जनगणना के फॉर्म में ओबीसी से जुड़ा सवाल क्यों गायब है? इसके सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक असर क्या होंगे? क्या इस पर एसआईआर जैसा बड़ा विवाद खड़ा होगा?
जनगणना वाले फॉर्म के सवालों में ओबीसी का ज़िक्र क्यों नहीं है? इसको लेकर सवाल खड़ा होने लगा है। क्या 2027 की जनगणना में ओबीसी की सही गिनती उसी तरह फेल जाएगी जिस तरह 2011 के सोशियो-इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस यानी एसईसीसी में हुई थी? क्या यह नया 'खेल' है?
यह सवाल तब खड़ा हुआ है जब देश की सबसे बड़ी जनगणना की एक तरह से शुरुआत हो चुकी है। पहले चरण में घरों की लिस्टिंग होगी और इसके लिए रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया यानी आरजीआई ने इसके सवालों का फॉर्म जारी किया है। इन सवालों में एससी यानी अनुसूचित जाति और एसटी अनुसूचित जनजाति का नाम साफ-साफ लिखा है, जबकि ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग का ज़िक्र नहीं है। योगेंद्र यादव जैसे विश्लेषक ने इसे खुलकर 'जातिगत जनगणना को नाकाम करने के खेल की शुरुआत' करार दिया है।
ओबीसी पर क्या हो सकता है असर?
योगेंद्र यादव का कहना है कि दूसरे चरण में जब हर व्यक्ति से जाति पूछी जाएगी तो एससी-एसटी वालों की जाति सरकारी लिस्ट से मैच करके रिकॉर्ड हो जाएगी। लेकिन ओबीसी वालों से जनरल कैटेगरी की तरह अपनी जाति का नाम लिखवाने के लिए कहा जाएगा। उन्होंने कहा है कि इसका नतीजा यह होगा कि एक ही जाति के दर्जनों सरनेम होंगे। उन्होंने मिसाल दी है कि यादव को कोई 'अहीर' लिखेगा, कोई 'राव', कोई 'राय', 'मंडल' और कोई 'चौधरी' लिखेगा।
उन्होंने कहा है, "कुल मिलाकर लाखों अलग-अलग जाति नाम इकट्ठा हो जाएंगे। फिर क्या होगा? सालों तक डेटा का विश्लेषण नहीं हो पाएगा। सरकार कहेगी- 'यह तो असंभव है!' ठीक वैसा ही खेल 2011 के एसईसीसी (सोशियो-इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस) में हुआ था, जहां ओबीसी की सही गिनती फेल हो गई थी। यानी जातिवार जनगणना को नाकाम करने का खेल शुरू हो चुका है। अगर अब ना जागे तो देर हो जाएगी।"
अब सवाल यह है कि क्या सरकार सच में ओबीसी की सही संख्या जानना चाहती है? या फिर आरक्षण, विकास योजनाओं और राजनीतिक फैसलों में पिछड़े वर्गों के हक को कमजोर करने की तैयारी है? अगर ओबीसी की असली तादाद सामने आ गई तो कई बड़े बदलाव हो सकते हैं। आरक्षण की सीमा, उप-वर्गीकरण, संसाधनों का बंटवारा, इन सब पर असर पड़ेगा। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। क्या यह तकनीकी चूक है या बड़ा षड्यंत्र?
जनगणना 2027 पर क्या है स्थिति?
सरकार ने 2027 की जनगणना के पहले चरण हाउस लिस्टिंग के लिए 33 सवाल जारी किए हैं। यह चरण 1 अप्रैल 2026 से शुरू होगा और सितंबर 2026 तक चलेगा। जनगणना दो चरणों में होगी। पहला घरों की सूची और दूसरा लोगों की गिनती। दूसरा चरण फरवरी 2027 में होगा। सरकार ने पहले ही कहा है कि जनगणना में जाति की गिनती भी होगी, जो 1931 के बाद पहली बार है। यह डिजिटल जनगणना होगी।
योगेंद्र यादव और सामाजिक न्याय के समर्थक लंबे समय से जाति जनगणना की पैरवी करते रहे हैं। उनका कहना है कि ओबीसी की गिनती बिना किए 30 साल से आरक्षण दिया जा रहा है, जो गलत है। अब जब मोदी सरकार ने जाति जनगणना की घोषणा की है तो बहस 'क्यों' से बदलकर 'कब, कैसे और आगे क्या' पर आ गई है। योगेंद्र यादव ने पिछले साल लिखे एक लेख में कहा था कि तीन मुख्य बातों पर सतर्क रहने की ज़रूरत है-
- जाति गिनती जनगणना का हिस्सा होनी चाहिए, अलग से नहीं।
- सिर्फ एससी, एसटी, ओबीसी तक सीमित नहीं – जनरल कैटेगरी की सभी जातियों की भी गिनती होनी चाहिए, ताकि जाति विशेषाधिकार की पूरी तस्वीर आए।
- इसे नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर से न जोड़ा जाए, वरना पूरी प्रक्रिया बिगड़ सकती है।
वह कहते हैं कि जनगणना में सिर्फ जाति नाम नहीं, बल्कि हर जाति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी पता चलनी चाहिए। जिसमें भूमि का मालिकाना हक, नौकरी, शिक्षा, व्यवसाय आदि शामिल हो। उन्होंने लिखा है कि 2011 के एसईसीसी में ये सवाल थे, इन्हें जनगणना में शामिल करना चाहिए।
योगेंद्र यादव का मानना है कि जाति जनगणना से आरक्षण नीति में बड़े बदलाव आ सकते हैं। ओबीसी की आबादी 45% से ज्यादा होने पर 27% आरक्षण बढ़ सकता है। 50% की सीमा तोड़नी पड़ सकती है। प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण की मांग बढ़ेगी। एससी, एसटी, ओबीसी में सब-कोटा की जरूरत पड़ सकती है।
अब यह सब इस पर निर्भर करेगा कि सरकार डेटा का इस्तेमाल कैसे करेगी? अगर सही से हुआ तो सामाजिक न्याय की नई शुरुआत हो सकती है। लेकिन अगर योगेंद्र यादव की चेतावनी सही निकली तो फिर से देरी और बहाने चल सकते हैं। इससे राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है।