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370: ‘केंद्र के फ़ैसले से कश्मीर का एक भी शख़्स ख़ुश नहीं’ 

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाये जाने के केंद्र सरकार के फ़ैसले को लोगों का समर्थन नहीं मिल रहा है, ऐसा एक रिपोर्ट में दावा किया गया है। घाटी में लंबे समय तक मोबाइल फ़ोन बंद रहे, लोग बच्चों को स्कूल नहीं भेज सके, बीमार लोगों को दवाइयां नहीं मिलीं और कश्मीर के लोगों ने इसके ख़िलाफ़ अपने ग़ुस्से का इज़हार सत्याग्रह करके किया है। 

अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट ‘स्क्रॉल.इन’ की एक ख़बर के मुताबिक़, एडवोकेट नित्या रामाकृष्णन और सोशलॉजिस्ट नंदिनी सुंदर ने 5 से 9 अक्टूबर तक कश्मीर का दौरा किया है और यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट की सबसे अहम बात यह है कि केंद्र सरकार के इस फ़ैसले से कश्मीर का एक भी व्यक्ति ख़ुश नहीं है। 

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रिपोर्ट कहती है कि कश्मीरी केंद्र के इस फ़ैसले का जवाब सत्याग्रह करके या अहिंसक ढंग से अपना विरोध जताते हुए कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, क्योंकि राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता जेल में हैं, इसलिए सत्याग्रह का नेतृत्व आम लोगों के द्वारा ही किया जा रहा है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि हालांकि इसके लिए थोड़ा सा सामाजिक दबाव भी है लेकिन यह किसी आतंकवादी के कहने पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से किया जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने हालांकि सोमवार से पोस्टपेड मोबाइल फ़ोन सेवाओं को चालू कर दिया है। लेकिन अभी भी प्रीपेड मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट सेवाओं को बंद रखा गया है। सरकार ने अख़बारों में विज्ञापन देकर लोगों से अपील की है कि वे आतंकवादियों से डरे बिना अपना जीवन शुरू करें। 

राज्य के प्रशासन का दावा है कि जम्मू-कश्मीर में सभी जगहों से प्रतिबंधों को हटा लिया गया है और हालात सामान्य हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह कश्मीर में ग्रेनेड हमले हुए हैं, उससे हालात को सामान्य कहना क़तई सही नहीं होगा।

नित्या रामाकृष्णन और नंदिनी सुंदर ने दावा किया है कि घाटी में पूरी तरह बंद है और ऐसा आतंकवादियों के कारण नहीं है। रिपोर्ट में ताज़ा हालात की 2016 में हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद बने हालातों से भी तुलना की गई है। रिपोर्ट में तब और अब में पहला अंतर यह बताया गया है कि इस बार लोगों का नेतृत्व कोई राजनीतिक दल का या अलगाववादी संगठन का नेता नहीं कर रहा है क्योंकि अधिकतर नेता जेल में बंद हैं और लोग ख़ुद ही इसका नेतृत्व कर रहे हैं, दूसरा यह कि इस बार पूरी घाटी में इसका विरोध है जबकि पहले यह दक्षिण कश्मीर में ही था। तीसरा अंतर यह बताया गया है कि पिछली बार जो लोग भारत सरकार के साथ थे, वे इस बार पूरी तरह अलग-थलग हैं। 

राष्ट्रीय मीडिया की आलोचना 

रामाकृष्णन और नित्या सुंदर ने कश्मीर को लेकर राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका की भी आलोचना की है और आरोप लगाया है कि मीडिया पर यह दिखाने के लिए भारी दबाव है कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य है और लोग ख़ुश हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय मीडिया एक कलंक की तरह है क्योंकि वह सरकार की ही बात को कह रहा है। दोनों ने यह भी कहा है कि पिछले दो महीनों में कश्मीर या अनुच्छेद 370 को लेकर एक भी संपादकीय नहीं लिखा गया है। 

रामाकृष्णन और नित्या सुंदर ने रिपोर्ट में लिखा है कि कश्मीर में हर कोई ऐसा महसूस कर रहा है कि उन्हें बिना फ़ोन और इंटरनेट के पाषाण युग में धकेल दिया गया है।

रिपोर्ट कहती है कि मोदी सरकार का यह फ़ैसला यहां फिलीस्तीन जैसी स्थितियां बना देगा और राज्य के लोगों और भारत की अर्थव्यवस्था को इसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी। रिपोर्ट के मुताबिक़, कश्मीर के लोगों को ऐसा कहते सुना गया है कि अगर सरकार अपनी कठपुतली फ़ारुक़ अब्दुल्ला को जेल में डाल सकती है तो फिर आम आदमी सरकार से क्या उम्मीद करे। 

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रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज पुरानी एफ़आईआर के आधार पर उन्हें पुलिस थानों में रखा गया है। कई लोगों को श्रीनगर से आगरा शिफ़्ट कर दिया गया है और ऐसे लोगों के परिवार डरे हुए हैं कि अगर वे विरोध करेंगे तो उन पर पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट के तहत मुक़दमे ठोक दिये जायेंगे। 

विश्वास जीतने की कोशिश!

दूसरी ओर, मोदी सरकार की कोशिश है कि वह कश्मीर के लोगों का विश्वास जीत सके। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हमें अपने कश्मीरी भाइयों को गले लगाना चाहिए और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कश्मीरी छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात की थी। इससे माना गया था कि केंद्र और राज्य सरकारें कश्मीर के लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही हैं क्योंकि पुलवामा हमले के बाद देश भर के कई इलाक़ों में कश्मीरियों पर हमले की ख़बरें सामने आई थीं और यह पूरे देश में एक बड़ा मुद्दा बना था। 

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बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने को देश की एकता, अखंडता के लिए ज़रूरी क़दम के रूप में पेश किया है लेकिन अब यह उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह राज्य में हालात किस तरह सामान्य करेगी क्योंकि विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म किये जाने, नेताओं को हिरासत में लेने, पाबंदिया लगाने से जो नाराज़गी राज्य के लोगों में है, उसे दूर करना उसके लिए इतना आसान नहीं होगा और नित्या रामाकृष्णन और नंदिनी सुंदर की रिपोर्ट कुछ इसी ओर इशारा करती है। 

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