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मोहन भागवत क्यों बोले- लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व विरोधी हैं

'लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व विरोधी हैं। हिंदू-मुस्लिम अलग नहीं, बल्कि एक हैं। भारत में रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है। भारत में इस्लाम ख़तरे में नहीं है।' ये बयान आरएसएस के एक नेता के हैं। चौंकिए नहीं! ये कोई ऐसे-वैसे नेता के भी नहीं हैं, बल्कि सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के हैं।

मोहन भागवत ने और क्या-क्या कहा, यह जानने से पहले उनके इन बयानों का वक़्त और जगह जान लीजिए। वह आरएसएस से जुड़े मुसलिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम में बोल रहे थे। बस कुछ महीनों में ही उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। कोरोना संकट के बाद यूपी में बीजेपी की हालत ख़राब बताई जा रही है। और इस बीच संघ के दो बड़े नेता उत्तर प्रदेश भेजे गए हैं। 

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संघ के नए सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसाबले उत्तर प्रदेश में राजनीतिक मुद्दों पर नज़र रखेंगे तो मंदिर निर्माण और अयोध्या प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी संघ के सरकार्यवाह रहे भैयाजी जोशी को सौंपी गई है। यूपी चुनाव संघ के लिए कितना अहम है और इसके लिए वह कितना चिंतित है, ये जोशी और होसबोले जैसे दो बड़े नेताओं का एक साथ राज्य में होना बताता है। और अब ग़ाज़ियाबाद में मोहन भागवत का संबोधन हुआ। तो क्या मोहन भागवत के जो बयान आए हैं वे भी उसी संदर्भ में हैं?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदुत्व, मुसलिम, लिंचिंग जैसे मुद्दों पर ऐसी बातें कही हैं जो शायद संघ के किसी नेता ने पहले नहीं कही थी। 

भागवत ने कहा कि लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व विरोधी हैं। हालाँकि, इसके साथ वह यह कहना भी नहीं भूले कि लोगों के ख़िलाफ़ लिंचिंग के कुछ झूठे मामले दर्ज किए गए हैं। उन्होंने कहा कि भय के इस चक्र में न फंसें कि भारत में इसलाम को कोई ख़तरा है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को ऐसे किसी डर में नहीं रहना चाहिए। 

मोहन भागवत ने कहा कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है। उन्होंने कहा कि लोगों में इस आधार पर अंतर नहीं किया जा सकता कि उनका पूजा करने का तरीक़ा क्या है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा, ‘हम एक लोकतंत्र में हैं। यहाँ हिंदुओं या मुसलमानों का प्रभुत्व नहीं हो सकता है और सिर्फ़ भारतीयों का वर्चस्व हो सकता है।’ उन्होंने कहा कि एकता के बिना देश का विकास संभव नहीं है और एकता का आधार राष्ट्रवाद और पूर्वजों का गौरव होना चाहिए।

इससे पहले भागवत ने अपने संबोधन की शुरुआत में कहा कि वह न तो कोई छवि बनाने के लिए कार्यक्रम में शामिल हुए हैं और न ही वोट बैंक की राजनीति के लिए। उन्होंने कहा कि संघ राजनीति में नहीं है और इसको किसी छवि की चिंता नहीं है। हालाँकि, जो बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करती है उसका मातृ संगठन आरएसएस ही है। बीजेपी को आरएसएस का राजनीतिक संगठन माना जाता है और कहा जाता है कि बड़े फ़ैसले संघ ही लेता है। और उस बीजेपी को और प्रधानमंत्री मोदी को तो छवि की चिंता ज़रूर होगी। कहा जा रहा है कि कोरोना संकट काल में इन दोनों की छवि को छक्का लगा है। 

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मोहन भागवत ने भले ही दावा किया कि संघ को वोट बैंक और छवि की चिंता नहीं है, लेकिन हाल में उत्तर प्रदेश के लिए जिस तरह से संघ के नए सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले और भैय्याजी जोशी को ज़िम्मेदारी दी गई है, उससे तो संदेश कुछ और ही जाता दिखता है। संघ ने यूपी के लिए ये क़दम तब उठाए हैं जब बीजेपी को लेकर कई नकारात्मक रिपोर्टें आई हैं। हाल में हुए पंचायत चुनावों में बीजेपी को खासा नुक़सान हुआ ही है, वाराणसी, अयोध्या, मथुरा और गोरखपुर में भी नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं रहे। इससे भी बीजेपी नेताओं की चिंता बढ़ी। लेकिन क्या यह सिर्फ़ बीजेपी की ही चिंता है?

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