदेश नीति में अधिक दिखाई देता है - यह विपक्ष कहता है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि ट्रंप के सामने भारत की कूटनीति कई बार आवश्यकता से अधिक विनम्र दिखाई देती है। इज़राइल के साथ संबंधों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ ‘मेलोडी’ कूटनीति पर भी खूब चुटकुले बने। सोशल मीडिया के व्यंग्यकारों ने तो पूरा नया योगशास्त्र रच दिया है। कहा जाता है कि विदेश नीति में कभी त्रिकोणासन चलता है—ब्रिक्स, क्वाड और सामरिक स्वायत्तता के बीच संतुलन साधने का प्रयास। कभी ताड़ासन कर विश्वगुरु बनने की घोषणा होती है और अगले ही क्षण पादहस्तासन कर यथार्थ के सामने विश्वमित्र बनकर झुकना पड़ता है।
कभी भुजंगासन की मुद्रा में विरोधियों को डराने की कोशिश होती है, तो कभी मंडूकासन की मुद्रा में अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तान के साथ वज्रासन नहीं बन पाता, चीन के साथ संतुलन कठिन हो जाता है और अमेरिका के साथ अनुलोम-विलोम चलता रहता है। यह सब व्यंग्य है। लेकिन हर व्यंग्य के भीतर एक प्रश्न छिपा होता है। योग का अर्थ जोड़ना है। फिर राजनीति का अर्थ तोड़ना क्यों होता जा रहा है? योग आत्मसंयम सिखाता है। फिर सार्वजनिक जीवन में उत्तेजना और कटुता इतनी अधिक क्यों है? योग समत्व सिखाता है। फिर असहमति को देशद्रोह और समर्थन को राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र क्यों बनाया जा रहा है? योग अहंकार पर विजय सिखाता है। फिर व्यक्तिपूजा लोकतंत्र पर इतनी भारी क्यों पड़ रही है?
विपक्ष सरकार पर अनेक आरोप लगाता है—इलेक्टोरल बॉन्ड, संस्थाओं की स्वायत्तता, मीडिया की स्वतंत्रता, सामाजिक ध्रुवीकरण, विदेश नीति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर। सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है और अपनी उपलब्धियों का उल्लेख करती है।
यह राजनीतिक बहस चलती रहेगी। लेकिन योग एक अलग कसौटी देता है। वह पूछता है- क्या सत्ता अधिक विनम्र हुई? क्या समाज अधिक शांत हुआ? क्या नागरिक अधिक स्वतंत्र हुए? क्या ईज ऑफ लीविंग लाइफ बना? क्या संवाद बढ़ा? क्या सत्य का सम्मान बढ़ा? क्या आत्मालोचना की क्षमता विकसित हुई? यदि उत्तर ‘हाँ’ है तो योग सफल है।
यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो चाहे लाखों लोग एक साथ सूर्य नमस्कार कर लें, योग अभी अधूरा है। योग शरीर को लचीला बनाता है, लेकिन रीढ़ को झुकाना नहीं सिखाता। योग शक्ति देता है, शक्ति का प्रदर्शन नहीं। योग अनुशासन देता है, दमन नहीं। योग संवाद सिखाता है, शत्रुता नहीं।
योग आत्मविश्वास देता है, अहंकार नहीं। और योग का अंतिम उद्देश्य फोटो नहीं, परिवर्तन है। इसलिए योग दिवस पर केवल आसन न करें।
थोड़ा आत्ममंथन भी करें। योग का उपयोग करें, दुरुपयोग नहीं। योग को सरकारी कार्यक्रम न बनने दें। योग को राजनीतिक हथियार न बनने दें।
योग को भारत की उस महान परंपरा के रूप में याद रखें जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य को स्वयं से मिलाने का काम किया है। हमारी वैदिक परंपरा, उपनिषद, गीता, बुद्ध, नाथ योगी, सूफी संत, गांधी, नेहरू और आधुनिक भारत—सभी अंततः एक ही बात कहते हैं—
सत्य। शिवम। सुंदरम।
सत्य। संयम। संतुलन। और ईमानदारी। यही सच्चा योग है।
योगं शरणं गच्छामि।
(लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार, व्यंग्यकार और रणनीतिकार हैं।)