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कोरोना की दूसरी लहर में कई जानें बच सकती थीं: संसदीय पैनल

कोरोना वायरस की जिस दूसरी लहर के दौरान गंगा नदी में तैरते हज़ारों शवों की तसवीरें आई थीं, उसको लेकर अब एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में कई दावे किए गए हैं। उस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि समय पर रणनीति लागू की जाती तो कोविड महामारी की दूसरी लहर के दौरान कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

संसदीय पैनल ने स्थिति की गंभीरता का अनुमान नहीं लगाने के लिए सरकार की खिंचाई की है। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य पर संसद की स्थायी समिति ने सोमवार को राज्यसभा में 137वीं रिपोर्ट पेश की है। इसमें उसने कहा है कि दूसरी लहर ज़्यादा मामलों, अधिक मौतों, अस्पतालों में ऑक्सीजन और बिस्तरों की कमी, महत्वपूर्ण दवाओं की आपूर्ति में कमी, ज़रूरी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की कमी, सिलेंडरों व दवाओं जैसी चीजों की जमाखोरी व कालाबाजारी से प्रभावित थी।

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रिपोर्ट में कहा गया है, 'समिति का मानना है कि यदि सरकार शुरुआत में ही वायरस के अधिक फैलने वाले स्ट्रेन की पहचान करने में सफल होती और अपनी रणनीति को उपयुक्त रूप से लागू किया होता तो नतीजे कम गंभीर होते और कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।'

जब दूसरी लहर ख़त्म हो रही थी तब पिछले साल जून तक भारत में आधिकारिक तौर पर साढ़े तीन लाख से भी ज़्यादा मौतें हो गई थीं। हालाँकि, तब ऐसी रिपोर्टें अनुमान पर आधारित आई थीं कि मौत के वास्तविक आँकड़े आधिकारिक आँकड़े से काफ़ी ज़्यादा थे। तब कोरोना के पॉजिटिव केस और इससे मरने वालों की संख्या कम दर्ज होने के जो आरोप लगाए जा रहे थे। उस पर 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने पिछले साल मई महीने में एक रिपोर्ट छापी थी। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने कई सर्वे और संक्रमण के दर्ज किए गए आँकड़ों के आकलन के आधार पर लिखा था कि 'भारत में आधिकारिक तौर पर जो क़रीब 3 लाख मौतें बताई जा रही हैं वे दरअसल 6 लाख से लेकर 42 लाख के बीच होंगी।'

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ही कोरोना से मारे गए लोगों के शव गंगा नदी में तैरते मिले थे। हालाँकि सरकार उन दावों को खारिज करती रही थी। उन रिपोर्टों को सरकार भले ही खारिज करती रही हो, लेकिन नमामि गंगे के प्रमुख ने ही यह मान लिया था। उन्होंने यह बात एक किताब 'गंगा: रीइमेजिनिंग, रिजुवेनेटिंग, रीकनेक्टिंग' में लिखी। 

पिछले साल दिसंबर में लॉन्च हुई उस नई किताब के अनुसार कोरोना की दूसरी लहर के दौरान गंगा 'मृतकों के लिए आसान डंपिंग ग्राउंड' बन गई थी। इसमें यह भी कहा गया कि यह समस्या यूपी तक ही सीमित थी।

उस पुस्तक को राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक और नमामि गंगे के प्रमुख राजीव रंजन मिश्रा और एनएमसीजी के साथ काम कर चुके आईडीएएस अधिकारी पुस्कल उपाध्याय ने लिखा। उस किताब के एक खंड में 'फ्लोटिंग कॉर्प्स: ए रिवर डिफाइल्ड' शीर्षक से लिखा गया है कि महामारी का गंगा पर कैसा प्रभाव पड़ा। इसमें कहा गया कि नदी को बचाने के लिए पांच साल में किया गया गहन काम कुछ ही दिनों में ख़त्म होकर पहले जैसे होता दिख रहा है।

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार किताब में लिखा गया, 'जैसा कि कोरोना महामारी के कारण शवों की संख्या काफ़ी बढ़ गई और कई गुना ज्यादा हो गई तो जिला प्रशासन और यूपी व बिहार के श्मशान और शवों को जलाए जाने वाले घाटों की क्षमता कम पड़ गई। इसका नतीजा यह हुआ कि गंगा मृतकों के लिए एक आसान डंपिंग ग्राउंड बन गई।' हालाँकि, इस किताब में दावा किया गया कि 300 से ज़्यादा शव नहीं बहाए गए थे।

लेकिन, 'दैनिक भास्कर' ने तब अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि यूपी के 27 ज़िलों में गंगा किनारे 2 हज़ार से ज़्यादा शव मिले थे। देश के दूसरे मीडिया संस्थानों ने भी इस पर रिपोर्ट छापी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने रेत में दफनाए गए सैकड़ों शवों की तसवीर के साथ ख़बर छापी थी।

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बहरहाल, संसदीय समिति ने कोरोना की उसी दूसरी लहर को लेकर अपनी रिपोर्ट में ज़िक्र किया है। इसने पाया है कि भारत दुनिया में कोविड -19 मामलों के सबसे भारी बोझ वाले देशों में से एक है। देश की बड़ी आबादी ने महामारी के समय एक बड़ी चुनौती पेश की। इसने कहा कि नाजुक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी के कारण देश में जबरदस्त दबाव देखा गया।

इसने नोट किया कि सरकार महामारी और उसके बाद की लहरों के संभावित बढ़ने की गंभीरता का सटीक अनुमान नहीं लगा सकी। इसने यह भी कहा है कि भले ही पहली लहर के बाद कोरोना संक्रमण में गिरावट दर्ज की गई हो, सरकार को प्रयास जारी रखना चाहिए था।

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क़मर वहीद नक़वी
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