SIR और मतदाता सूची को लेकर चुनाव आयोग पर विपक्ष के गंभीर सवालों के बीच RSS ने देशव्यापी NRC की मांग फिर उठाई है। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इसे जनसंख्या असंतुलन, नागरिकता की पहचान और देश की एकता व सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि ग़लत तरीक़े से मतदाता सूची में शामिल लोगों की पहचान करना ज़रूरी है।

देश में इस समय SIR यानी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं और इस प्रक्रिया में गरीबों, प्रवासी मज़दूरों और अल्पसंख्यकों समेत कई वर्गों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से दो चुनाव आयुक्तों की असहमति की ख़बर आने के बाद विपक्ष ज्ञानेश कुमार और पीएम मोदी के इस्तीफ़े की मांग कर रहा है। चुनाव आयोग इन आरोपों से इनकार करता रहा है और उसका कहना है कि मतदाता सूची को सही और अपडेट करना संवैधानिक जिम्मेदारी है।

इसी राजनीतिक माहौल के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी NRC की मांग फिर सामने रख दी है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार RSS के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने मंगलवार को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक कार्यक्रम में कहा कि देश में नागरिकों की पहचान करना जरूरी है। उनके मुताबिक, इससे कथित 'जनसंख्या असंतुलन' को समझने और देश की 'एकता, अखंडता और सुरक्षा' की रक्षा करने में मदद मिलेगी।
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‘वोटर लिस्ट में गलत लोगों की पहचान जरूरी’

आंबेकर ने खास तौर पर कहा कि यह पहचान ज़रूरी है कि कौन लोग ग़लत तरीक़े से मतदाता सूची में शामिल हो गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने पड़ोसी देशों से भारत आए उन लोगों को नागरिकता देने की प्रक्रिया की भी बात की, जो नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के दायरे में आते हैं।

आंबेकर ने कहा कि जब देश में जनसंख्या असंतुलन के समाधान की चर्चा होती है तो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC की बात सामने आती है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की पहचान जरूरी है जो मतदाता सूची में गलत तरीके से शामिल हो गए हैं। RSS नेता के मुताबिक़, अगर कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है लेकिन उसका नाम मतदाता सूची में शामिल है तो उसकी पहचान होनी चाहिए। इसके साथ ही जिन लोगों के बारे में क़ानून के तहत नागरिकता दी जानी है, उनके लिए नागरिकता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया भी होनी चाहिए। आंबेकर ने यह भी कहा कि केवल राजनीतिक कारणों से किसी गैर-नागरिक को नागरिक मान लेना सही नहीं होगा। 

सुनील आंबेकर का यह बयान तब आया है जब SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर ही विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच बड़ा विवाद चल रहा है। इसलिए NRC की मांग ने नागरिकता की पहचान और मतदाता सूची की जांच के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक बहस को और बढ़ा दिया है।

RSS ने NRC को ‘जनसंख्या असंतुलन’ से जोड़ा

सुनील आंबेकर ने NRC की ज़रूरत को केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे देश में कथित जनसंख्या असंतुलन और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत का विभाजन 1947 में धर्म के आधार पर हुआ था और इसलिए देश के लिए जनसंख्या का संतुलन एक बड़ा विषय है। आंबेकर ने पड़ोसी देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से जुड़े लोगों के कथित उत्पीड़न का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग अगर भारत वापस आए हैं तो CAA के तहत उनकी नागरिकता सुनिश्चित करना जरूरी है।

इसी क्रम में उन्होंने NRC के जरिए ऐसे लोगों की पहचान की जरूरत बताई। उन्होंने भारत में जनसंख्या बदलाव को एक लंबे ऐतिहासिक दौर से जोड़ते हुए मुस्लिम आक्रमणों का भी उल्लेख किया। यह RSS की ओर से जनसांख्यिकीय बदलाव को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखने का तर्क है।

