RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में कहा कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग धर्मों के उन लोगों को आश्रय दिया है जिन्हें कहीं और सुरक्षा नहीं मिल सकी। कई दक्षिणपंथी सोशल मीडिया यूज़र भागवत की टिप्पणियों से नाराज हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।
भारत में हिंदू-मुसलमान नैरेटिव के लिए लगातार आलोचना झेलने वाले आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में अब कहा है कि जो हिंदू मुसलमानों को देश से बाहर करना चाहते हैं, वे हिंदू नहीं रह सकते हैं। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर कई दक्षिणपंथी सोशल मीडिया यूज़रों ने नाराजगी जताई, जबकि कई लोगों ने इसे हिंदुत्व की समावेशी व्याख्या बताया।
मोहन भागवत न्यूयॉर्क में AHEAD फोरम द्वारा आयोजित Faith Leaders Conference को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और यहूदी धर्म के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि वर्ष 2018 में उनके व्याख्यान के दौरान कुछ मुस्लिम प्रतिनिधियों ने उनसे पूछा था कि 'क्या हिंदू राष्ट्र का मतलब मुसलमानों को भारत से निकाल देना है?' इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, 'मैंने तब भी कहा था और आज भी कहता हूं कि यह हिंदुत्व नहीं है। यदि कोई हिंदू सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह हिंदू नहीं रह सकता।'
भागवत ने कहा कि हिंदू होने का अर्थ है यह मानना कि सभी धर्म अंततः एक ही परम सत्य या ईश्वर तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं और हर इंसान समान सम्मान का अधिकारी है।
'भारत ने हमेशा सभी धर्मों के लोगों को शरण दी'
आरएसएस की राजनैतिक ईकाई मानी जाने वाली बीजेपी रोहिंग्या, बांग्लादेशी मुसलमान, 'अवैध घुसपैठिए', सीएए, एनआरसी को लगातार मुद्दा बनाती रही है लेकिनअब न्यूयॉर्क में भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा हमेशा से विविधता को स्वीकार करने की रही है। उन्होंने कहा कि इतिहास में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जब लोगों को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा तब भारत ने उन्हें शरण दी। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान 'एकता में विविधता' है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और धर्म समाज की सुंदरता हैं। भागवत ने कहा, 'विविधता प्रकृति का नियम है, लेकिन उसके पीछे एकता का सत्य छिपा है। जैसे मैं अपनी पहचान की रक्षा करता हूं, वैसे ही मुझे दूसरे की पहचान की भी रक्षा करनी चाहिए।' उनके अनुसार समाज में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उनका समाधान संवाद और परस्पर सम्मान से ही निकल सकता है।
लेकिन बीजेपी तो रोहिंग्या, 'बांग्लादेशी मुसलमानों' के पीछे पड़ी!
मोहन भागवत न्यूयॉर्क में कुछ भी बोले हों, लेकिन बीजेपी लंबे समय से रोहिंग्या शरणार्थियों, बांग्लादेशी मुसलमानों और अवैध घुसपैठियों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाती रही है। इस मुद्दे को देश के गृहमंत्री अमित शाह से लेकर पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी, असम सीएम हिमंता बिस्व सरमा तक लगातार उठाते रहे हैं। वे खुलेआम इन्हें देश से बाहर निकालने की बात करते रहे हैं। लेकिन ऐसे मौक़ों पर मोहन भागवत के ऐसे बयान नहीं दिखे।बीजेपी इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और संसाधनों पर दबाव से जोड़ती है। नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी CAA और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC को भी बीजेपी के चुनावी और नीतिगत एजेंडे में शामिल किया गया।
बीजेपी का तर्क है कि ये कदम अवैध प्रवास को नियंत्रित करने और सताए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए जरूरी हैं, जबकि आलोचक इन्हें भेदभावपूर्ण बताते हैं। ये मुद्दे पार्टी के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद आधारित राजनीति का हिस्सा रहे हैं।
'राजनीति नहीं, समाज से बदलाव शुरू होना चाहिए'
न्यूयॉर्क में भागवत ने कहा कि आरएसएस समाज के माध्यम से बदलाव लाने में विश्वास करता है। उन्होंने कहा कि राजनीति पर प्रभाव डालना जरूरी है, लेकिन इसकी शुरुआत सीधे राजनीति से नहीं हो सकती। उन्होंने कहा, "आज राजनीति काफी हद तक स्वार्थ का खेल बन गई है। जहां केवल 'मैं' और 'मेरा' होता है, वहां समाधान नहीं निकलता। समाधान 'हम' और 'हमारा' की भावना में है।" उन्होंने कहा कि मजबूत समाज ही लोकतंत्र में अच्छी राजनीति का आधार बनता है, क्योंकि लोकतंत्र में अंततः जनमत ही सबसे बड़ी ताकत होता है।मुस्लिम और ईसाई समाज से संवाद का जिक्र
भागवत ने कहा कि 2018 के बाद आरएसएस ने मुस्लिम और ईसाई समाज के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कई बार लोग उनसे कहते हैं कि कई बैठकों के बाद भी कोई बड़ा नतीजा नहीं निकला। इस पर उन्होंने जवाब दिया, 'बैठते रहिए, बातचीत जारी रखिए। अगर उद्देश्य सही है तो एक दिन परिणाम जरूर मिलेगा।'
