लगता है आरएसएस का समय ठीक नहीं है चल रहा है। पहले प्रियांक खड़गे ने रजिस्ट्रेशन की चिट्ठी लिख कर एक ऐसा मुद्दा खड़ा कर दिया जिसका जवाब उनके पास नहीं है। और अब राममंदिर के दानपात्र में चोरी, जिसे ट्रस्ट से जुड़े प्रधानमंत्री के बेहद करीबी नृपेंद्र मिश्रा खुली डकैती कह रहे हैं। आरएसएस बुरी तरह फँस गई है । अगर वो फ़ौरन कार्रवाई करती तो लोग कहते कि संघ ने गलती मान ली और उसके अपने ही लोग चोर निकले और देर से कार्रवाई हुई तो ये कहा जा रहा है कि बड़ी मछलियों को बचाया जा रहा है । वो दोनों तरफ से पिट रहा है । उसके अपने समर्थक आग उगल रहे हैं और खुल कर पूछ रहे हैं कि “संघ चुप क्यों है ? मोहन भागवत चुप क्यों है ? ये चोरी करोड़ों हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ है और संघ अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता ।”
हकीकत में राममंदिर की चोरी ने संघ के चेहरे से नक़ाब नोच दिया है । वो नक़ाब जो ईमानदारी का है, शुचिता और सादगी का है । संघ के स्वयंसेवकों के बारे में ये कहा जाता था कि वो निःस्वार्थ भाव से अपना जीवन संघ के काम में यानी हिंदू उत्थान में खपा देता है, उस तस्वीर को इस चोरी ने नंगा कर दिया है । क्योंकि ये आम चोरी नहीं है, ये चोरी भगवान राम के घर में है, वो राम जिनके लिये संघ गर्व से कहता रहा है कि उसने राममंदिर निर्माण के लिये क़ुर्बानी दी, उसके स्वयंसेवकों ने लाठियाँ खाई और जान दी । वो राम जो टेंट में बसते थे, उसके लिये भव्य मंदिर बनवाया । इस राम के नाम पर बीजेपी ने करोड़ों लोगों की भावनाओं का दोहन किया और उसके वोट लिये । हर उस व्यक्ति को गालियाँ दी गईं जिसने जय श्री राम का नारा नहीं लगाया । जो मंदिर के दर्शन करने नहीं गया, उसे राम द्रोही कहा गया, सनातन विरोधी की संज्ञा दी गई । इन सब के पीछे राम के प्रति आस्था कम और राजनीति ज्यादा थी । मकसद साफ था, वोट लेना और केंद्र और राज्यों में सरकार बनाना ।
प्रधानमंत्री मोदी ने जनवरी 2024 में राममंदिर के उद्घाटन के समय कहा था कि ये सिर्फ मंदिर नहीं है ये हिंदू नवजागरण का प्रतीक है । और सहस्त्राब्दियां याद रखेंगी । निस्संदेह, राम मंदिर के आंदोलन ने संघ परिवार के हिंदू एकता के प्रोजेक्ट को नई ऊंचाई दीं, हिंदुओं के एक बड़े तबके में हिंदू धर्म के प्रति गौरव का भाव जगाया और आज अगर केंद्र में बीजेपी की सरकार है, और दो तिहाई राज्यों में बीजेपी और बीजेपी समर्थक सरकार है तो इसका बड़ा कारण हिंदू चेतना के उस उभार का है जो सपना कभी डॉ हेडगेवार ने देखा था । और जिसके लिये हजारों स्वयंसेवक आजीवन कुंवारे रहते हैं ।
लेकिन ये भी एक सचाई है कि 2014 के बाद संघ परिवार का स्वभाव और स्वरूप दोनों ही बदला है और तेज़ी से बदल रहा है । जो स्वयंसेवक कुर्ते पैजामे और एक सूटकेस में जीवन काट देता था, ट्रेन से सवारी करता था, चना चबैना खा कर संघ के काम में जुटा रहता था वो स्वयंसेवक आज सात्विकता का त्याग कर ऐश्वर्य की पनाह में है । वो आज हवाई जहाज के बिज़नेस क्लास में चलता है, उसके लिये प्राइवेट जेट का इंतज़ाम किया जाता है, वो पहले की तरह कार्यकर्ताओं के घर पर नहीं ठहरता, वो सेवन स्टार के प्रेसिडेंट स्वीट की मांग करता है।
मैंने वो दिन भी देखे हैं जब संघ और बीजेपी के नेता मेरे जैसे रिपोर्टर की मोटर बाइक से लिफ्ट लेते थे दिल्ली में एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिये। प्रमोद महाजन जैसे नेता की फ़ाइव स्टार लाइफ स्टाइल के लिये उनकी बुराई करते थे। लेकिन आज माहौल बदल गया है । जो पार्टी और संगठन चाल चरित्र और चेहरे की बात करते थे वो अब राजनीति में शुचिता की बात नहीं करते। पहले जिस संघ का कार्यालय सादगी का प्रतीक होता था, अब उनकी जगह हर सुविधा से लैस गगनचुंबी इमारतों ने ले लिया है । ये इमारत मात्र नहीं है, ये उस बदलाव का परिणाम है जो सत्ता अपने साथ लाती है। और सत्ता करप्ट करती है, सर्व सत्ता पूरी तरह से करप्ट करती है, ये अनायास ही नहीं कहा गया है । त्रासदी ये है कि जब इस बारे में कहा जाता है तो आलोचकों को गालियाँ दी जाती हैं, और सनातन विरोधी का तमग़ा पहना दिया जाता है।
