डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को मंगलवार 26 मई 2026 को एक बार फिर 30 दिनों की पैरोल पर रोहतक की सुनारिया जेल से रिहा कर दिया गया। यह 2017 में दोषसिद्धि के बाद उसकी 16वीं अस्थायी रिहाई है। राम रहीम दो महिला साध्वियों से रेप के मामले में 20 साल की सजा काट रहा है। इसके अलावा पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में भी उसे सजा मिल चुकी है। दूसरी तरफ उमर खालिद, शारजील इमाम जैसे असंख्य लोग हैं जो भारत की जेलों में बिना मुकदमे का सामना किए बंद हैं। उमर खालिद और शारजील इमाम तो पांच वर्षों से भी ज्यादा समय से जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रमनाथ ने 2025 में कहा था कि भारत की जेलों में 70 फीसदी लोग बिना किसी ट्रायल के बंद हैं। उन्होंने इस स्थिति पर खेद जताया था।

400 दिन जेल से बाहर

राम रहीम को हरियाणा की बीजेपी सरकार ने 30 दिनों की पैरोल दी है। इस दौरान वो सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में रहेगा। रिपोर्टों के अनुसार वह सुबह करीब 6:30 बजे जेल से निकला और भारी सुरक्षा के बीच सिरसा पहुंचा। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक राम रहीम को मिली लगातार पैरोल और फरलो अब गंभीर राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन चुकी है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार 2017 से अब तक वह 400 से अधिक दिन जेल से बाहर बिता चुका है। सिर्फ पिछले कुछ वर्षों में उसे कई बार 21 दिन, 30 दिन और 40 दिन की पैरोल दी गई। जनवरी 2026 तक राम रहीम लगभग 405 दिन जेल से बाहर रह चुका था।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) समेत कई सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों ने उसको इस तरह पैरोल देने पर आपत्ति जताई थी। आलोचकों का आरोप है कि उसकी पैरोल अक्सर चुनावों के आसपास दी जाती रही है। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली चुनावों से पहले मिली रिहाइयों को लेकर विपक्षी दल और सामाजिक संगठन सवाल उठाते रहे हैं। अब पंजाब में 2027 में विधानसभा चुनाव है। 
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उमर खालिद और शारजील इमाम बिना ट्रायल जेल में

जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद और शारजील इमाम जैसे राजनीतिक आरोपी पांच वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं। दिल्ली दंगा 2020 मामले में उन पर UAPA जैसी कठोर धाराएं लगाई गई हैं। अब तक उमर खालिद की जमानत याचिका 20 से अधिक बार अदालतों में जा चुकी है, लेकिन उन्हें रेगुलर जमानत नहीं मिली। हाल ही में उन्होंने अपनी मां की सर्जरी के दौरान देखभाल के लिए 10 दिन की अंतरिम जमानत मांगी थी, लेकिन अदालत ने केवल 3 दिन की राहत दी। उनका मुकदमा अब तक पूरी तरह शुरू भी नहीं हो पाया है। 

सुप्रीम कोर्ट के जज साहब अंडर ट्रायल कैदियों के लिए चिंतित

द हिन्दू अखबार ने नवंबर 2025 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक भारत की न्याय व्यवस्था और जेल प्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश की जेलों में बंद 70 फीसदी से अधिक कैदी ऐसे हैं जिन्हें अभी तक अदालतों ने दोषी नहीं ठहराया है। यानी वे “अंडरट्रायल” हैं ऐसे आरोपी जिनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ।

सिस्टम फेल हो रहा हैः जस्टिस विक्रम नाथ

जस्टिस विक्रम नाथ ने यह टिप्पणी हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान की। वहां “फेयर ट्रायल प्रोग्राम” रिपोर्ट जारी की गई थी, जिसमें पुणे और नागपुर की अदालतों और जेलों से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया गया। जस्टिस नाथ ने कहा कि बड़ी संख्या में अंडरट्रायल कैदी इसलिए जेलों में बंद हैं क्योंकि न्याय व्यवस्था उन्हें समय पर राहत देने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने जेल में उतना समय काट लिया है, जितनी सजा उन्हें दोष सिद्ध होने पर मिल सकती थी।

उन्होंने यह भी कहा कि कई लोग जमानती अपराधों में आरोपी हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए जेल में बंद हैं क्योंकि वे जमानत की राशि जमा नहीं कर सकते। उनके मुताबिक, “अधिकांश अंडरट्रायल इसलिए जेल में नहीं हैं क्योंकि कानून इसकी मांग करता है, बल्कि इसलिए क्योंकि व्यवस्था ने उन्हें विफल कर दिया है।”

कानूनी सहायता व्यवस्था पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जज ने देश की कानूनी सहायता प्रणाली (लीगल एड सिस्टम) पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि गरीब और कमजोर तबकों तक प्रभावी कानूनी मदद नहीं पहुंच पा रही है। कई कैदियों को यह तक नहीं पता कि उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार है।
जस्टिस नाथ ने कहा कि केवल वकील उपलब्ध करा देना काफी नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आरोपी को प्रभावी और गंभीर कानूनी प्रतिनिधित्व मिले। उन्होंने कहा कि यदि कानूनी सहायता केवल औपचारिकता बनकर रह जाए, तो यह संविधान की मूल भावना के साथ न्याय नहीं है।
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सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, न्याय व्यवस्था का है

राम रहीम का मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि वह एक दोषी कैदी है। अदालत द्वारा रेप का अपराध सिद्ध हो चुका है। इसके बावजूद उसे बार-बार पैरोल मिलती है। दूसरी ओर जिन लोगों का ट्रायल तक पूरा नहीं हुआ, वे वर्षों से जेल में हैं। कानूनन पैरोल एक अधिकार नहीं बल्कि प्रशासनिक राहत मानी जाती है, जो अच्छे आचरण, पारिवारिक परिस्थितियों या विशेष कारणों पर दी जाती है। लेकिन जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति को लगातार राहत मिलती है और दूसरे आरोपी वर्षों तक जमानत के लिए संघर्ष करते रहते हैं, तब न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।
सोशल मीडिया और जनचर्चा में भी यही सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या भारत में न्याय और राहत का पैमाना सभी के लिए समान है? 
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारतीय न्याय प्रणाली में “बेल बनाम जेल”, अंडरट्रायल कैदियों की स्थिति और राजनीतिक प्रभाव जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया है।