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राहुल के आरोप: अंबानी के मिडिल मैन थे मोदी, रफ़ाल की गोपनीय जानकारी की लीक

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मंगलवार को रफ़ाल सौदों पर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला किया है। उन्होंने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह आरोप लगाया कि मोदी ने क़रार होने से पहले ही रफ़ाल सौदों पर गोपनीय जानकारियाँ उद्योगपति अनिल अंबानी को दी थीं। ऐसा कर मोदी ने न केवल ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट का उल्लंघन किया, बल्कि देशद्रोह भी किया। 
मंगलवार को प्रतिष्ठित अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने रफ़ाल मुद्दे पर एक ख़बर छापी थी। ख़बर में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के दो हफ़्ते पहले अनिल अंबानी फ्रांस के रक्षा मंत्री के 3 सलाहकारों से मिले थे। इस बैठक में रक्षा सौदों पर बातचीत हुई थी। मुलाक़ात करने वालों में फ्रांसीसी रक्षा मंत्री ले द्रें के विशेष सलाहकार ज्याँ क्ला मैले, उनके उद्योग सलाहकार क्रिस्टॉफ सोलोमन और उनके उद्योग मामलों के तकनीकी सलाहकर ज्यॉफ़्री बकें भी थे। बाद में सोलोमन ने एक यूरोपीय रक्षा कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी को इस बैठक की जानकारी दी थी। सोलोमन ने ई-मेल में लिखा था कि यह बैठक गोपनीय है और बहुत जल्दी में इसकी योजना बनाई गई थी। राहुल गाँधी ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस ई-मेल का हवाला दिया और यह आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने देश के साथ विश्वासघात किया और एक जासूस की तरह रक्षा सौदों की जानकारी किसी दूसरे को दी। 
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ख़बर में लिखा है कि अनिल अंबानी एअरबस हेलीकॉप्टर के साथ भी काम करना चाहते थे, ऐसी मंशा उन्होंने इस बैठक में जताई थी। इस ख़बर की सबसे सनसनीखेज बात यह है कि अंबानी ने एक मोमोरंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग का ज़िक्र किया था, जो प्रधानमंत्री यात्रा के दौरान तैयार होना था और जिस पर हस्ताक्षर किए जाने थे।  
इंडियन एक्सप्रेस का दावा है कि अंबानी को फ्रांसीसी रक्षा मंत्री के कार्यालय में बैठक के समय इस बात की जानकारी थी कि प्रधानमंत्री अपनी आधिकारिक यात्रा पर 9-11 अप्रैल, 2015 को फ्रांस यात्रा पर जाएँगे।
फ्रांस की इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री के शिष्टमंडल में अनिल अंबानी भी थे। इस यात्रा के दौरान 10 अप्रैल 2015 को 36 रफ़ाल खरीदने का एलान ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने किया था। अख़बार का यह भी दावा है कि जिस हफ़्ते फ्रांस के रक्षा मंत्रालय में अनिल अंबानी की बैठक हुई थी, उसी हफ़्ते 28 मार्च 2015 को रिलायंस डिफेन्स का नाम रक्षा सौदों की दौड़ में शामिल किया गया था। 
36 रफ़ाल जहाज़ खरीदने के मोदी के एलान से सब चौंक पड़े, क्योंकि तब तक सबको यही पता था कि फ्रांस से 126 विमान खरीदे जाने हैं। मोदी की घोषणा के दो दिन पहले भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर ने भी यह कहा था कि एचएएल के साथ रफ़ाल सौदे काफ़ी हद तक हो चुका है। इसके दो हफ़्ते पहले दसॉ कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ट्रैपियर ने भी इस बात के संकेत दिए थे कि एचएएल के साथ रफ़ाल सौदे में कोई दिक्क़त नहीं है, सब कुछ पटरी पर है। ऐसे में अचानक एचएएल से क़रार तोड़ने की ख़बर से सब हैरान थे। 
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर से साफ़ है कि प्रधानमंत्री की यात्रा से ठीक पहले फ्रांस के रक्षा मंत्रालय में अनिल अंबानी की बैठक अनायास नहीं थी। सब कुछ पहले से तय था। 
अंबानी के फ्रांस आने, प्रधानमंत्री के शिष्टमंडल में शामिल होकर फ्रांस जाने, प्रधानमंत्री के अचानक 36 रफ़ाल खरीदने के एलान करने की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। वर्ना अंबानी फ्रांस के रक्षा मंत्रालय की बैठक में किसी मेमोरडंम ऑफ अंडरस्टैडिंग का ज़िक्र क्यों करते?
रफ़ाल लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी दसॉ एविएशन के साथ अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस ग्रुप पार्टनर है। इसके अलावा नागपुर में दसॉ-रिलायंस एअरोस्पेस लिमिटेड में दसॉ और रिलायंस की लगभग बराबर की साझेदारी है। हम यह भी बता दें कि इंडियन एक्सप्रेस में सबसे पहले यह ख़बर छापी थी कि तब के फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांद की जीवन संगिनी जूली गाये की फ़िल्म कंपनी में अनिल अंबानी की कंपनी ने पैसा लगाया था। अख़बार का दावा है कि 26 जनवरी, 2016 को ओलांद की भारत यात्रा के दौरान मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर करने के दो दिन पहले रिलायंस ने यह निवेश किया था। 
बाद में फ्रांसीसी मीडिया के हवाले से ख़बर आई थी कि भारत सरकार के दबाव में अनिल अंबानी का नाम रफ़ाल सौदे में दिया गया था। हमारे पास इसे मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं। 
अब इंडियन एक्सप्रेस के नए खुलासे और राहुल गाँधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद साफ़ हो गया है कि रफ़ाल सौदे में उद्योगपति अंबानी की भूमिका संदिग्ध है। इससे ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
मोदी को यह जवाब देना चाहिए कि एचएएल के साथ रफ़ाल सौदा टूटने, रफ़ाल सौदे में ऑफ़सेट पार्टनर के रूप में अंबानी की कंपनी की एंट्री और फ्रांसीसी राष्ट्रपति से उनकी बातचीत का रहस्य क्या है?
पिछले दिन 'द हिन्दू' के संपादक एन राम ने भी दो बड़े खुलासे रफ़ाल पर किए। 'द हिन्दू' के खुलासों में दावा किया गया है कि तमाम वरिष्ठ अधिकारियों की आपत्तियों को न केवल दरकिनार किया गया, बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने रक्षा मंत्रालय से अलग सीधे  फ्रांसीसी सरकार से मोल भाव किए। इस मोल भाव पर रक्षा सचिव ने तगड़ी आपत्ति जताई थी। यह आरोप भी लगा है कि मोदी सरकार ने दसॉ कंपनी से सौदे के लिए नियमों को शिथिल किया था और पैसे के भुगतान में दसॉ का रास्ता आसान बना दिया था। ये वे सवाल हैं जो इशारा करते हैं कि कहीं प्रधानमंत्री मोदी अनिल अंबानी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए तो काम नहीं कर रहे थे!
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