हालाँकि, मोहन भागवत ने इस बारे में कुछ नहीं बोला कि भारत में ईसाई प्रार्थना स्थलों पर लोगों से मारपीट क्यों की जाती रही है और दक्षिणपंथी संगठनों पर आरोप क्यों लगते रहे हैं। उन्होंने इस बारे में भी कुछ नहीं कहा कि चर्चों को निशाना क्यों बनाया जाता है, संघ किस तरह से चर्चों की मदद करता है या फिर आरोपियों पर कार्रवाई के लिए वह क्या करता है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भी दिया संबोधन
बाद में न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित Universal Oneness Celebration कार्यक्रम में भी मोहन भागवत ने भारतीय समुदाय को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका की पहचान जहां बहुलवाद से जुड़ी है, वहीं भारत की पहचान 'एकता में विविधता' से होती है। भागवत ने कहा, 'भारत के लोगों के डीएनए में ही एकता और विविधता दोनों शामिल हैं।'न्यूयॉर्क मेयर ने जताई थी आपत्ति
कार्यक्रम से पहले न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने आरएसएस की विचारधारा की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि वह इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते, लेकिन यह एक निजी कार्यक्रम है और शहर प्रशासन के पास इसे रद्द करने का अधिकार नहीं है।
सोशल मीडिया पर भागवत की आलोचना
मोहन भागवत के बयान के बाद दक्षिणपंथी या हिंदू से जुड़े संगठनों की प्रतिक्रिया तो नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। कुछ दक्षिणपंथी सोशल मीडिया यूज़रों ने उनके बयान की आलोचना करते हुए कहा कि यह हिंदुत्व की उनकी समझ से मेल नहीं खाता। खुद को सनातन के प्रति वफादार बताने वाले Thor Odinson नाम के यूज़र ने पोस्ट किया है, "तो मोहन भागवत के अनुसार: 'अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा।' ठीक इसी वजह से मुझे इस संगठन और इसके सदस्यों से नफ़रत है। मोहन भागवत, आप अपनी सुविधा के अनुसार हिंदू धर्म की नई परिभाषा तय नहीं कर सकते और फिर असहमति रखने वालों को गैर-हिंदू घोषित नहीं कर सकते। और RSS सरसंघचालक कब से हिंदू होने का सर्टिफ़िकेट जारी करने और रद्द करने के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी बन गए?"इसने आगे लिखा है, "हिंदू धर्म कभी भी RSS प्रमुख द्वारा जारी किया जाने वाला कोई 'परमिशन स्लिप' नहीं था। और हिंदुओं से यह कहना कि सवाल पूछने, असहमति जताने या अपनी सभ्यता से जुड़े हितों को प्राथमिकता देने से वे 'कम हिंदू' हो जाते हैं, हिंदू धर्म की रक्षा करना नहीं है, बल्कि यह हिंदू समाज को अंदर से कमज़ोर करना है। मैं आपसे सहमत नहीं हूँ, और जहाँ तक हिंदू होने की बात है, तो मुझे इसमें ज़रा भी शक नहीं है कि मैं एक हिंदू हूँ, और शायद आपसे बेहतर हिंदू हूँ।"
ऑल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर ने भी लिखा है, "RSS प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क दौरे के दौरान दिए गए बयानों से कई दक्षिणपंथी समर्थक नाराज़ और परेशान दिख रहे हैं: 'अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। अगर आप खुद को हिंदू कहते हैं, तो आपको यह मानना होगा कि सभी रास्ते एक ही मंज़िल तक ले जाते हैं।' स्थानीय कार्यकर्ताओं को घबराने या ठगा हुआ महसूस करने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे सबको साथ लेकर चलने वाले भाषण पश्चिमी देशों के लिए होते हैं। घरेलू बाज़ार के लिए नहीं, समझे न..."।
Love Compassion & Benevolence नाम के यूज़र ने लिखा है, "क्या मोहन भागवत जल्द ही कांग्रेस में शामिल होने वाले हैं? उन्होंने USA, कनाडा और UK में होने वाले बुरे नतीजों से बचने के लिए अपना भाषण बदल दिया, क्योंकि वे न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी और मैडिसन स्क्वायर के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों से बुरी तरह डर गए थे।'
RightWingPlus नाम के यूज़र ने लिखा है, "एक जैसे जीन' वाली बात कहने के बाद, भागवत ने अब यह कहा है! उनकी बेवकूफी की कोई हद नहीं है।"
वहीं कई लोगों ने भागवत के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने हिंदुत्व की समावेशी और मानवीय व्याख्या रखी है, जिसमें सभी धर्मों और समुदायों के सम्मान की बात कही गई है। फिलहाल मोहन भागवत का यह बयान देश और विदेश दोनों जगह राजनीतिक और वैचारिक बहस का विषय बन गया है।
AHEAD संगठन को लेकर भी चर्चा
जिस संगठन AHEAD यानी American Hindus for Engagement and Dialogue ने न्यूयॉर्क में भागवत के इस कार्यक्रम का आयोजन किया, वह खुद को अंतरधार्मिक संवाद और समावेशी समाज को बढ़ावा देने वाला संगठन बताता है। हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि संगठन से जुड़े कुछ लोगों का संबंध हिंदू स्वयंसेवक संघ यानी HSS से रहा है, जिसे आरएसएस का विदेशी सहयोगी संगठन माना जाता है।