नेपाल अपडेट

दक्षिण-पश्चिम चीन के सिचुआन में 5.1 तीव्रता का भूकंप आया।
नेपाल में आई बाढ़ में 475 शव बरामद, 1,545 लोगों को बचाया गया
नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद 1,500 से अधिक लोग लापता हैं। लापता लोगों में 30 से अधिक देशों के लोग शामिल हैं, जिनमें पर्यटक, तीर्थयात्री और कामगार शामिल हैं। इन देशों में भारत भी शामिल है
नेपाल पर्यटन बोर्ड ने बताया कि 127 नेपाली निवासियों सहित 667 पर्यटक और यात्री अभी भी लापता हैं
नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब एक और बड़ी बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। नेपाल और चीन दोनों ने चेतावनी जारी की है कि बाढ़ के मलबे से बनी झीलों में पानी लगातार बढ़ रहा है और इनके टूटने पर निचले इलाकों में फिर अचानक बाढ़ आ सकती है। यह भी खबर आई है कि तिब्बत में एक बांध टूट गया है। नेपाल के अधिकारियों ने नदी किनारे मौजूद स्थानीय लोगों और बचावकर्मियों से सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा है।

अब क्यों मंडरा रहा है दूसरी बाढ़ का खतरा?

पहली बाढ़ के दौरान नदी में भारी मात्रा में चट्टान, बर्फ और मिट्टी जमा होने से कुछ जगहों पर पानी के प्राकृतिक अवरोध बन गए। इनके पीछे पानी जमा होकर बैरियर झील बना रहा है। नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी ने चेतावनी दी है कि भोटेकोशी नदी के पास बनी ऐसी झील में पानी बढ़ रहा है। यदि यह प्राकृतिक बांध टूटता है तो अचानक एक और बड़ी बाढ़ आ सकती है।
इसी वजह से अधिकारियों ने नदी के निचले किनारों पर रहने वाले लोगों, यात्रियों और बचाव कार्य में लगे कर्मचारियों को नदी से दूर सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी है। कुछ नेपाली बचावकर्मी चेतावनी मिलने के बाद नदी तल से ऊंचाई वाले इलाकों की ओर चले गए।

चीन ने भी जारी की गंभीर चेतावनी

तिब्बत की ओर भी स्थिति चिंताजनक है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार अगले कुछ दिनों में करीब 30 लाख घन मीटर पानी एक ऐसी झील में पहुंच सकता है, जो पहले से मलबे के कारण अवरुद्ध है। 30 लाख घन मीटर पानी लगभग 1,200 ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल के बराबर है। चीन के अधिकारियों के मुताबिक झील के टूटने का जोखिम बढ़ रहा है और पानी का चरम प्रवाह करीब 1 सितंबर के आसपास हो सकता है। आने वाले दिनों में बारिश इस खतरे को और बढ़ा सकती है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय के हाइड्रोलॉजी विभाग के शोधकर्ता झू जिंगफेंग ने कहा कि पानी की मात्रा लगातार बढ़ रही है और उसके साथ खतरा भी बढ़ रहा है।
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क्या जलवायु परिवर्तन है इसकी बड़ी वजह?

वैज्ञानिकों ने अभी घटना की पूरी श्रृंखला की जांच जारी रखी है, लेकिन हिमालय में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों की अस्थिरता को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है। ICIMOD और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों की शुरुआती जांच में आइस-रॉक एवलॉन्च को बाढ़ का संभावित ट्रिगर माना गया है। हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने, ग्लेशियल झीलों के विस्तार और बर्फ तथा चट्टानों के अस्थिर होने की घटनाएं बढ़ी हैं।
उपलब्ध वैज्ञानिक विश्लेषण के मुताबिक इस घटना में करीब 1.2 किलोमीटर की ऊंचाई से ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा नीचे गिरने की संभावना सामने आई है। उसके साथ बर्फ, चट्टान और तलछट नदी में पहुंची, जिससे पहले अवरोध बना और बाद में भारी मलबे के साथ पानी की विनाशकारी लहर नीचे आई। इससे यह सवाल भी गंभीर हो गया है कि हिमालय में तेजी से बदल रही जलवायु भविष्य में ऐसी आपदाओं को कितना बढ़ा सकती है।

अभी सबसे बड़ा खतरा क्या है?

