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योगी का आरक्षण: जनरल से ज़्यादा अंक वाले ओबीसी कट-ऑफ़ में नहीं

नौकरियों में आरक्षण को लेकर विवाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बनने के बाद नया नहीं है। विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की नियुक्ति में जब विभाग को इकाई मानकर आरक्षण दिया जाने लगा तो आरक्षित तबक़े के लिए सीटें ही नहीं बचती थीं। संसद से लेकर प्रेस कॉन्फ़्रेंसों में सरकार के ज़िम्मेदार लोगों के बयानों के बावजूद इस तरह की धांधली नहीं रुक रही है।

उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसरों की नियुक्ति में भी आरक्षित पदों संबंधी गड़बड़ियाँ खुलकर सामने आई हैं। इतिहास में 38 पदों में से 32 अनारक्षित हैं, जबकि 4 पद ओबीसी और 2 पद एससी-एसटी के लिए आरक्षित हैं। भूगोल विषय के कुल 48 पद में 31 अनारक्षित, 12 ओबीसी और 5 पद एससी-एसटी के लिए आरक्षित रखे गए हैं। उर्दू में 11 पदों में से 9 सामान्य एक ओबीसी और एक पद एससी-एसटी के लिए है। राजनीति शास्त्र के कुल 121 पदों में से 92 सामान्य, 18 ओबीसी और 11 एससी-एसटी के लिए आरक्षित रखे गए हैं।

इन विषयों में आरक्षित और अनारक्षित पदों की संख्या देखें तो ऐसा नहीं लगता कि जितनी वैकेंसी आई है, उनमें से ओबीसी को 27 प्रतिशत और एससी-एसटी को 22.5 प्रतिशत आरक्षण मिला है। नरेंद्र मोदी सरकार के आरक्षण के साथ छेड़छाड़ न करने के वादे सिर के बल नज़र आते हैं।

इतना ही नहीं, आरक्षण देने में उल्टी गंगा बही है। इसमें 60 में से 10 सीटें सामान्य, 30 सीटें ओबीसी और 20 सीटें एससी-एसटी के लिए रखी गई हैं। 60 में से किस आधार पर 10 सीटें ही सामान्य रखी गई हैं, यह कहीं से तार्किक नज़र नहीं आता। लेकिन आयोग ने ज़रूर कोई ऐसा फ़ॉर्मूला लगाया है, जिसकी वजह से जहाँ ज़्यादातर विषयों में ओबीसी और एससी-एसटी वर्ग को नुक़सान हो रहा है, वहीं वाणिज्य एक ऐसा विषय है, जिसमें सामान्य वर्ग के लिए सीटें नहीं छोड़ी गई हैं।

एक तर्क यह आ रहा है कि ओबीसी की सीटें कम होने और अभ्यर्थी बहुत अधिक होने की वजह से ओबीसी की मेरिट बहुत ज़्यादा और सामान्य की मेरिट कम गई है। और जब लिखित और साक्षात्कार के अंक मिलाकर फ़ाइनल रिजल्ट बनेगा, तब ओबीसी का कट-ऑफ़ मार्क कम हो जाएगा। यह तर्क भी समझ से परे है।
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आइए, इतिहास विषय का उदाहरण लेकर समझने की कवायद करते हैं कि अंतिम परिणाम में भील ओबीसी का कट-ऑफ़ मार्क कम होने की संभावना क्यों नहीं है। इतिहास विषय में 32 सामान्य वर्ग की सीटों के लिए प्रति सीट 5 अभ्यर्थी के हिसाब से 302 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया है, जिनका कट-ऑफ़ अंक 157.14 है। वहीं ओबीसी की 4 सीटों के लिए 28 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया है, जिनका कट-ऑफ़ अंक 163.27 है। अब अगर 32 सामान्य सीटों पर ओबीसी के लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण सभी अभ्यर्थियों को ज़्यादा अंक के आधार पर रख लिया जाता है तो ओबीसी के 4 पद खाली ही रह जाएँगे, बशर्ते साक्षात्कार में कोई गड़बड़ी कर ओबीसी वर्ग के विद्यार्थियों को कम नंबर न दे दिए जाएँ। साथ ही उन ओबीसी अभ्यर्थियों के साथ भी अन्याय हुआ है, जो सामान्य से ज्यादा अंक पाने के बावजूद साक्षात्कार में शामिल नहीं हो पाएँगे।

आरक्षण का सामान्य-सा नियम है कि अनारक्षित पद पर हर वर्ग के अभ्यर्थियों का चयन हो जाता है, उसके बाद आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों का चयन शुरू होता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में हर हाल में ओबीसी, एससी-एसटी, महिला, विकलांग का कट-ऑफ़ अंक कम रहेगा।

