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जिस राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न का पीएम ने अनावरण किया उस पर विवाद क्यों?

मोदी सरकार की सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर तो विवाद रहा ही है, लेकिन अब इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा नये संसद भवन के ऊपर लगाए गए राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न पर विवाद हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रतीक चिह्न का अनावरण किया और इसपर सवाल उठने लगे। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न के मूल रूप से छेड़छाड़ की गई है और उसके हावभाव को बदला गया है। इस पर आपत्ति करने वालों में सीपीएम, टीएमसी, राजद, आम आदमी पार्टी के नेता शामिल हैं। हालाँकि, प्रतीक चिह्न के डिजाइनरों ने दावा किया है कि राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

उनके दावों के उलट राजनीतिक दलों के नेताओं और आम लोगों ने पहले के राष्ट्रीय चिह्न के साथ इसकी तुलना कर बदलाव को साफ़ तौर पर दिखाने की कोशिश की है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थॉमस इसाक ने कहा है, 'अशोक स्तम्भ जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को अपवित्र करने का अधिकार किसी को नहीं है। मोदी ने राष्ट्रीय प्रतीक पर दुबले, शांत और शालीन शेरों को ग़ुस्सैल, तंदुरुस्त और ख़तरनाक शेरों में बदल दिया है। हिंदुत्व परिवर्तन का सच्चा मॉडल।'

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इसके साथ ही विपक्षी दलों ने यह भी सवाल किया है कि कार्यकारिणी के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री ने प्रतीक का अनावरण क्यों किया।

हैदराबाद के सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने ट्वीट किया, 'सरकार के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री को नए संसद भवन के ऊपर राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण नहीं करना चाहिए था। प्रधानमंत्री ने सभी संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन किया है।'

लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल ने ट्वीट किया कि "मूल कृति के चेहरे पर सौम्यता का भाव तथा अमृत काल में बनी मूल कृति की नक़ल के चेहरे पर इंसान, पुरखों और देश का सबकुछ निगल जाने की आदमखोर प्रवृति का भाव मौजूद है। हर प्रतीक चिह्न इंसान की आंतरिक सोच को प्रदर्शित करता है। इंसान प्रतीकों से आमजन को दर्शाता है कि उसकी फितरत क्या है।'

आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने एक ट्वीट को रिट्वीट करते हुए पूछा है, 'मैं 130 करोड़ भारतवासियों से पूछना चाहता हूँ राष्ट्रीय चिह्न बदलने वालों को 'राष्ट्र विरोधी' बोलना चाहिये या नहीं बोलना चाहिये?'

तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और सरकार द्वारा संचालित प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार ने इसे 'हमारे राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान' करार दिया। प्रतीक और इसके नए संस्करण की तसवीरों को साथ-साथ साझा करते हुए उन्होंने ट्वीट किया, 'मूल बाईं ओर, सुंदर, राजसी आत्मविश्वास से भरा है। दाईं ओर मोदी का एक संस्करण है, जिसे नए संसद भवन के ऊपर रखा गया है- झुंझलाहट, अनावश्यक रूप से आक्रामक और अनुपातहीन। शर्म करो! इसे तुरंत बदलो!'

तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने बिना किसी टिप्पणी के अपने ट्विटर हैंडल पर दो तस्वीरें पोस्ट कीं।

जाने माने वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया, 'गांधी से गोडसे तक; राजसी और शांति से बैठे शेर के हमारे राष्ट्रीय प्रतीक से लेकर सेंट्रल विस्टा में निर्माणाधीन नए संसद भवन के शीर्ष पर अनावरण किए गए नए राष्ट्रीय प्रतीक तक; नुकीले दाँतों के साथ गुस्से में शेर।

ये है मोदी का नया भारत!'

जवाहर सरकार की टिप्पणी पर बीजेपी ने प्रतिक्रिया दी है। बीजपी के चंद्र कुमार बोस ने एनडीटीवी से कहा, 'समाज में सब कुछ विकसित होता है, हम भी आज़ादी के 75 साल बाद विकसित हुए हैं। एक कलाकार की अभिव्यक्ति जरूरी नहीं कि सरकार की मंजूरी हो। हर चीज के लिए, आप भारत सरकार या माननीय प्रधानमंत्री जी को दोष नहीं दे सकते हैं।'

रिपोर्ट के अनुसार, नए संसद भवन के प्रतीक चिह्न के डिजाइनर सुनील देवरे और रोमिल मूसा ने जोर देकर कहा कि इसमें 'कोई बदलाव नहीं है'। उन्होंने कहा कि 'शेरों का चरित्र समान है, बहुत मामूली भेद हो सकते हैं। लोगों की अलग-अलग व्याख्याएँ हो सकती हैं।'

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