इस समय चुनौती केवल मलबे में दबे लोगों को बचाना नहीं है। ऊपर बनी झीलों में लगातार बढ़ता पानी दूसरी आपदा को जन्म दे सकता है।
नेपाल और चीन दोनों ने नदी किनारे रहने वाले लोगों तथा बचावकर्मियों को सतर्क रहने को कहा है। यदि प्राकृतिक बांध टूटता है तो बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है। यही वजह है कि राहत और बचाव अभियान के साथ-साथ अब जलस्तर की निगरानी, संभावित झीलों की स्थिति और समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही

ताजा रिपोर्टों में नेपाल में मृतकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। शुक्रवार सुबह की रिपोर्टों में नेपाल पुलिस ने 389 मौतों की पुष्टि की थी, जबकि अन्य बाद की रिपोर्टों में यह आंकड़ा 469 तक पहुंच गया। दोनों देशों में कुल मिलाकर 1,500 से ज्यादा लोगों के लापता होने की रिपोर्ट है। आंकड़े अभी लगातार बदल रहे हैं क्योंकि बचाव दल मलबे और नदियों में तलाश कर रहे हैं। तिब्बत के चीन-नियंत्रित ग्यिरोंग काउंटी में चीन ने तीन मौतों की पुष्टि की है, जबकि सैकड़ों लोग अभी लापता बताए जा रहे हैं। चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार ग्यिरोंग में 558 लोग लापता बताए गए थे, जिनमें करीब 260 विदेशी नागरिक शामिल हैं।

540 से ज्यादा विदेशी नागरिक लापता

यह इलाका काठमांडू और ल्हासा के बीच महत्वपूर्ण मार्ग है और यहां बड़ी संख्या में पर्यटक, ट्रेकर्स और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु आते हैं। नेपाल और तिब्बत में लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है। उपलब्ध आंकड़ों में कम से कम 540 विदेशी नागरिकों के लापता होने की बात सामने आई है। भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देशों के नागरिकों के परिजन अपने लोगों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। नेपाल पुलिस के अनुसार लापता भारतीय नागरिकों की संख्या भी बड़ी है। भारत सरकार ने अपने नागरिकों को निकालने और राहत के लिए सहायता की पेशकश की है।

26 अगस्त को कैसे आई इतनी भयावह बाढ़ः 26 अगस्त की सुबह नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमनद के बड़े हिस्से के टूटने और बर्फ, चट्टानों तथा मलबे के नदी तंत्र में गिरने के बाद अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर आया। इसका सबसे ज्यादा असर नेपाल के रासुवा जिले में ल्हेंदे खोला और भोटेकोशी नदी क्षेत्र में हुआ।

वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन के मुताबिक यह सामान्य बारिश से आई बाढ़ नहीं थी। ऊंचाई वाले क्षेत्र में आइस-रॉक एवलॉन्च यानी बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से नदी का रास्ता कुछ समय के लिए अवरुद्ध हुआ और फिर पानी तथा मलबे ने बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर रास्ता बनाया। नेपाल के तकनीकी आकलन के मुताबिक सुबह करीब 9:05 बजे अधिकारियों को सूचना मिली कि तिब्बत की ओर से भारी बाढ़ की लहर भोटेकोशी में प्रवेश कर चुकी है। इसके बाद पानी भोटेकोशी से त्रिशूली और फिर नारायणी नदी की ओर बढ़ा।

30 मिनट में 9 मीटर बढ़ गया त्रिशूली का जलस्तर

अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र यानी ICIMOD के वैज्ञानिकों के मुताबिक बाढ़ की रफ्तार और तीव्रता असाधारण थी। त्रिशूली नदी के गल्छी क्षेत्र में जलस्तर करीब 30 मिनट में नौ मीटर तक बढ़ गया, जबकि मलेखु में भी इसी अवधि में लगभग सात मीटर की वृद्धि दर्ज की गई। कई जल निगरानी केंद्र बाढ़ में बह गए या क्षतिग्रस्त हो गए।

ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग पूरी तरह तबाह

चीन के तिब्बत क्षेत्र में स्थित ग्यिरोंग बॉर्डर पोर्ट को भारी नुकसान हुआ है। यह चीन और दक्षिण एशिया के बीच महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है और चीन के बेल्ट एंड रोड नेटवर्क का भी हिस्सा है। बाढ़ और मलबे की तेज धार ने बॉर्डर क्रॉसिंग की इमारतों, लॉजिस्टिक क्षेत्र और अन्य ढांचों को कुछ ही समय में तबाह कर दिया। चीन के बचाव दलों को भी प्रभावित क्षेत्र तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि मुख्य सड़क मलबे से बंद हो गई थी। चीन के प्रधानमंत्री ली च्यांग ने गुरुवार को ग्यिरोंग के आपदा प्रभावित इलाके का दौरा किया। इससे संकेत मिलता है कि बीजिंग इस आपदा को बेहद गंभीरता से ले रहा है।

नेपाल में गांव, सड़कें और पुल तबाह

बाढ़ ने नेपाल के रासुवा, नुवाकोट और धादिंग सहित कई इलाकों में भारी तबाही मचाई है। घर, सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं मलबे में दब गईं। प्रारंभिक सरकारी अनुमानों के अनुसार करीब 19 पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़कें क्षतिग्रस्त या बह गई हैं। कई इलाके अभी भी मुख्य सड़क नेटवर्क से कटे हुए हैं, जिससे राहत और बचाव अभियान बेहद मुश्किल हो गया है। चिटवन जैसे काफी नीचे स्थित जिलों में भी नदी के साथ बहकर शव पहुंच रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक केवल चिटवन जिले में ही नदी तंत्र से 100 से ज्यादा शव बरामद किए गए थे। अस्पतालों में जगह कम पड़ने के कारण शवों की पहचान और परिजनों को सौंपने के लिए अस्थायी व्यवस्था करनी पड़ी।

नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को क्यों मना किया?

कई देशों ने नेपाल में अपनी खोज और बचाव टीम भेजने की पेशकश की थी। इनमें भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश शामिल हैं। लेकिन नेपाल सरकार ने फिलहाल विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों को भेजने की अनुमति नहीं दी है। सरकार का कहना है कि नेपाल की अपनी सेना, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां बचाव अभियान संभालने में सक्षम हैं। इसके बजाय नेपाल ने विदेशी सहायता को वित्तीय मदद और राहत सामग्री के रूप में एक केंद्रीकृत व्यवस्था के जरिए लेने का फैसला किया है। नेपाल ने 2015 के भूकंप के अनुभव को भी इस फैसले का एक कारण बताया है। उस समय बड़ी संख्या में विदेशी राहत एवं बचाव दल पहुंचने से समन्वय संबंधी समस्याएं पैदा हुई थीं।
26 अगस्त की आपदा ने नेपाल-तिब्बत सीमा के हिमालयी इलाके को भारी तबाही में बदल दिया है। शुरुआती तौर पर जिस घटना को अचानक आई बाढ़ माना गया था, उसकी तस्वीर अब ग्लेशियर टूटने, बर्फ-चट्टान के मलबे से नदी अवरुद्ध होने और फिर विनाशकारी फ्लैश फ्लड आने की जटिल प्रक्रिया के रूप में सामने आ रही है।
लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि पहली आपदा के बाद भी खतरा खत्म नहीं हुआ है। नदी में बने मलबे के बांधों के पीछे जमा पानी अगर अचानक बाहर निकलता है तो नेपाल और तिब्बत में दूसरी विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। इसलिए इस समय हर बचाव अभियान को भी अपनी सुरक्षा के साथ आगे बढ़ाना पड़ रहा है।