सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार 1 मई को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को असम पुलिस द्वारा दर्ज मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश के मामले में शर्तों के साथ अग्रिम जमानत दे दी। असम पुलिस ने यह एफआईआर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनकी भुइयां सरमा की शिकायत पर दर्ज की थी। अदालत ने गौहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदूरकर की बेंच ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित लगते हैं। अदालत ने जोर दिया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए, खासकर जब मामला राजनीतिक रंग लिए हुए हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “वर्तमान मामले में आरोप और प्रतिआरोप पहली नज़र में ही राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रतीत होते हैं तथा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रभावित हैं, न कि ऐसी स्थिति का खुलासा करते हैं जिसके लिए हिरासत में लेकर पूछताछ की बहुत ज़रूरत हो।”
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सुप्रीम कोर्ट की शर्तें

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और खेड़ा को अग्रिम जमानत दे दी। 
  • शर्तें:जांच में पूर्ण सहयोग करना। सबूतों से छेड़छाड़ न करना। बिना अदालत की अनुमति के भारत छोड़कर न जाना।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल अग्रिम जमानत से संबंधित है और आपराधिक मामले की मेरिट पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जो कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से तय होगी।

क्या है पूरा मामला

पवन खेड़ा ने कुछ समय पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि रिनिकी भुइयाँ सरमा के पास कई विदेशी पासपोर्ट हैं और उनके विदेश में पैसे लगे हैं। उन्होंने कुछ दस्तावेज और पासपोर्ट की तस्वीरें भी दिखाई थीं। रिनिकी भुइयाँ सरमा ने इस पर शिकायत की कि ये आरोप झूठे हैं और दस्तावेज फर्जी हैं। असम पुलिस ने गुवाहाटी क्राइम ब्रांच में FIR दर्ज की। इसमें भारतीय न्याय संहिता की कई धाराएँ लगाई गई हैं। इनमें चुनाव से जुड़े झूठे बयान, धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल करना, जानबूझकर अपमान करना और मानहानि के आरोप शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट में बहस

खेड़ा की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी सबूतों पर आधारित है जो पहले से ही जांच एजेंसी के पास हैं। इसलिए हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि बयान राजनीतिक प्रचार के दौरान दिए गए थे।
असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाए गए दस्तावेज जाली पाए गए हैं और उनकी उत्पत्ति का पता लगाने तथा शामिल लोगों की पहचान के लिए हिरासत जरूरी है।

इससे पहले क्या हुआ था

  • 7 अप्रैल: असम पुलिस ने दिल्ली में खेड़ा के आवास पर छापा मारा, लेकिन वे वहां मौजूद नहीं थे।
  • 10 अप्रैल: तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी।
  • 15 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया (असम सरकार की अपील पर)।
  • 17 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांजिट बेल बढ़ाने से इनकार कर दिया और खेड़ा को गौहाटी हाईकोर्ट जाने को कहा।
  • 24 अप्रैल: गौहाटी हाईकोर्ट ने खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि खेड़ा की हिरासत में पूछताछ जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि उन्हें दस्तावेज किसने दिए। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर आरोप केवल मुख्यमंत्री पर होते तो इसे राजनीतिक बयानबाजी कहा जाता, लेकिन उन्होंने एक निर्दोष महिला को विवाद में घसीटा।
  • 1 मईः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को शर्तों के साथ पवन खेड़ा की अग्रिम ज़मानत मंजूर कर ली। मामला राजनीतिक बताया।