NRC की मांग RSS के लिए नई नहीं है

देशव्यापी NRC की मांग RSS पहली बार नहीं कर रहा है। 2019 में तत्कालीन RSS सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा था कि गैर-भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए NRC तैयार करना सरकार की जिम्मेदारी है।
इसके बाद 2021 में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी NRC का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि NRC का उद्देश्य वास्तविक भारतीय नागरिकों की पहचान करना है और इसे केवल हिंदू-मुस्लिम मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालाँकि, 2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित NRC को लेकर देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद NRC का मुद्दा कुछ समय के लिए राजनीतिक बहस के केंद्र से पीछे चला गया था।

दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार ने सत्ता में आने के बाद NRC पर कोई चर्चा नहीं की है। इसके बाद बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में देशव्यापी NRC का प्रस्ताव शामिल नहीं किया। इस नज़रिये से RSS की ओर से एक बार फिर देशव्यापी NRC की मांग उठाना अहम है।

जनगणना के बीच फिर क्यों अहम हो गया NRC?

NRC की बहस को मौजूदा जनगणना प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा जा रहा है। मौजूदा जनगणना प्रश्नावली में नागरिकता और परिवार से जुड़ी कई जानकारियां मांगी जा रही हैं। इनमें राष्ट्रीयता, माता-पिता से जुड़ी जानकारी, आधार और मतदाता पहचान पत्र जैसी जानकारियां शामिल हैं।

इसका संबंध पहले तैयार किए गए राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी NPR के सवालों से भी जोड़ा जाता रहा है। कानूनी ढांचे में जनसंख्या रजिस्टर के सत्यापन और भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने की प्रक्रिया का प्रावधान मौजूद है। इसमें ऐसे मामलों की पहचान का प्रावधान भी है जहाँ किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह हो। लेकिन यहाँ एक बड़ा अंतर है।

अभी देशव्यापी NRC की कोई सरकारी घोषणा नहीं

RSS की मांग के बावजूद फिलहाल देशव्यापी NRC लागू करने की कोई नई सरकारी अधिसूचना सामने नहीं आई है। 2021 की जनगणना के साथ NPR की प्रक्रिया भी प्रस्तावित थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण जनगणना टल गई थी। बाद में जनगणना प्रक्रिया दोबारा आगे बढ़ी, लेकिन NPR को लेकर उस समय निर्धारित प्रक्रिया को उसी रूप में फिर से अधिसूचित नहीं किया गया।
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SIR विवाद के बीच NRC की मांग क्यों?

यहीं से मौजूदा राजनीतिक विवाद और अहम हो जाता है। एक तरफ चुनाव आयोग मतदाता सूची को संशोधित करने के लिए SIR कर रहा है। दूसरी तरफ विपक्षी INDIA गठबंधन और अन्य दल इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी हटाए जा सकते हैं। चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता है और प्रक्रिया को मतदाता सूची को शुद्ध और सही करने की कवायद बताता है।

इसी समय RSS देश के नागरिकों की पहचान के लिए देशव्यापी NRC की मांग कर रहा है। इससे एक बड़ा सवाल यह उठता है कि मतदाता की पहचान और नागरिक की पहचान को किस सीमा तक एक-दूसरे से जोड़ा जाना चाहिए?

कानूनी तौर पर दोनों प्रक्रियाओं का मक़सद और आधार अलग हो सकते हैं। मतदाता सूची चुनाव में मतदान के अधिकार से जुड़ी है, जबकि NRC नागरिकता की पहचान से जुड़ा विषय है। लेकिन जब दोनों प्रक्रियाओं में दस्तावेजों और पहचान के सत्यापन की भूमिका आती है तो राजनीतिक बहस स्वाभाविक रूप से तेज हो जाती है।
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यही वजह है कि SIR के विवाद के बीच RSS की NRC मांग को केवल एक पुराने राजनीतिक मुद्दे की वापसी के तौर पर नहीं, बल्कि नागरिकता, मतदाता अधिकार, जनगणना और जनसांख्यिकी से जुड़े बड़े सवालों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल सरकार की ओर से देशव्यापी NRC लागू करने की कोई नई घोषणा नहीं हुई है। लेकिन RSS की ताजा मांग ने इस मुद्दे को फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।