आज के संघ में ‘सत्ता की पूजा’ और ‘शक्ति की उपासना’ ही सबसे बड़ा मूल्य है, ‘सत्व’ कहीं पीछे छूट गया है। जो कार्यकर्ता पद की लालसा किये बग़ैर बरसों काम करता था, आज वो पद की होड़ में है । पैसे का बोलबाला है । वो चमचागीरी और चापलूसी को सफलता का पर्याय मानता है । इस खेल में जो पिछड़ गया वो रोता है । अपने कर्मों को कोसता है । ऐसा नहीं है कि अभी भी संघ में ऐसे ईमानदार कार्यकर्ता नहीं हैं । हजारों हैं । लेकिन सत्ता के चक्रव्यूह ने इन्हें हाशिये पर फेंक दिया है । ये नये सिस्टम में, नई व्यवस्था में अपने को अनफिट पाते हैं ।
सत्ता से बड़ा चुंबक नहीं होता । वो अपनी तरफ खींचती है । 2014 के बाद एक बड़ा बदलाव और आया है । अचानक बड़ी संख्या में ‘नव स्वयंसेवकों’ की एक फौज खड़ी हो गई है । जो कभी बीजेपी, आरएसएस, हिंदुत्व और मोदी को पानी पी पी के कोसते थे, उनके साथ खुद को जोड़ना पसंद नहीं करते थे, अब सत्ता की मलाई खाने वालों की क़तार में खड़े हैं, संघ के ईमानदार कार्यकर्ताओं को पीछे धकेल के, उनको लंगडी मार कर । मजेदार बात ये है कि सत्ता के चक्रव्यूह में ये हर दरवाज़े पर द्वारपाल बन गये हैं, सत्ता के सबसे विश्वस्त सिपाही बन कर। कुछ तो मंत्री बन गये हैं, कुछ दूसरे बड़े संवैधानिक पदों पर आरूढ़ हो गये हैं बाकी सत्ता के दूसरे संस्थानों में एडजस्ट हो गये हैं या हो रहे हैं, या होने की फिराक में हैं।
मुझे मालूम नहीं कि संघ के शीर्ष पदाधिकारी इस बदलाव को कैसे देखते हैं, लेकिन ये संघ के अंदर ईमानदार कार्यकर्ताओं के बीच भारी असंतोष का कारण है क्योंकि ये जब देखते हैं कि जो लोग कुछ समय पहले तक संघ को गरिया रहे थे, आज वो सत्ता और संघ के चहेते बन गये है, तो उसकी समझ में सत्ता का ये चरित्र नहीं आता है । वो पूछता है कि जो काम ये ‘नव स्वयंसेवक’ कर सकते हैं वो काम वो क्यों नहीं कर सकता जिन्होने बचपन से संघ की सेवा की । वो ये सोचते सोचते भ्रमित होता है और फिर वो भी वो सारे काम करने की कोशिश करता है जो उसे नहीं करना चाहिये । वो अपनी ‘सात्विकता’ को छोड़ कर ‘तामसी’ प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होता है।
- राममंदिर में जो हुआ वो इसी बदलाव का प्रतीक है। ‘तामसी’ प्रवृत्ति एक बार जब हावी होती है तो फिर वो आसानी से पीछा नहीं छोड़ती। संघ को सत्ता का स्वाद लग गया है । इस स्वाद से पीछा छुड़ाना लगभग असंभव है।
कांग्रेस को इस बात का एहसास 1937 में तब हुआ था जब उसने पहली बार सत्ता में कायदे से भागीदारी की थी और मंत्री होने का सुख भोगा था। गांधी जी ने यूं ही नहीं कहा था कि आज़ादी के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिये । वो सत्ता की ‘तामसी’ प्रवृत्ति से अवगत थे, वो जानते थे कि आज़ादी की लड़ाई एक पवित्र सपना था जो लगातार कांग्रेस को ऊर्जस्वित करता रहता था लेकिन जैसे ही वो कार्यकर्ता कुर्सी की दौड़ में शामिल हुआ वो व्यवहारिक हो गया, सपना छूट गया, सात्विकता रसातल में चली गई। अपना और अपने लोगों के लिये सत्ता एकत्रित करना, उसकी पहली प्राथमिकता हो गई। राममंदिर में चोरी इसी स्वाभाविक प्रक्रिया का नतीजा है। जब गांधी की कांग्रेस नहीं बची तो हेडगेवार का संघ परिवार कैसे बचेगा। ये तो होना ही था। यहाँ से नीचे ही जाना होगा, ऊपर का रास्ता बंद हो गया है अब।