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कॉमन सिविल कोड की जरूरत ही नहींः लॉ कमीशन

भारत के लॉ कमीशन (विधि आयोग) का मानना है कि पारिवारिक या व्यक्तिगत मामलों के कानून में टकराव को सुलझाने के लिए कॉमन सिविल कोड (यूसीसी) की जरूरत नहीं है। हालांकि लॉ कमीशन का यह भी मानना है कि शादी, तलाक, गुजारा भत्ता कानूनों के अलावा महिला और पुरुष की शादी योग्य उम्र में बदलाव होना चाहिए।
दरअसल, केंद्र में मोदी सरकार आने के करीब दो साल बाद लॉ कमीशन को 2016 में कानून मंत्रालय ने कहा था कि वो कॉमन सिविल कोड मामले को देखे। इसके बाद इंडियन लॉ कमीशन ने अपनी पूरी रिपोर्ट देने की बजाय 2018 में एक परामर्श पत्र केंद्र सरकार को सौंपा था। उसी परामर्श पत्र में लॉ कमीशन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कॉमन सिविल कोड की न तो जरूरत है और न ही यह वांछित है।

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आयोग ने विभिन्न पर्सनल लॉ कानूनों में भेदभाव और असमानता से निपटने के लिए मौजूदा फैमिली लॉ में संशोधन का सुझाव दिया था। उसने कहा था कि तमाम कानून के बीच में मतभेदों को पूरी तरह से दूर करने के लिए जरूरी है कि फैमिली लॉ में बदलाव हो। इसने इन पर्सनल लॉ कानूनों की व्याख्या और आवेदन में अस्पष्टता को सीमित करने के लिए इनके कुछ पहलुओं के कोडिफिकेशन का भी सुझाव दिया है। यानी उन कानूनों को कोड रूप में पेश कर दिया जाए। 

ऐसे कानूनों की जरूरत है जो जेंडरों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करते हों और पूरी तरह तटस्थ हों। खासकर नाजायज बच्चों के प्रति कानून जरा भी भेदभाव वाले न हों।


-लॉ कमीशन, 2016 परामर्श पत्र में

आयोग ने घर में महिला की भूमिका और योगदान को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया है। लॉ कमीशन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिला को शादी के बाद अर्जित संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए, चाहे उसमें उसका वित्तीय योगदान हो या नहीं हो।
आयोग ने कुछ महत्वपूर्ण कानूनों जैसे एडल्ट्री (व्यभिचार) कानून, मुस्लिम बहुविवाह और पारसी तलाक के कुछ पहलुओं में अपनी सिफारिशें सुरक्षित रखी थीं। क्योंकि इनमें से कुछ कानून सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। लॉ कमीशन की खास सिफारिशों में कहा गया है कि धर्म की परवाह किए बिना फैमिली लॉ में कुछ संशोधन जरूरी हैं।

उसकी उल्लेखनीय सिफारिशों में शादी का रजिस्ट्रेशन आवश्यक करने पर जोर दिया गया था। उसने सुझाया है कि जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रेशन एक्ट में संशोधन कर इसे लागू किया जा सकता है।

विवाह की उम्र पर नजरिया

लॉ कमीशन ने कहा कि विवाह की उम्र एक समान करने की जरूरत है। मौजूदा कानून कहता है कि लड़की की विवाह की उम्र कम से कम 18 साल और युवकी की शादी की कम से कम उम्र 21 साल होना चाहिए। लॉ कमीशन इसे लड़कियों के प्रति भेदभाव के रूप में देखता है। आयोग ने कहा कि ऐसा कानून सिर्फ इस रुढ़िवादी बात को बढ़ा रहा है कि पति के मुकाबले पत्नी कम उम्र की होना चाहिए। यह सही नहीं है।