मोदी के पहले कार्यकाल में ऐसी गड़बड़ियाँ सामने आई थीं, जब कोटे के तहत आने वाले अभ्य़र्थियों को सिर्फ़ कोटे में चयन के लिए विचार किया गया और उन्हें सामान्य श्रेणी में नहीं डाला गया। इन विसंगतियों का उल्लेख लोकसभा और राज्यसभा के 30 सांसदों से बनी गणेश सिंह समिति ने अपनी रिपोर्ट में किया है, जो हाल ही में 9 मार्च 2019 को लोकसभा में पेश की गई थी। समिति ने सरकार के प्रति आभार भी जताया था कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने 4 अप्रैल 2018 को सीधी भर्तियों में अन्य पिछड़े वर्ग की नियुक्ति से संबंधित नए दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें कहा गया था, ‘केंद्र सरकार की नौकरियों व सेवाओं में आरक्षित वर्ग यानी ओबीसी, एससी, और एसटी अभ्यर्थी, जो सामान्य अभ्यर्थियों के मानकों के मुताबिक़ चयनित होंगे, उन्हें आरक्षित रिक्तियों में समायोजित नहीं किया जाएगा। उन्हें तभी आरक्षित श्रेणी में शामिल किया जाएगा, जब उन्होंने आयु सीमा, अनुभव, योग्यता, लिखित परीक्षा में शामिल होने की संख्या जैसी सुविधाओं का लाभ उठाया हो। ऐसे अभ्यर्थियों को आरक्षित रिक्तियों में गिना जाएगा।’ यह नियम भी पहले से है। मोदी सरकार ने सिर्फ़ स्पष्टीकरण दिया है।

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ओबीसी की कट-ऑफ़ ज़्यादा क्यों?

बहुत दुर्लभ मामलों में ऐसा होता है कि नियम के मुताबिक़ आरक्षण लागू करने के बावजूद ओबीसी के चयन का अंक सामान्य से ज़्यादा होता है। सामान्यतया यह कम सीटों के मामले में होता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि पुलिस विभाग में दरोगा के लिए 10 पद हैं, जिनमें से 5 सामान्य हैं और 3 ओबीसी के लिए आरक्षित हैं। ओबीसी के तहत आवेदन करने वालों ने उम्र ज़्यादा होने या ग्रेजुएशन में कम अंक होने का लाभ उठा लिया है, जो सुविधा उन्हें ओबीसी आरक्षण के तहत मिली हुई है। ऐसे में अगर 3 अभ्यर्थी ऐसे मिलते हैं, जिन्होंने उम्र या योग्यता में आरक्षण का लाभ उठा लिया और लिखित परीक्षा में उनके अंक सामान्य से ज़्यादा हैं तब भी उन्हें आरक्षित श्रेणी में माना जाएगा। ऐसे में सामान्य वर्ग की मेरिट आरक्षित वर्ग से ज़्यादा हो जाती है।

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आईएएस टॉपर रहीं टीना डाबी इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्हें आरक्षण का लाभ प्रारंभिक परीक्षा में मिल गया था। 94 अंक पाकर डाबी प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई थीं, जबकि उस वर्ष सामान्य वर्ग का चयन 106 अंक पर हुआ था। डाबी ने अंतिम चयन में यूपीएससी टॉप किया। इसके बावजूद उन्हें आरक्षित श्रेणी में ही नौकरी दी गई थी। इतना ही नहीं, वह हरियाणा कैडर चाहती थीं, लेकिन हरियाणा में आईएएस का एससी पद न होने की वजह से उनकी नियुक्ति नहीं हो पाई। यूपीएससी टॉपर होने के बावजूद उन्हें राजस्थान कैडर आवंटित किया गया।

यूपी शिक्षा सेवा आयोग में अजीब नियम

लेकिन उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग का मामला अलग है। इसने आरक्षण प्रमाण पत्र लगा देने वालों को आरक्षित श्रेणी में डाल दिया है, भले ही उनके अंक सामान्य से ज़्यादा हैं। आयोग ने जो तरीक़ा अख्तियार किया है, उसके तहत अगर इतिहास में 38 पदों में से ओबीसी के किन्हीं वजहों से एक भी पद आरक्षित नहीं किया गया होता और सभी पद अनारक्षित होते तो ओबीसी वर्ग में जन्मे अभ्यर्थी को नौकरी पाने का हक़ नहीं होता।

प्रीति सिंह
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