उमर खालिद की जेल पर आधारित डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी यानी NLSIU में आज यानी 14 सितंबर को होनी थी। NLSIU के छात्र संगठन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए स्थगित कर दिया है। एबीवीपी ने विरोध में NLSIU वीसी को खत लिखा है।
NLSIU दीक्षांत समारोह में सीजेआई और बीसीआई प्रमुख को आमंत्रित करने के लिए विवादों में रहे इस विश्वविद्यालय में अब उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग स्थगित कर दी गई है। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी यानी एनएलएसआईयू में उमर खालिद की जेल और उनकी हिरासत पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘Prisoner No. 626710 is Present’ की स्क्रीनिंग 14 सितंबर को होनी थी। लेकिन एबवीपी के विरोध के बीच स्क्रीनिंग से कुछ समय पहले इसे स्थगित कर दिया गया। आयोजक छात्र समूह ने इसके पीछे ‘लॉजिस्टिकल और सुरक्षा संबंधी कारणों’ का हवाला दिया है। स्क्रीनिंग के प्रस्ताव का एबवीपी द्वारा विरोध किए जाने के बाद विश्वविद्यालय में राजनीतिक बहस तेज हो गई थी।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी ने NLSIU के कुलपति को पत्र लिखकर कार्यक्रम का विरोध किया था। एबीवीपी ने विश्वविद्यालय के अकादमिक स्थानों के इस्तेमाल को ‘राजनीतिक या वैचारिक प्रचार’ का माध्यम बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी और स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं देने की मांग की थी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार हालाँकि, स्क्रीनिंग स्थगित करने वाले लॉ एंड सोसायटी कमिटी यानी LawSoc ने साफ़ किया है कि कार्यक्रम किसी के दबाव में रद्द नहीं किया गया है। समिति ने कहा है कि डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग इसी ट्राइमेस्टर में कराई जाएगी और इसके लिए ज़रूरी सुरक्षा तथा दूसरी व्यवस्थाएँ की जा रही हैं।
एबीवीपी ने क्यों किया विरोध?
स्क्रीनिंग के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ एबीवीपी ने NLSIU के कुलपति को पत्र लिखा था। यह पत्र 13 सितंबर को भेजा गया था। एबीवीपी ने विश्वविद्यालय प्रशासन से डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं देने की मांग की। संगठन का कहना था कि विश्वविद्यालय के अकादमिक स्थानों का इस्तेमाल राजनीतिक या वैचारिक प्रचार के लिए नहीं किया जाना चाहिए। एबीवीपी ने अपने पत्र में कहा कि ऐसे कार्यक्रम विश्वविद्यालय के अकादमिक वातावरण को राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर ले जा सकते हैं। संगठन ने प्रशासन से विश्वविद्यालय के अकादमिक माहौल को बचाने के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की।
सुरक्षा और लॉजिस्टिक कारण बताए
स्क्रीनिंग का आयोजन करने वाली लॉ एंड सोसायटी कमिटी ने 14 सितंबर की देर शाम छात्रों को ईमेल भेजकर स्क्रीनिंग स्थगित किए जाने की जानकारी दी। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार ईमेल में कहा गया कि कार्यक्रम को व्यवस्थागत और सुरक्षा संबंधी कारणों से टाला गया है।
समिति ने यह भी साफ़ किया है कि वह कार्यक्रम से पीछे नहीं हट रही है। लॉ एंड सोसायटी कमिटी के मुताबिक़ स्क्रीनिंग को किसी के दबाव के कारण स्थगित नहीं किया गया है। इसका मक़सद यह तय करना है कि कार्यक्रम सुरक्षित और जिम्मेदारी से आयोजित किया जा सके। समिति ने कहा कि वह जरूरी व्यवस्थाएं करने पर काम कर रही है, ताकि कार्यक्रम के दौरान छात्र समुदाय की सुरक्षा और हितों से कोई समझौता न हो।
आयोजन कमिटी ने यह नहीं साफ़ किया है कि क्या एबवीपी के विरोध के कारण सुरक्षा संबंधी चिंता है। कमिटी के बयान से यह साफ़ है कि फ़िलहाल स्क्रीनिंग रद्द नहीं हुई है, बल्कि स्थगित की गई है। हालांकि, नई तारीख की घोषणा अभी नहीं की गई है।
क्या था डॉक्यूमेंट्री का विषय?