तलाक पर सुझावः आयोग का मानना है कि जिस विवाह को बचाया नहीं जा सकता और किसी तरह के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है तो तलाक को फौरन एक वैध आधार मिलना चाहिए और उसकी प्रक्रिया भी तेज हो। ताकि महिलाओं को संभावित क्रूरता और झूठे आरोपों से बचाया जा सके, जो इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें सहना पड़ता है।
तलाक के बाद संपत्ति को लेकर भी लॉ कमीशन ने अपना रुख साफ किया है। पति-पत्नी को विवाह के बाद अर्जित संपत्ति का समान रूप से अधिकार होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि रिलेशनशिप खत्म होने पर पूरी संपत्ति बांटी जाए। ऐसे मामलों को अदालत पर छोड़ा जाना चाहिए। अदालत तय करेगी कि किसको क्या मिलेगा।

दिव्यांगों की चिन्ता

लॉ कमीशन ने फैमिली और पर्सन लॉ को शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के अनुकूल बनाने की सिफारिश की है। कई बार कुष्ठ रोग तलाक का आधार बनते हैं। इसलिए कुष्ठ रोग हटा दिया जाए कि उस आधार पर कोई तलाक दे सकता है। कुछ और भी बीमारियों को तलाक के दायरे से हटाना होगा। देखने में आया है कि कुछ बीमारियों के शिकार लोगों की शादी ही नहीं हो पाती है। क्यों उन बीमारियों को तलाक के आधार के दायरे में रखा गया है। अगर आप अधिक समावेशी समाज की बात करते हैं तो ये कदम उठाने होंगे।
वैवाहिक अधिकारः इसी तरह वैवाहिक अधिकारों को लेकर अंग्रेजों के समय के कानूनों को खत्म करने की बात भी लॉ कमीशन ने कही थी। उसका कहना था कि पत्नियों द्वारा मेटिनेंस के दावों को नाकाम करने के लिए ऐसे कानूनों के प्रावधान का सहारा लिया जा रहा है, जिन्हें खत्म किया जाना चाहिए।

दूसरे विवाह पर सख्ती

लॉ कमीशन ने कहा था कि धर्म बदल कर जो लोग दूसरी शादी कर लेते हैं, ऐसी शादियों को अमान्य करार देने का प्रावधान होना चाहिए। लेकिन ऐसी शादियों से हुए बच्चों को नाजायज नहीं माना जाना चाहिए। दरअसल, नाजायज बच्चों को लेकर लॉ कमीशन ने बहुत उदार रवैया अपनाने को कहा है। उसने कहा कि यहां तक कि लिव इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को वैध बनाने के लिए कानून बनाया जाए और ऐसे बच्चों का संपत्ति में हिस्सा भी होना चाहिए। उन्हें बाकायदा उत्तराधिकारी माना जाना चाहिए।

गोद लेने का कानून

बच्चों को गोद लेने के कानून में बदलाव करके उसे और आसान बनाने का सुझाव भी लॉ कमीशन ने दिया था। उसने कहा था कि बच्चों की देखभाल और संरक्षण अधिनियम, 2015 में संशोधन की जरूरत है ताकि सभी जेंडर पहचान वाले व्यक्ति अधिनियम के तहत गोद ले सकें। दरअसल, उसका इशारा ऐसे लोगों को भी गोद लेने का अधिकार देने को कहा गया था, जिन्हें इस दायरे से बाहर रखा गया है। मसलन सिंगल माता-पिता आसानी से बच्चों को गोद ले सकें। इसमें बच्चे के माता-पिता का लिंग न देखा जाए। वर्तमान में, कानून एक वयस्क पुरुष या अकेली महिला को बच्चे को गोद लेने की अनुमति नहीं देता है।
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विशेष विवाह अधिनियिम खत्म हो

अंतर्जातीय/अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को विशेष सुरक्षा देने की जरूरत है। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में जो तीस दिन की नोटिस देने का प्रावधान ऐसे विवाह में किया गया है, उसे खत्म किया जाने की सिफारिश लॉ कमीशन ने की थी।
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क़मर वहीद नक़वी
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