विपक्षी दलों ने फ़ैसला लिया है कि वे संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए एक नया प्रस्ताव लाएंगे। यह फ़ैसला तब लिया गया जब विपक्ष ने लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को गिराने में कामयाबी हासिल की है। इस विधेयक के ज़रिए महिलाओं के आरक्षण को तेजी से लागू करने के लिए डिलिमिटेशन यानी लोकसभा सीटों को 2011 की जनगणना के आधार पर फिर से बांटने की कोशिश की जा रही थी। इसी पर विपक्ष ने एकजुटता दिखाई और इस पर सरकार को झुका दिया। अब इससे उत्साहित विपक्ष ज्ञानेश कुमार पर कुछ ऐसा ही करने की तैयारी में है।

पुराना प्रस्ताव कब और क्यों खारिज हुआ?

ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ पहले 12 मार्च को विपक्ष ने यह प्रस्ताव लाया था। इसमें 130 लोकसभा सदस्यों और 63 राज्यसभा सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे। कुल 193 सांसदों का यह प्रस्ताव 6 अप्रैल को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा अध्यक्ष सी.पी. राधाकृष्णन ने खारिज कर दिया।
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दोनों ने अलग-अलग 17 पन्नों का विस्तृत आदेश जारी किया। इसमें कहा गया कि विपक्ष ने दुराचार साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं दिए। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए यह सबूत जरूरी है।
आरोपों में कहा गया था कि कई मामले पहले ही अदालत में चल रहे हैं या पहले तय हो चुके हैं। स्पीकर और चेयरमैन ने लिखा कि ये मुद्दे राजनीतिक बहस के लिए ठीक हो सकते हैं, लेकिन हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संवैधानिक ऊंची कसौटी पूरी नहीं होती। सात आरोपों में से हर एक का जवाब उन्होंने विस्तार से दिया।

विपक्ष ने लगाए 7 गंभीर आरोप

विपक्ष ने महाभियोग नोटिस में ज्ञानेश कुमार पर सात मुख्य आरोप लगाए थे। ये आरोप थे-
  • पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण
  • चुनावी धांधली की जांच में जानबूझकर बाधा डालना
  • लाखों मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर करना
  • कुछ खास राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने वाला व्यवहार
  • बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाताओं को बाहर करने का मामला
  • सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देकर पक्षपात का आरोप
  • दुराचार साबित होने का आरोप
विपक्ष का कहना था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने सत्तारूढ़ बीजेपी को कई मौकों पर फायदा पहुंचाया, खासकर बिहार में चल रहे वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण में। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान भी टीएमसी ने ऐसे ही गंभीर आरोप लगाए हैं।
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अब नया प्रस्ताव क्यों?

विपक्ष अब नया मोशन तैयार कर रहा है। इसमें नए आरोप जोड़े जाएंगे। महिला संशोधन और डिलिमिटेशन विधेयक को गिराने से विपक्ष उत्साहित है और उम्मीद कर रहा है कि इस बार हस्ताक्षर करने वालों की संख्या बढ़ेगी। मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि नया नोटिस अगले हफ्ते तक संसद में पेश किया जा सकता है। विपक्षी नेता नए मोशन के सटीक आरोपों के बारे में अभी कुछ नहीं बता रहे हैं।

पूरा विवाद क्या है?

यह पहला मौक़ा है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ हटाने का प्रस्ताव संसद में लाया गया। विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग में पक्षपाती और भेदभावपूर्ण तरीके से काम किया। कुछ आरोपों में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम काटने, चुनावी धांधलियों की जांच रोकने और जनता के विश्वास को कमजोर करने की बात कही गई थी। सरकार और सत्तापक्ष का कहना है कि ये आरोप बिना सबूत के हैं और राजनीतिक मकसद से लगाए जा रहे हैं।
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क्या कहते हैं संविधान के नियम?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बहुत कठिन है। यह सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी है। संसद में प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति को सिफारिश करनी होती है। अभी तक विपक्ष का प्रस्ताव शुरुआती स्टेज पर ही खारिज हो गया है।

विपक्ष का दावा है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, इसलिए यह क़दम ज़रूरी है। सरकार इसे राजनीतिक साज़िश बता रही है। यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही में गरमागरम बहस पैदा कर सकता है। दोनों तरफ़ से आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।