CBI chief selection process को नेता विपक्ष राहुल गांधी ने एक मज़ाक बताया। राहुल ने इससे असहमति जताते हुए कहा कि नेता विपक्ष रबर स्टैंप बनकर नहीं रह सकता। राहुल ने अपना बयान 12 मई को सोशल मीडिया पर रात 10.10 पर जारी किया।
राहुल गांधी और पीएम नरेंद्र मोदी
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मंगलवार शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीबीआई के अगले निदेशक के चयन प्रक्रिया पर असहमति नोट सौंपा। उन्होंने प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण और नेता विपक्ष की संवैधानिक भूमिका को 'रबर स्टैंप' तक सीमित करने वाला बताया। राहुल गांधी ने कहा, “मैं संवैधानिक कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकता और एक पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकता।” उन्होंने यह नोट प्रधानमंत्री के आवास पर हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सौंपा। बैठक से आने के बाद राहुल ने रात 10 बजकर 10 मिनट पर अपने असहमति नोट को एक्स पर जारी कर दिया।
बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत और राहुल गांधी शामिल हुए। वर्तमान सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद का कार्यकाल 24 मई को खत्म हो रहा है। बैठक एक घंटे से अधिक चली, लेकिन वहां हुई चर्चा पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया। यानी कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आई कि आखिर किसका चयन किया गया है। सूत्रों के अनुसार, नया सीबीआई निदेशक जल्द ही घोषित किए जाने की संभावना है।
राहुल गांधी के मुख्य आरोप
राहुल गांधी ने अपने दो पेज के असहमति नोट में आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने सीबीआई का दुरुपयोग राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और आलोचकों को निशाना बनाने के लिए किया है।
- उन्होंने कहा कि उन्हें शॉर्टलिस्टेड उम्मीदवारों की महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित रखा गया, जिससे प्रक्रिया का मजाक उड़ाया गया।
- उन्हें स्व-मूल्यांकन रिपोर्ट (self-appraisal reports) या 360 डिग्री मूल्यांकन रिपोर्ट्स पहले से उपलब्ध नहीं कराई गईं।
- बैठक के दौरान ही 69 उम्मीदवारों के मूल्यांकन रिकॉर्ड्स देखने को कहा गया।
- उन्होंने लिखा, “हर उम्मीदवार के इतिहास और परफॉर्मेंस का विस्तृत मूल्यांकन ज़रूरी है।”
- उन्होंने आरोप लगाया कि प्रक्रिया को सरकार के पसंदीदा उम्मीदवार को चुनने के लिए डिजाइन किया गया है।
राहुल गांधी ने यह भी याद दिलाया कि विपक्ष के नेता को चयन समिति में शामिल करने का मकसद संस्थागत कब्जे (institutional capture) को रोकना है, लेकिन उन्हें कोई सार्थक भूमिका नहीं दी गई। उन्होंने पहले 21 अक्टूबर और 5 मई (पिछले वर्ष) को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के लिए सुझाव दिए थे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
संभावित उम्मीदवार
सूत्रों के अनुसार, कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विचाराधीन हैं, जिनमें पराग जैन, शत्रुजीत कपूर, योगेश गुप्ता, जीपी सिंह और प्रवीर रंजन प्रमुख हैं। सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता की चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। लेकिन मोदी सरकार ने विपक्ष के नेता की भूमिका महत्वहीन बना दी है। राहुल की आपत्ति इसी बात पर है।
मोदी सरकार ने किस तरह कठपुतली अफसरों की नियुक्ति के लिए नियम बदले
सीबीआई प्रमुख के चयन में राहुल गांधी की असहमति ऐसे समय में आई है जब मोदी सरकार ने विभिन्न संवैधानिक और महत्वपूर्ण पदों की नियुक्ति नियमों में बदलाव किए हैं। जिसमें नेता विपक्ष और न्यायपालिका की भूमिका को सीमित कर दिया गया।
चुनाव आयुक्तों (Chief Election Commissioner और Election Commissioners) की नियुक्ति: 2023 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश (समिति में पीएम, नेता विपक्ष और सीजेआई शामिल थे) को बदलते हुए सरकार ने कानून बनाया। नई व्यवस्था में चयन समिति में सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। इससे सरकार को नियुक्तियों में अधिक नियंत्रण मिला।
सीबीआई निदेशक: लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम के तहत नियुक्ति अभी भी पीएम, सीजेआई और लीडर ऑफ ऑपोजिशन की समिति से होती है। लेकिन सरकार हर बार अपनी चलाती है। राहुल गांधी ने अब जो मुद्दा उठाया है, वो यही है।
अन्य पद (जैसे CIC - Chief Information Commissioner आदि): कई अन्य संस्थानों (सीवीसी, एनएचआरसी, लोकपाल आदि) की नियुक्तियों में भी चयन समिति में बदलाव या सरकार के प्रभाव को बढ़ाने वाले कदम उठाए गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बदलाव संस्थागत स्वतंत्रता को मजबूत करने के बजाय सरकार के पक्ष में झुकाव बढ़ाते हैं, जबकि सरकार इन्हें संसद की सर्वोच्चता और सुधार बताती है। सरकार की प्रक्रिया के तहत नियुक्त अधिकारी या उस संस्था का प्रमुख कठपुतली बनकर सरकार के लिए काम करता है। तमाम सुरक्षा और जांच एजेंसियों का विपक्षी दलों, पत्रकारों, सोशल एक्टिविस्टों के मामले में ऐसा ही रवैया सामने आया है।
यह घटनाक्रम सीबीआई जैसे संवेदनशील एजेंसियों की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर बहस को फिर से तेज करेगा, खासकर जब एजेंसी कई हाई-प्रोफाइल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की जांच कर रही है। नई नियुक्ति पर नजरें टिकी हुई हैं। सरकार अपनी ही चलाएगी। सीजेआई सूर्यकांत उस बैठक में मौजूद थे। नियुक्तियों पर उनकी सोच क्या है, वो बात कभी सामने नहीं आ पाएगी। सीजेआई और मोदी सरकार के रिश्ते बहुत बेहतरीन चल रहे हैं। न्यायपालिका को लेकर मोदी सरकार टेंशन में रही है। लेकिन अब उसकी सारी टेंशन दूर हो चुकी है।