इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द करते हुए नोएडा डीएम के हिरासत आदेश की कड़ी आलोचना की थी। बेंच ने चेताया कि मनमानी करने वाली नौकरशाही का लगातार 'तानाशाही' वाला रवैया यूपी को एक दमनकारी राज्य में बदल सकता है।
डीयू की लॉ स्टूडेंट और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने और 5 लाख रुपये मुआवजे के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं। हाई कोर्ट ने आकृति की हिरासत को असंवैधानिक बताते हुए कहा था कि आदेश बिना ठोस वजह और बिना दिमाग लगाए पारित किया गया। कोर्ट ने मुआवजे की रकम डीएम और जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया है। बेंच ने चेताया कि मनमानी करने वाली नौकरशाही का लगातार 'तानाशाही' वाला रवैया यूपी को एक दमनकारी राज्य में बदल सकता है। गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के इसी फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने 15 पन्नों के आदेश में नोएडा प्रशासन और पुलिस के काम करने के तौर-तरीकों पर बेहद गंभीर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि आकृति की हिरासत के लिए पेश की गई सामग्री पर्याप्त नहीं थी और हिरासत आदेश 'बिना दिमाग लगाए' पारित किया गया।
आकृति ने उठायी थी मज़दूरों की आवाज़
अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन से जुड़े मामलों में आकृति चौधरी को गिरफ्तार किया गया था। यह प्रदर्शन मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने और उनकी मांगों को लेकर था। पुलिस ने प्रदर्शन से जुड़े कई लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने आकृति चौधरी और एक्टिविस्ट-पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए लगा दिया था। 13 मई को दोनों के खिलाफ एनएसए के तहत हिरासत के आदेश जारी किए गए थे।
एनएसए एक बेहद कड़ा कानून है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को मुकदमे की सामान्य प्रक्रिया पूरी होने से पहले भी एहतियाती हिरासत में रखा जा सकता है।
हाई कोर्ट ने NSA हिरासत क्यों रद्द की?
इलाहाबाद हाई कोर्ट में आकृति की हिरासत को चुनौती दी गई थी। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने पाया कि आकृति की हिरासत के लिए जिस सामग्री पर भरोसा किया गया था, उसमें पर्याप्त ठोस आधार नहीं था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के अनुसार हिरासत आदेश और उसके आधार में ऐसी सामग्री नहीं थी जिससे यह साबित हो कि आकृति की गतिविधियां राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उस स्तर का खतरा पैदा कर रही थीं जिसके लिए NSA जैसे कठोर कानून की जरूरत हो।
कोर्ट ने कहा कि आकृति की लगातार हिरासत उनके संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन थी। अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अदालत ने माना कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने के लिए कानून में तय प्रक्रिया का सही तरीके से पालन होना जरूरी है।
हिरासत आदेश की प्रक्रिया पर सवाल
हाई कोर्ट ने हिरासत आदेश की प्रक्रिया पर भी कड़ी टिप्पणी की। पीठ के अनुसार, पुलिस की रिपोर्ट में मुख्य रूप से आरोप लगाए गए थे, लेकिन उन आरोपों के समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। ऐसे में जिलाधिकारी को उपलब्ध रिकॉर्ड की बारीकी से और पूरी तरह जांच करनी चाहिए थी।कोर्ट का कहना था कि NSA जैसे कठोर कानून के तहत हिरासत का आदेश केवल पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर औपचारिक रूप से जारी नहीं किया जा सकता है। जिलाधिकारी को यह स्वतंत्र रूप से देखना होता है कि वास्तव में ऐसी परिस्थितियां मौजूद हैं या नहीं जिनमें NSA लागू करना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आकृति एक छात्रा और एक्टिविस्ट थीं और उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से यह भी नहीं दिखता कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी। ऐसे में अदालत ने सवाल उठाया कि मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से आवाज उठाने के कारण उनके खिलाफ NSA जैसी कठोर कार्रवाई क्यों की गई।
डीएम के आचरण पर कोर्ट की बेहद कड़ी टिप्पणी
हाई कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम के आचरण पर विशेष रूप से गंभीर टिप्पणी की थी। पीठ ने डीएम के आदेश के बारे में कहा था कि उनका आचरण 'उपहास के योग्य' है। अदालत ने यह भी कहा कि परिस्थितियों से ऐसा लगता है कि जिलाधिकारी आकृति को 'एक मिसाल बनाने' और मजदूरों के समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर बोलने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने वाले दूसरे लोगों को डराने की कोशिश कर रही थीं।यह टिप्पणी हाई कोर्ट के फैसले का सबसे अहम हिस्सा थी, क्योंकि इसमें अदालत ने केवल हिरासत आदेश की कानूनी खामी नहीं बताई, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई के पीछे संभावित उद्देश्य पर भी सवाल उठाया।
5 लाख रुपये का मुआवजा वसूली
हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। लेकिन अदालत ने केवल सरकार को मुआवजा देने के लिए नहीं कहा। उसने यह भी निर्देश दिया कि इस रकम की वसूली उन अधिकारियों के वेतन से की जाए जो गैरकानूनी हिरासत के लिए जिम्मेदार थे। इसमें जिलाधिकारी मेधा रूपम से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों और एसएचओ तक से रकम वसूलने की बात कही गई थी। इस तरह के आदेश का महत्व इसलिए भी है क्योंकि सामान्य तौर पर गलत प्रशासनिक कार्रवाई के लिए मुआवजे का भुगतान सरकारी खजाने से होता है। इस मामले में हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करते हुए अधिकारियों के वेतन से रकम वसूलने का निर्देश दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को बहुत बड़ी शक्तियां इसलिए दी जाती हैं क्योंकि उनसे नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, सम्मान, गरिमा और कल्याण की रक्षा की उम्मीद की जाती है। लेकिन अधिकारियों को यह याद रखना चाहिए कि उनकी वफादारी संविधान के प्रति होती है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति। अदालत ने कहा कि अधिकारी जनता के सेवक हैं और लोकतंत्र में जनता ही वास्तविक मालिक है।'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर नौकरशाह और पुलिस अधिकारी अपनी संवैधानिक शपथ को भूलकर मनमाने तरीके से काम करेंगे तो जनता उन्हें दमनकारी व्यवस्था के अवशेष के तौर पर देखने लगेगी। अदालत ने कहा कि लगातार ऐसी गलतियां और मनमानी नागरिकों में असंतोष पैदा कर सकती हैं। पीठ ने बेहद कड़ी भाषा में चेतावनी दी कि अगर नौकरशाही का गलत आचरण जारी रहा तो उत्तर प्रदेश एक 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' यानी ऐसी दमनकारी व्यवस्था में बदल सकता है जहाँ राज्य की निगरानी और नियंत्रण नागरिक स्वतंत्रता पर हावी हो जाए।
अब डीएम मेधा रूपम द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बाद मामले की अगली कानूनी लड़ाई शीर्ष अदालत में होगी। सुप्रीम कोर्ट के सामने एक ओर यह सवाल होगा कि आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द करने में हाई कोर्ट का फैसला सही था या नहीं। दूसरी ओर मुआवजे की रकम अधिकारियों के वेतन से वसूलने के आदेश की वैधता पर भी सवाल उठ सकता है।