प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए 'दिमाग़ी नक्सल' शब्द को विपक्ष ने असहमति को दबाने की कोशिश क़रार दिया है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार आलोचकों, बुद्धिजीवियों और विपक्ष की आवाज़ को दबाने के लिए नए-नए राजनीतिक लेबल गढ़ रही है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, सीपीआई(एम) समेत कई विपक्षी दलों ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना और असहमति जताना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। इसे किसी भी तरह से 'दिमाग़ी नक्सल' जैसे शब्दों से बदनाम नहीं किया जा सकता है।

विपक्षी दलों के नेताओं ने पीएम के 'दिमाग़ी नक्सल' वाले बयान पर क्या क्या कहा है, यह जानने से पहले यह जान लीजिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने लाल क़िले से अपने भाषण में क्या कहा। स्वतंत्रता दिवस पर लाल क़िले की प्राचीर से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलवाद अब समाप्ति की ओर है, लेकिन 'दिमाग़ी नक्सल' अभी भी समाज में सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्षों तक माओवादी सोच रखने वाले लोग सत्ता के गलियारों और सरकारी समितियों तक पहुंचे और उन्होंने नीतियों को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि अब जबकि सुरक्षा बलों ने जंगलों से नक्सलवाद को लगभग ख़त्म कर दिया है, ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें समाज से अलग करना ज़रूरी है, क्योंकि वे हिंसा और अराजकता फैलाने के अवसर तलाश रहे हैं।
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'यह प्रधानमंत्री की हताशा का संकेत': कांग्रेस

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के बयान को उनकी हताशा का संकेत बताया। उन्होंने कहा कि पहले प्रधानमंत्री अपने विरोधियों को 'अर्बन नक्सल' कहते थे और अब 'दिमाग़ी नक्सल' कह रहे हैं।

जयराम रमेश ने कहा, "यह उनकी हताशा का पक्का संकेत है। यह अलग बात है कि आखिर में वह (मोदी) वही करते हैं जिसकी ये तथाकथित 'अर्बन नक्सल' या अब 'दिमागी नक्सल' मांग या वकालत करते हैं। ऐसे ही नहीं उन्हें 'पूरे पॉलिटिकल साइंस में मास्टर एब्यूज़र' (गालियां देने में माहिर) कहा जाता है।"

टीएमसी का आरोप

तृणमूल कांग्रेस के नेता और पूर्व सांसद साकेत गोखले ने कहा कि प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय मंच का उपयोग अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने के लिए किया। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों के खिलाफ हुई कथित कार्रवाई और पेलेट गन के इस्तेमाल पर माफी मांगने के बजाय प्रधानमंत्री अपने आलोचकों को 'दिमाग़ी नक्सल' कहकर निशाना बना रहे हैं।
पीएम की यह 'दिमाग़ी नक्सल' वाली टिप्पणी तब आई है जब हाल में मोदी सरकार को जेन ज़ी के बड़े आंदोलन का सामना करना पड़ा है और पहली बार दबाव में शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है। दिल्ली के जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में खामियों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन किया था। इसके बाद संसद में विपक्ष ने सरकार को परेशान किए रखा। इस आंदोलन के बाद माना जा रहा है कि मोदी सरकार चौतरफ़ा दबाव महसूस कर रही है। अब पीएम की इस दिमागी नक्सल वाली टिप्पणी के बीच कांग्रेस ने कहा है, 'कोई भी सरकार लोकतांत्रिक असहमति को दबा नहीं सकती।' पार्टी ने यह भी कहा है, 'अधिकार कोई विशेषाधिकार नहीं हैं। वे हमारी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता हैं। सच की आवाज़ को दबने नहीं देंगे।

विपक्ष को खत्म करने की सोच: चिदंबरम

पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि 'दिमाग़ी नक्सल' शब्द पहले इस्तेमाल किए गए 'अर्बन नक्सल', 'टुकड़े-टुकड़े गैंग', 'राष्ट्रविरोधी' जैसे राजनीतिक विशेषणों की अगली कड़ी है। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि यदि सरकार इस सोच पर चलती है तो इसका मतलब होगा कि विपक्ष को ख़त्म करने की कोशिश की जाएगी, जिससे अंततः देश एक-दलीय व्यवस्था और तानाशाही की ओर बढ़ सकता है।

चिदंबरम ने यह भी कहा कि कई ऐसे लोग वर्षों से बिना मुकदमे के जेल में बंद हैं, जिन्हें पहले इसी तरह के आरोपों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अंग्रेज़ी अख़बार से कहा कि हिंसा और सशस्त्र विद्रोह के खिलाफ सख्ती जरूरी है, लेकिन किसी भी विचारधारा या असहमति रखने वाले लोगों को व्यापक रूप से 'दिमाग़ी नक्सल' कहना लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल है। उन्होंने कहा कि इससे सरकार के आलोचक, शिक्षाविद, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी निशाने पर आ सकते हैं। लोकतंत्र की असली ताकत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा में है।

सरकार सवालों से घबराई: सचिन पायलट

कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि प्रधानमंत्री और बीजेपी युवाओं तथा छात्रों के सवालों से परेशान हैं। उन्होंने कहा कि पहले किसानों को 'खालिस्तानी', सरकार के विरोधियों को 'देश विरोधी' और जातिगत जनगणना की मांग करने वालों को 'अर्बन नक्सल' कहा गया। अब एक नया शब्द 'दिमाग़ी नक्सल' सामने लाया गया है। पायलट ने कहा कि देश के युवा रोजगार, शिक्षा और शासन से जुड़े सवाल पूछ रहे हैं और सरकार उनका जवाब देने के बजाय उन्हें अलग-अलग नाम दे रही है।

वाम दलों ने भी जताई आपत्ति

सीपीआई महासचिव डी. राजा ने कहा कि प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर का इस्तेमाल भी अपने आलोचकों पर हमला करने के लिए किया। उन्होंने कहा कि पहले 'राष्ट्रविरोधी', 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए और अब 'दिमाग़ी नक्सल' का नया लेबल दिया गया है। यह लोकतांत्रिक असहमति को डराने और दबाने की कोशिश है। डी. राजा ने प्रधानमंत्री से सवाल किया कि छात्रों और युवाओं द्वारा शिक्षा और रोजगार को लेकर उठाए जा रहे मुद्दों का जवाब सरकार कब देगी। सीपीआई(एम) महासचिव एम. ए. बेबी ने भी कहा कि यह बयान विपक्ष और सरकार की आलोचना करने वालों को निशाना बनाने का प्रयास है।
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पहले भी इस्तेमाल कर चुके हैं ऐसे शब्द

प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले भी अपने भाषणों में कई राजनीतिक शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं। 2021 के किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने 'आंदोलनजीवी' शब्द का इस्तेमाल किया था। उसी दौर में उन्होंने 'एफडीआई' का भी जिक्र किया था और इसको फॉरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलॉजी के तौर पर पेश किया था। भाजपा के कई नेताओं की ओर से समय-समय पर 'अर्बन नक्सल', 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' और 'राष्ट्रविरोधी' जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया जाता रहा है।

विपक्ष का कहना है कि सरकार बार-बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करके अपने आलोचकों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों को बदनाम करने की कोशिश करती है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना और नीतियों की आलोचना करना संवैधानिक अधिकार है, जिसे किसी राजनीतिक विशेषण के जरिए कमजोर नहीं किया जा सकता। वहीं, प्रधानमंत्री के भाषण में किए गए 'दिमाग़ी नक्सल' वाले बयान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक चर्चा का विषय बना रह सकता है।