‘Prisoner No. 626710 is Present’ डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार ललित वाचानी की फिल्म है। यह उमर खालिद के जेल में रहने और उनके कारावास से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। लॉ एंड सोसायटी कमिटी की ओर से छात्रों को भेजे गए शुरुआती ईमेल के मुताबिक़, स्क्रीनिंग का आयोजन 13 सितंबर को मनाए जाने वाले 'राजनैतिक कैदी दिवस' के संदर्भ में किया जाना था। कार्यक्रम के बाद एक चर्चा भी प्रस्तावित थी।
आयोजकों ने इसे केवल किसी व्यक्ति की कहानी तक सीमित कार्यक्रम के तौर पर पेश नहीं किया था। इसके ज़रिए क़ानून, संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े बड़े सवालों पर चर्चा का उद्देश्य बताया गया था।
प्री-ट्रायल हिरासत, जमानत जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी थी
LawSoc के मुताबिक़ स्क्रीनिंग के बाद होने वाली चर्चा में प्री-ट्रायल डिटेंशन, जमानत, असहमति, राजनीतिक क़ैद और आपराधिक क़ानून तथा लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के बीच संबंध जैसे मुद्दों पर बात की जानी थी। आयोजकों के शुरुआती मेल में यह भी कहा गया था कि सितंबर में उमर खालिद की गिरफ्तारी और जेल में रहने के छह साल पूरे हो रहे हैं।
इस तरह कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य उमर खालिद के मामले के बहाने आपराधिक क़ानून, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की शक्तियों से जुड़े क़ानूनी सवालों पर चर्चा करना था।
उमर की किताब पर JNU ऑडिटोरियम बुकिंग रद्द
पिछले महीने ही जेएनयू ने अपने ही पूर्व छात्र उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़’ पर होने वाली चर्चा के लिए बुक किए गए SSS-1 ऑडिटोरियम की बुकिंग कार्यक्रम से एक दिन पहले रद्द कर दी थी। यह कार्यक्रम 10 अगस्त को आयोजित किया जाना था।
यह कार्यक्रम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी JNUSU की ओर से आयोजित किया जाना था। इसे ट्राइबल डे यानी आदिवासी दिवस के मौके पर सार्वजनिक चर्चा के रूप में आयोजित करने की योजना थी। विश्वविद्यालय की ओर से जारी नोटिस में कहा गया है कि ऑडिटोरियम के लिए जमा किए गए वेन्यू रिक्वेस्ट फॉर्म में प्रस्तावित कार्यक्रम से जुड़ी पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। इसी आधार पर बुकिंग रद्द करने का फैसला लिया गया। हालांकि, विश्वविद्यालय ने अपने फैसले को किताब, किताब के लेखक या किसी वक्ता के नाम से नहीं जोड़ा है।
एबीवीपी ने किया था विरोध
जेएनयू में कार्यक्रम को रद्द किए जाने से पहले एबीवीपी ने कार्यक्रम की इस बुकिंग के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था और आरोप लगाया था कि जेएनयू प्रशासन कैसे 'एंटी नेशनल' उमर खालिद की किताब पर कार्यक्रम के लिए बुकिंग की अनुमति दी गई। एबीवीपी ने इसके ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर भी बड़ा अभियान चलाया।
उमर खालिद बिना ट्रायल 6 साल से जेल में बंद
उमर खालिद को 13 सितंबर 2020 को दिल्ली पुलिस ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े 'बड़ी साजिश' मामले में गिरफ्तार किया था। उन पर यूएपीए समेत कई धाराओं में आरोप हैं। वे तब से तिहाड़ जेल में बंद हैं। 13 सितंबर 2026 को उनकी गिरफ्तारी के 6 साल पूरे हो गए। अभी तक मुकदमा शुरू नहीं हुआ है। वे फिलहाल तिहाड़ जेल में हैं। उनकी जमानत याचिकाएँ बार-बार खारिज की जा रही हैं। पुलिस और अभियोजन पक्ष का आरोप है कि वे दंगों की साजिश में प्रमुख भूमिका में थे। उमर खालिद और उनके समर्थक इन आरोपों से इनकार करते हैं और लंबे समय से बिना मुकदमे के हिरासत को अन्यायपूर्ण बताते हैं।
‘एंटी नेशनल’ का आरोप क्यों?
उमर खालिद जेएनयू के पूर्व छात्र और एक्टिविस्ट हैं। उन पर ‘एंटी नेशनल’ का लेबल पहली बार 2016 में लगा था। फरवरी 2016 में जेएनयू में अफजल गुरु की फांसी के विरोध में एक कार्यक्रम हुआ था। उसमें कथित तौर पर 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे लगाए गए। हालाँकि, इस दावे पर विवाद और इसकी सचाई पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। बीजेपी, कुछ न्यूज चैनलों और एबीवीपी ने उमर खालिद, कन्हैया कुमार आदि को 'एंटी नेशनल' और 'तुक्ड़े-तुक्ड़े गैंग' बताया। दिल्ली पुलिस ने राजद्रोह और साजिश के आरोप लगाए। लेकिन साबित कुछ भी नहीं हुआ। स्थिति यह है कि बाद में कुछ फॉरेंसिक रिपोर्ट में वायरल वीडियो मैनिपुलेटेड पाए गए। इस मामले में उमर खालिद को जमानत मिल गई। केस अभी भी लंबित है, लेकिन कोई सजा नहीं हुई।
NLSIU में राजनीतिक बहस का बड़ा सवाल
बहरहाल, NLSIU का यह मामला केवल एक डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं है। इसके साथ यह बड़ा सवाल भी जुड़ता है कि विश्वविद्यालयों में राजनीतिक और संवैधानिक मुद्दों पर किस तरह की बहस होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों में अलग-अलग राजनीतिक विचारों पर चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन जब किसी कार्यक्रम में किसी राजनीतिक रूप से विवादित व्यक्ति या मुद्दे को केंद्र में रखा जाता है तो यह सवाल भी उठता है कि वह अकादमिक चर्चा है या राजनीतिक प्रचार।उमर खालिद से जुड़ा यह कार्यक्रम तब हो रहा था जब विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति, राजनीतिक गतिविधियों और अकादमिक स्वतंत्रता की सीमाओं को लेकर बहस लगातार जारी है। NLSIU में स्क्रीनिंग के स्थगन ने इसी बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।